■ अनिरुद्ध दुबे
नया रायपुर में बने नये विधानसभा भवन में पहला बजट सत्र हुआ। फरवरी-मार्च दोनों महीने को मिलाकर 15 बैठकें हुईं। वैसे तो सत्र का समापान 20 मार्च को ही हो गया था पर उससे जुड़ी कुछ यादें ऐसी रहीं जिन पर चर्चा का दौर अभी थमा नहीं है। यह सत्र महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए याद किया ही जाएगा। स्वास्थ्यगत कारणों से विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह की सदन में केवल एक ही दिन उपस्थिति रह पाई। बजट सत्र के राज्यपाल के अभिभाषण वाले पहले दिन ही डॉ. साहब सदन में उपस्थिति दे पाए, फिर उपचार हेतु उन्हें दूसरे प्रदेश जाना पड़ा। डॉ. रमन सिंह की अनुपस्थिति में अधिकांश समय सभापति की आसंदी पर वरिष्ठ विधायक धरमलाल कौशिक नज़र आए। कौशिक सफलतापूर्वक सदन का संचालन किए, पूर्व का उन्हें वृहद अनुभव जो रहा था। 2008 से 2013 के बीच कौशिक विधानसभा अध्यक्ष रहे थे। वैसे तो नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत हैं और सहजता और सरलता के कारण राजनीति के क्षेत्र में काफ़ी सम्मानित हैं, लेकिन आक्रामकता की बात की जाए तो विपक्ष की ओर से सबसे ज़्यादा मुखर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नज़र आए। यूं कहें सदन में ‘वाक आउट’ वाला शब्द उन्हीं के मुख से ज़्यादा निकला। झीरम घाटी नक्सली हमले में शहीद हुए नेता नंद कुमार पटेल के बेटे कांग्रेस विधायक उमेश पटेल भी सदन में कई मौकों पर तर्कसम्मत बात करते नज़र आए। मुखर रहने वाली विपक्षी कांग्रेस महिला विधायकों की बात करें तो श्रीमती संगीता सिन्हा, श्रीमती चातुरी नंद, श्रीमती हर्षिता स्वामी बघेल व श्रीमती सावित्री मंडावी जैसी नेत्रियों ने अवसर मिलने पर बराबर सत्ता पक्ष को घेरा।
हमेशा की तरह इस बार भी वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर का उत्कृष्ट प्रदर्शन सदन में देखने को मिला। कई मौकों पर विपक्षी विधायकों की तरफ से लगने वाले आरोपों पर चंद्राकर ने सदन में उन्हें क़रारा ज़वाब तो दिया ही, कहीं कोई बात खटकती नज़र आई तो अपने ही मंत्रियों के समक्ष सवाल खड़े करने से भी वे पीछे नहीं रहे। जहां बोलना ज़रूरी लगा तो सत्ता पक्ष के ही अन्य विधायकों में धर्मजीत सिंह, राजेश मूणत, सुनील सोनी एवं सुशांत शुक्ला अपनी ही सरकार के कुछ बिन्दुओं पर असहमति जताते हुए दमदारी से बोले। रही बात मंत्रियों की, उप मुख्यमंत्री व्दय अरुण साव व विजय शर्मा समेत वित्त, आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी व श्याम बिहारी जायसवाल ऐसे नाम रहे जो विपक्ष की ओर से होने वाले तीखे सवालों का डटकर सामना कर पाए।
पीपल का कटना भी सुनील
सोनी को दे गया था दर्द…
पर्यावरण को लेकर हमेशा चिंता जताते रहने वाले भाजपा विधायक सुनील सोनी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान छातिम (सप्तपर्णी) के पेड़ जैसा लीक से हटकर विषय सदन में लेकर आए। सोनी ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि “राजधानी रायपुर में हज़ारों की संख्या में छातिम के पेड़ लगे हैं, जो अस्थमा व सांस संबंधी अन्य बीमारियों को जन्म देते हैं। तत्काल इनके रोपण पर रोक लगनी चाहिए। मध्यप्रदेश समेत दूसरे कुछ ऐसे राज्य हैं जहां इन पर रोक लगाने लिखित में आदेश भी जारी हो चुका है।“ सोनी की इस बात का उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ विधायक धर्मजीत सिंह एवं अजय चंद्राकर तो समर्थन करते नज़र आए ही, विपक्ष की तरफ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल व नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने भी हवा ख़राब करने वाले ऐसे पेड़ों को लेकर ठोंस कदम उठाने की मांग सदन में की। सदन में आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी ने सोनी की बातों को पूरी तल्लीनता से सुना ही, साथ ही एक और ख़तरनाक वृक्ष कोनोकार्पस का भी उदाहरण दिया। ऐसा नहीं कि पर्यावरण को लेकर सोनी व चौधरी पहली बार आमने-सामने हुए हैं, पहले भी हो चुके हैं। सुनील सोनी तो काफ़ी बाद में रायपुर के कॉलोनी एरिया में रहने गए, वे पले-बढ़े तो राजधानी रायपुर के सदर बाज़ार में। कोतवाली चौक के पास। कोतवाली चौक के पास एक विशाल पीपल का पेड़ हुआ करता था। एक दिन ऐसा आया कि यातायात में बाधक मानते हुए उस तीन-चार सौ साल पुराने पीपल पेड़ को जिला एवं नगर निगम प्रशासन व्दारा मिलकर कटवा दिया गया। तब रायपुर कलेक्टर अभी के आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी थे। उस पेड़ के कटने पर एक टीवी चैनल के डिबेट में हिस्सा लेते हुए सोनी ने चौधरी को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। माना जाता रहा है कि उस पीपल पेड़ के कटने पर सोनी के सीने में गहरा दर्द उभरा था। क्यों न उभरता, किसी ज़माने में बृजमोहन अग्रवाल, सुनील सोनी, देवजी भाई पटेल एवं सुभाष तिवारी जैसे नेताओं की उस पीपल पेड़ को घेरकर बनाए गए चबूतरे पर न जाने कितनी ही शामें जो गुजरी थीं। उस पीपल पेड़ के कटने का दर्द सोनी से ज़्यादा और कौन महसूस कर सकता था।
31 पर अब उल्टी गिनती,
गणपति व मिसिर
बेसरा का इंतज़ार…
31 मार्च। नक्सलवादियों के आत्मसपर्पण की केन्द्र सरकार व्दारा तय अंतिम डेट लाइन। जिसके ख़त्म होने में कुछ दिन कहना शायद मुनासिब न हो, कुछ ही घंटे बचे हैं। पापा राव जिसके नाम को लेकर तरह-तरह की अटकलों का दौर जारी था, जो अपनी ही मौत की ख़बरें उड़वाते रहता था, इसी हफ़्ते, इसी छत्तीसगढ़ में उसके समर्पण से न सिर्फ़ छत्तीसगढ़ सरकार बल्कि मोर्चा संभाल रहे बड़े सूरक्षा अधिकरियों ने राहत की सांस ली। आख़िर 31 का टारगेट केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो तय कर रखा है। छत्तीसगढ़ से परे हटकर बातें करें तो अब भी बड़ा सवाल खड़ा है कि गणपति का क्या हुआ? मिसिर बेसरा कहां है? गणपति नक्सलियों का सबसे ज़्यादा उम्र वाला लीडर। वृद्धावस्था में जब वह बीमार पड़ा तो बताते हैं इसी छत्तीसगढ़ के बस्तर से उसे साथी नक्सलियों ने सूरक्षित दूसरे देश पहुंचाया था। पूर्व में तो यही ख़बर सुनने मिलते रही थी कि इलाज़ के लिए उसे मलेशिया ले जाया गया है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से ख़बर यह आती रही कि वह नेपाल में है। हाल ही में गणपति के बेटे ने पिता के नाम मार्मिक अपील जारी की है। माना जा रहा है कि 31 की डेट लाइन पूरी होते तक इस उम्रदराज़ नक्सली नेता का भी समर्पण छत्तीसगढ़ के पड़ोसी दक्षिणभाषी राज्य में हो जाएगा। रही बात खूंखार नक्सली लीडर मिसिर बेसरा की तो उसका कार्यक्षेत्र झारखंड रहा है। दिल्ली में बैठे लोग उसके भी समर्पण का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क
20 साल से सिर्फ़
कागज़ों पर…
राजधानी रायपुर में अवंति बाई चौक से पहले पंडरी मार्ग से लगकर स्थित पुरानी कृषि उपज मंडी में जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क के लिए सीएसआईडीसी (छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास निगम) ने पीपीपी मॉडल पर एक निविदा जारी कर दी है। पूर्व विधायक देवजी पटेल इस निविदा के विरोध में उतर आए हैं। देवजी पटेल ने आरोप लगाते हुए कहा कि “जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क के लिए 10 एकड़ ज़मीन तो ली जा रही है, लेकिन बदले में बराबर मूल्य की जमीन कृषि उपज मंडी समिति को उपलब्ध नहीं कराई गई है। यह कहां से न्यायोचित है?” बताया जाता है रायपुर कृषि उपज मंडी समिति के सचिव पूर्व में रायपुर कलेक्टर को पत्र लिखकर आग्रह कर चुके हैं कि जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क के लिए मंडी समिति की 10 एकड़ ज़मीन जो ली जा रही है उसके बदले में बराबर की जमीन मंडी सीमा क्षेत्र में कृषि उपज मंडी समिति को उपलब्ध कराएं। अभी तक की स्थिति में मंडी समिति को कोई ज़मीन नहीं मिली है।
सवाल यह कि पुरानी कृषि उपज मंडी समिति की जो ज़मीन ली जा रही है उस पर देवजी पटेल के मन में दर्द क्यों उभर आया? क्यों न उभरे, पंडरी वाली इसी कृषि उपज मंडी से तो देवजी भाई का राजनीतिक करियर परवान चढ़ना शुरु हुआ था। नब्बे के दशक में देवजी भाई रायपुर कृषि उपज मंडी समिति के अध्यक्ष बने थे। तब के छोटे से रायपुर शहर में कृषि उपज मंडी समिति का चुनाव काफ़ी प्रतिष्ठा वाला माना जाता था। फिर ज्वेलरी पार्क कहां बने, इस मुद्दे पर बहस कोई आज से नहीं सन् 2005 से छिड़ी हुई है! सन् 2004 से 2009 के बीच रायपुर नगर निगम में सुनील सोनी वाली महापौर परिषद व्दारा कोतवाली के ठीक पीछे पुलिस वालों के जर्जर आवासों को गिराकर जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क बनाने की घोषणा हुई थी। नगर निगम वहां जेम्स ज्वेलरी पार्क नहीं बना पाया और आगे चलकर पुलिस वालों के जर्जर आवासों को गिराकर पुलिस गृह निर्माण समिति ने नये आवासों का निर्माण कराया। फिर पंडरी क्षेत्र से ही जब बस स्टैंड हटा तो वहां कई एकड़ों में ख़ाली हुई ज़मीन पर जेम्स और ज्वेलरी पार्क बनाने की मांग रायपुर सराफा एसोसियेशन की तरफ से उठी। आज तक यह यक्ष प्रश्न विद्यमान है कि बस स्टैंड हटने के बाद पंडरी में ख़ाली हुई ज़मीन क्या नगर निगम के नाम पर चढ़ी भी है? ज़वाब है नहीं।
कांग्रेस व भाजपा पार्षदों
ने मिलकर पहले भी
किया था विरोध प्रदर्शन
भिलाई नगर निगम की बजट की सामान्य सभा में भिलाई निगम कमिश्नर राजीव कुमार पांडेय को बर्खास्त करने धारा 54 के तहत विपक्ष व्दारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हो गया। अविश्वास प्रस्ताव को आगे की कार्यवाही के लिए राज्य शासन के पास भेजा जा रहा है। पूरे छत्तीसगढ़ में यह पहला मामला माना जा रहा है कि किसी निगम कमिश्नर को बर्ख़ास्त करने प्रस्ताव पास किया गया हो। उल्लेखनीय बात यह है कि बर्ख़ास्तगी के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने ताकत लगा दी। इस पर बजट की सामान्य सभा में मौजूद निगम कमिश्नर ने कहा कि “ईश्वर से कामना करूंगा कि आप लोगों को सद्बुद्धि दे।“ इससे पहले भिलाई महापौर नीरज पाल ने निगम कमिश्नर के खिलाफ़ दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह से लिखित शिकायत की थी।
कभी-कभी होते हैं कुछ मुद्दे जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही एक हो जाते हैं। भिलाई जैसा तो नहीं पर उससे अलग हटकर सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों के एक होने का उदाहरण कभी रायपुर नगर निगम में भी सामने आया था। 1999 में तरुण चटर्जी भाजपा की टिकट पर महापौर बने थे। 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बना और 2002 तक तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी की गाड़ी सरपट भागने लगी थी। राज्य बना तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिग्गज कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे। जोगी शासनकाल में शुक्ल के क़रीबी रहने वालों को चुन-चुनकर टारगेट किया जा रहा था। पूर्व में रायपुर उत्तर से दो बार विधायक रह चुके कुलदीप जुनेजा तब रायपुर नगर निगम में कांग्रेस पार्षद थे। तरुण दादा के ठीक पहले कुलदीप जुनेजा के बड़े भाई बलबीर जुनेजा महापौर थे, जो कि शुक्ल के काफ़ी क़रीबी लोगों में थे। बलबीर जी और कुलदीप जी दोनों भाइयों का देवेन्द्र नगर में एक ही परिसर में निवास था। हुआ यूं कि जोगी शासनकाल में जुनेजा परिवार के पास अवैध निर्माण होने की नोटिस पहुंच गई। वह नोटिस किसी के गले नहीं उतर रही थी, क्योंकि जुनेजा निवास मुख्य मार्ग से अलग हटकर भीतर की तरफ था और निर्माण भी कोई नया नहीं था, पहले का था। रायपुर नगर निगम की जब सामान्य सभा हुई तो जुनेजा परिवार के खिलाफ़ जारी हुई अवैध निर्माण की नोटिस के विरोध में भाजपा व कांग्रेस दोनों ही पार्टी के पार्षदों ने सभापति के डायस के सामने धरना दिया था। दोनों पार्टियों के प्रदर्शनकारी पार्षदों को समझाने के लिए चलती सभा में ख़ुद महापौर तरुण चटर्जी को अपनी जगह से उठकर सभापति के डायस के सामने जाना पड़ा था। तरुण दादा की काफ़ी समझाइश के बाद प्रदर्शनकारी पार्षद माने थे और प्रदर्शन ख़त्म किया था, फिर तथाकथित नोटिस का भी समाधान हुआ।

