कारवाँ (5 अप्रैल 2026) ● नक्सलवाद समाप्ति का यश तो साय सरकार की कुंडली में लिखा था… ● चुनाव लड़ने के मूड में बड़े नक्सली लीडर देवजी व पापा राव… ● दूल्हा एक, दुल्हन दो… ● अब वीडियो कॉलिंग में अपनों से दुख दर्द बांट सकेंगे कैदी… ● आख़िर गोढ़ी में कब बनेगी नई जेल…

■ अनिरुद्ध दुबे

डॉ. रमन सिंह 3 बार मुख्यमंत्री रहे। तीनों मुख्यमंत्रित्वकाल में नक्सलवाद के समाधान के लिए उनकी तरफ से अलग-अलग कोशिशें हुईं, लेकिन नक्सलवाद समाप्त होने का यश तो विष्णु देव साय सरकार की कुंडली में लिखा था।

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दृढ़ संकल्प ही था कि 31 मार्च 2026 को देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाने की घोषणा हुई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह कहा कि देश की रियासतों का भारत में विलय करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ‘लौह पुरूष’  कहलाए तो नक्सलवाद से देश को मुक्ति दिलाने वाले अमित शाह ‘साध्य पुरूष’ हैं। डॉ. रमन सिंह को तीन बार मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारी संभालने का मौका मिला और अपने तीनों कार्यकाल में उन्होंने अलग-अलग स्तर पर नक्सली समस्या का समाधान निकालने का प्रयास भी किया था, लेकिन हर बार कोई न कोई रुकावट आती रही थी। डॉ. रमन सिंह ने अपने पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में ‘सलवा जुडूम’ अभियान चलाकर नक्सली समस्या से छूटकारा पाना चाहा, जिसमें वे बुरी तरह विफल रहे थे। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पंजाब के रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर के.पी.एस. गिल को छत्तीसगढ़ बुलाकर नक्सली समस्या के समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाया था। वह प्रयास भी कोई नतीजा नहीं दे पाया। कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मौत के मुंह में पहुंचा देने वाले अफ़सर के. विजय कुमार से भी छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या को लेकर बातचीत की कोशिश की गई थी, लेकिन वह यहां आने के लिए तैयार नहीं थे। अपने दूसरे कार्यकाल में ही डॉ. रमन सिंह आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की भी नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए सेवाएं लेना चाहे थे। तब बातचीत के लिए किसी नक्सली लीडर का सामने आ पाना संभव नहीं था। अपने तीसरे कार्यकाल में डॉ. रमन सिंह ने चर्चित आईपीएस अफ़सर शिवराम प्रसाद कल्लूरी को बस्तर में बिठाकर समाधान निकालने का प्रयास किया था। कल्लूरी नक्सलवादियों पर दबाव बना पाने में काफ़ी हद तक सफल भी रहे थे। फिर राजनातिक वातावरण कुछ ऐसा बिगड़ा कि कल्लूरी को बस्तर से लौट जाना पड़ा था।

चुनाव लड़ने के मूड में

बड़े नक्सली लीडर

देवजी व पापा राव

दो बहुचर्चित नक्सली लीडरों देवजी व पापा राव ने संकेत दिए हैं कि अवसर मिले तो वे चुनाव भी लड़ सकते हैं। दोनों का कहना है कि हम हथियार छोड़े हैं, उद्देश्य नहीं। दोनों नक्सली नेताओं की क्रूरता के कई किस्से हैं। सुनने में तो यह भी आता है कि दो बड़े नक्सली लीडरों सोनू दादा व रुपेश का एक ही समय में समर्पण हुआ तब तक भाकपा (माओवादी) की सेंट्रल मिलिट्री विंग का सर्वोच्च कमांडर रहा थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी सरकार व सूरक्षा बलों के सामने जाकर हथियार सौंपने के भारी खिलाफ़ था। सोनू दादा का गढ़चिरौली व रुपेश का बस्तर में समर्पण हुआ। काफ़ी लंबा वक़्त लेने के बाद देवजी ले देकर तेलंगाना में सरकार व सूरक्षा अफ़सरों के सामने जाने का मन बना पाया। देवजी का तो अब भी यही कहना है कि “मैंने समर्पण नहीं किया। पुलिस ने मुझे और मेरे साथियों को गिरफ़्तार किया। हमने पुलिस से ये तक कहा था कि गोली मार दें, लेकिन उन्होंने समर्पण का ऑप्शन दिया।“ पापा राव को लेकर भी तस्वीर काफ़ी समय बाद जाकर साफ़ हो पाई। 31 मार्च की डेट लाइन ख़त्म होने को जब हफ़्ते भर बचे थे तब कहीं जाकर पापा राव ने बीजापुर में हथियार डाले। पापा राव ने किसी समय में चार बार अपने मरने की ख़बर ख़ुद उड़वाई थी। 31 मार्च की डेट लाइन निकल जाने के बाद कौन बड़ा नक्सली लीडर हाथ नहीं लग पाया बात करें तो एक ही नाम सामने आता है मिसिर बेसरा। बेसरा के बारे में यही सुनने मिल रहा है कि वह झारखंड के जंगलों में छिपा है।

दूल्हा एक, दुल्हन दो

बस्तर की तरफ से इस हफ़्ते सुखद व रोचक दोनों तरफ की ख़बरें आईं। सुखद ख़बर यह कि बस्तर से नक्सलवाद क़रीब क़रीब समाप्त हो गया। रोचक ख़बर यह कि एक युवक ने दो युवतियों से एक ही मंडप के नीचे ब्याह रचाया। रोचक कहानी फरसगांव ब्लॉक के ग्राम बैलगांव से सामने आई है। युवक हितेश यादव ने शंकरपुर की रहने वाली फुलबती और बनियागांव की रहने वाली यामिनी के साथ एक ही समय में शादी रचाई। सभी रस्में पारंपरिक तरीके से पूरी हुईं। इस त्रिकोणीय शादी में तीनों परिवारों की रजामंदी थी। हितेश खेती किसानी करता है। शादी का कार्ड और वीडियो दोनों सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुआ।

अब वीडियो कॉलिंग

में अपनों से दुख

दर्द बांट सकेंगे कैदी

ख़बर ये आ रही है कि जेल मुख्यालय और भारत संचार निगम लिमिटेड के बीच हुए समझौते के तहत छत्तीसगढ़ की सभी 33 जेलों में वीडियो और ऑडियो प्रिजन कॉलिंग सिस्टम लागू किया जाएगा। कैदी अब अपने परिजनों और वकीलों से न केवल बात कर सकेंगे बल्कि उन्हें देख भी पाएंगे। यह पहल उप मुख्यमंत्री (गृह) विजय शर्मा के निर्देश पर शुरू होने जा रही है। अभी केवल प्रदेश की 17 जेलों में ऑडियो कॉलिंग की सुविधा उपलब्ध है। अधिकारियों का मानना है कि परिवार से दूरी के कारण बंदियों में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता है, जिसे यह तकनीक काफ़ी हद तक कम कर सकती है। नई प्रणाली के तहत कैदियों को पहले से निर्धारित नंबरों पर ही कॉल करने की अनुमति होगी। प्रत्येक बंदी को सप्ताह में एक बार पांच मिनट के लिए इस सुविधा का उपयोग करने का मौका मिलेगा।

वैसे कैदियों के लिए ऐसी सुविधाएं बढ़ाने की ज़रूरत तो है, जिससे वे कुछ मिनटों के लिए ही सही अपनों से दुख दर्द बांट सकें। फिर जेल तो जेल है। रायपुर जेल हमेशा विभिन्न कारणों से सुर्खियों में बने रहती है। कुछ वर्षों पहले की बात है। एक हाई प्रोफाइल कैदी को जेल की अव्यस्थाओं को लेकर बड़ी शिकायत थी। उसने जेल में बैठे-बैठे ही ‘जेल सत्याग्रह’ नाम का फ़ेस बुक पेज बना दिया था। यह बात जेल से निकलकर मीडिया तक पहुंच गई थी।

आख़िर गोढ़ी में कब

बनेगी नई जेल…

पड़ोसी राज्य झारखंड के हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में मैन पॉवर की भारी कमी पर राज्य सरकार और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है। चीफ जस्टिस ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जेलों में रिक्त पड़े पदों को भरने में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताते हुए राज्य के गृह सचिव और जेएसएससी सचिव को 1 मई तक व्यक्तिगत शपथ पत्र के माध्यम से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने अंतिम निर्देश दिए हैं।

छत्तीसगढ़ की जेलों की बात करें तो यहां भी न सिर्फ़ मानव संसाधन बल्कि और भी बड़ी कमियां हैं। सन् 2025 के विधानसभा के बजट सत्र में भाजपा विधायक पुन्नूलाल मोहले के कुछ सवालों पर उप मुख्यमंत्री (गृह) विजय शर्मा का ज़वाब आया था कि प्रदेश में 5 केन्द्रीय जेल, 20 जिला जेल एवं 08 उप जेल कार्यशील हैं। इन सभी जेलों को जोड़कर बात करें तो 14 हजार 733 कैदियों के रहने की जगह है, जिसके विरुद्ध 18 हजार 851 कैदी जेल में हैं।

उप मुख्यमंत्री व्दारा बिलासपुर के ग्राम बैमानगोई में 1500 बंदी क्षमता की विशेष जेल का निर्माण कार्य प्रक्रियाधीन बताया गया था। साथ ही नया रायपुर के पास स्थित ग्राम गोढ़ी में 4000 बंदी क्षमता की विशेष जेल के निर्माण की प्रशासकीय स्वीकृति प्रक्रियाधीन होने की जानकारी दी गई थी। रायपुर सेंट्रल जेल में क्षमता से अधिक कैदियों की जानकारी जब-तब सामने आती रहती है। गोढ़ी में नई जेल बनेगी यह ख़बर कोई आज नहीं, पिछले आठ-दस सालों से सुनने मिलती रही है। बीच में गोढ़ी गांव के लोगों से सुनने मिला था जेल  के निर्माण हेतु सीमांकन हुआ है। सवाल वही पुराना है कि आख़िर निर्माण कार्य कब शुरु होगा?

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