■ अनिरुद्ध दुबे
जगदलपुर में बस्तर पंडुम के समापन समारोह में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह काफ़ी गहरी बात कह गए कि “बस्तर नक्सल मुक्त होकर रहेगा। बचे हुए नक्सलियों से पुनः अपील है कि समर्पण कर दें और मुख्यधारा में लौट आएं। इसके बाद उन्हें अवसर नहीं मिलेगा।“ शाह ने समारोह में उपस्थित लोगों से आह्वान किया कि “इतनी जोर से जयकारा लगाओ कि तेलंगाना में बैठे नक्सली भी सुन लें।“
शाह ने जो कहा वह समझने वालों के लिए काफ़ी है। नक्सली समस्या की गहरी समझ रखने वालों का मानना है कि बचे हुए कितने ही नक्सली तेलंगाना को सुरक्षित मानकर वहां जमे हुए हैं। मिशन 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के ख़ात्मे का लक्ष्य निर्धारित होने के बाद बाकी प्रभावित राज्य नक्सलवाद के खिलाफ़ जो कड़ाई बरतते नज़र आए वह बात तेलंगाना में देखने नहीं मिली। जानकार लोगों के मुताबिक तेलंगाना में बड़ी संख्या में ऐसे लोग मौजूद हैं जो नक्सलियों के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखते हैं। कोई बड़ा नक्सली नेता मुठभेड़ में मारा जाए तो उसे शहीद का दर्जा देने से भी पीछे नहीं रहते। और तो और गाजे-बाजे, जुलूस के साथ उसकी शव यात्रा निकाली जाती है। अमर रहे के नारे लगते हैं। तेलंगाना में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं जो नक्सलियों के प्रति झूकाव रखने वालों को वोट बैंक की तरह देखते हैं। पड़ोसी राज्यों की बात करें तो नक्सली उन्मूलन अभियान में छत्तीसगढ़ के बाद महाराष्ट्र एवं आंध्रप्रदेश का रिकॉर्ड बेहतर रहा है।
‘पीएम’ पर क्या
कुछ नहीं घट रहा
जिन योजनाओं के साथ ‘पीएम’ शब्द जुड़ा हो, मानो इन दिनों उनके साथ कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। जशपुर जिले के कुरकुंगा गांव में अपराधिक पृष्ठभूमि वाले दो लोगों ने रात में गहरी नींद सो रहे एक परिवार के सदस्यों को उठाकर न केवल उनसे मारपीट की, बल्कि उनके बन रहे प्रधानमंत्री आवास पर जेसीबी चलाकर उसे निर्दयतापूर्वक ढहा दिया। इस मामले में पुलिस अपना काम कर रही है।
इससे कुछ दिनों पहले सरगुजा जिला अंतर्गत मैनपाट के पिडिया ग्राम पंचायत के घोराघाट में प्रधानमंत्री जन मन योजना के तहत पहाड़ी कोरवाओं के लिए बिना कॉलम खड़े किए ही 1200 से ऊपर मकान बना दिए गए। जिस मकान की नींव ही न हो उसकी छत तो कभी भी भरभराकर गिर सकती है।
रायपुर, भिलाई, दुर्ग
अलग होकर
भी होंगे एक…
स्टेट कैपिटल रीजन (एस.सी.आर.) की पहली महत्वपूर्ण बैठक फरवरी-मार्च, इन दो महीनों में कभी भी हो सकती है। बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णु देव साय करेंगे। एससीआर रायपुर, भिलाई एव दुर्ग को जोड़कर एक बड़ा प्लॉन है, जिस पर मार्च 2025 का बजट पेश करते समय वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने विस्तार से प्रकाश डाला था। बीते एक साल में बड़ा काम अब जाकर यह हुआ कि अंकित आनंद को एससीआर की सीईओ बनाया गया है। एससीआर रायपुर-भिलाई-दुर्ग को मिलाने वाला एक तरह का कॉरिडोर प्लॉन है। 2031 के लक्ष्य वाला प्लॉन। दावे यही हो रहे हैं कि एससीआर के क्रियान्वयन से इन तीनों शहरों के बीच महानगर मुम्बई की तरह न सिर्फ़ जबरदस्त कनेक्टिविटी होगी, बल्कि पर्यावरण बेहतर होगा और रोजगार के कई नये रास्ते खुलेंगे। एससीआर को लेकर जो इकोनॉमी मास्टर प्लान बनेगा वह तीनों शहरों को नई मेट्रो की शक्ल देगा। योजना को मूर्त रूप देने नगरीय प्रशासन, लोक निर्माण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी एवं ऊर्जा विभाग को इस नये प्लान से जोड़ा जाएगा।
‘मुर्दा शहर’ और फिसड्डी
ट्रांसपोर्ट सिस्टम…
इन दिनों राजधानी रायपुर के फिसड्डी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर अख़बारों में ख़ूब लिखा जा रहा है और चैनलों में ख़ूब दिखाया जा रहा है। लिखे या दिखाए जाने में कुछ ग़लत भी नहीं। 2008 में जब रायपुर शहर उतना बड़ा नहीं हुआ था 100 से ऊपर सिटी बसें चला करती थीं। आज वही रायपुर मेट्रो सिटी का स्वरुप धारण करने की ओर है और 50 से कम सिटी बसें चल रही हैं। पुराने रायपुर में तो थोड़ा बहुत पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम ठीक है, मुर्दा शहर नया रायपुर में बहुत बुरा हाल है। ‘नया रायपुर में दौड़ी ट्रेन’ का बखान तो बहुत बढ़-चढ़कर कर किया जाता रहा है, लेकिन वहां के सड़क यातायात को लेकर सवाल करो तो दावे करने वाले बाएं-दाएं देखने लग जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के राज्य गुजरात में भी तो कभी नया गांधी नगर बसाया गया था। थोड़ा समय ज़रूर लगा, पर वहां की सरकार ने बड़ा काम यह किया कि पुराने व नये शहर के बीच की खाई को पाटा। आम आदमी के लिए गांधी नगर से अहमदाबाद के बीच सस्ते किराया दर पर ख़ूब गाड़ियां दौड़ाई गईं और गाड़ियों की संख्या भी बढ़ाई गई। नया रायपुर में करोड़ों-अरबों के प्रोजेक्ट शुरु होने की घोषणा करते हुए कोई कितना भी अपना सीना चौड़ा करते रहे, लेकिन जब तक इस ‘मुर्दा शहर’ की ख़ूबियों का वर्णण ‘आम आदमी’ अपनी ज़ुबां से न करने लगे तब तक यही समझना सब कुछ ऊपर ही ऊपर है। बाहर से ढोल, अंदर से पोल है।
कार पर स्टंटबाजी
हम नहीं सुधरेंगे
‘हम नहीं सुधरेंगे।‘ यह हास्य अभिनेता असरानी की फ़िल्म का नाम था। यहां हम नहीं सुधरेंगे को लेकर मसला कुछ और है। मसला स्टंटबाजों का है, और पूरे प्रदेश का है। जहां देखो तहां चलते टू व्हीलर या फोर व्हीलर पर स्टंट हो रहा है। कानून व्यवस्था का तो मानो डर भय ही नहीं रहा। पुलिस प्रशासन की भी कहीं कुछ लाचारी होती होगी तभी तो सीसीटीवी फुटेज़ से स्टंटबाज पकड़ तो लिए जाते हैं पर कुछ ही घंटों में थाने से छूट जाते हैं। थाने का फेरा लगा आना भी मानो स्टेटस सिंबॉल हो गया है। बीते सप्ताह स्टंटबाजी के दो प्रकरण सामने आए। पहला राजधानी रायपुर के पास के गांव कूंरा स्थित स्वामी आत्मानंद स्कूल का वीडियो वायरल हुआ। यह वीडियो स्कूल की फेयरवेल पार्टी का था जिसमें छात्र-छात्राएं अलग-अलग कारों की खिड़कियों-दरवाजों से बाहर निकलकर स्टंट करते नज़र आ रहे थे। जब स्कूली बच्चों का ये हाल तो कॉलेजों के बिगड़ैल युवा क्या कहर नहीं ढाएंगे! ‘मुर्दा शहर’ नया रायपुर की वीरान सड़कें तो पहले से ही स्टंटबाजों का अखाड़ा बनी ही हुई हैं।
दूसरी घटना जांजगीर जिले के खैरताल स्थित जीएलडी स्कूल की है। वहां भी फेयरवेल पार्टी के दौरान कुछ असभ्य छात्र चलती कार के बोनट व छत पर बैठकर स्टंटबाजी करते नज़र आए।

