‘मया दे दे मयारू- 2’ यानी महकता छत्तीसगढ़ः लक्षित झांझी

मिसाल न्यूज़

छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘मया दे दे मयारू- 2’ में हीरो लक्षित झांझी फाइटर, संवेदनशील युवक व प्रेमी का किरदार निभाते हुई कई रंगों में रंगे नज़र आएंगे। लक्षित कहते हैं- “मयारू 2 से न सिर्फ़ फ़िल्म की हमारी टीम बल्कि पूरी छत्तीसगढ़ी फ़िल्म इंडस्ट्री को काफ़ी उम्मीदें हैं। ‘मयारू- 2’ से हमारे छत्तीसगढ़ की कला व संस्कृति सिल्वर स्क्रीन पर महकेगी।“

प्रोड्यूसर अलक राय की ‘मया दे मयारू- 2’ दस अप्रैल को पूरे छत्तीसगढ़ की सिंगल स्क्रीन व मल्टीप्लेक्स में रिलीज़ होने जा रही है। रिलीज़ से ठीक एक दिन पहले ‘मिसाल न्यूज़’ की लक्षित से हुई बातचीत के मुख्य अंश यहां प्रस्तुत हैं-

0 कैसा रहा ‘मया दे दे मयारू- 2’ का एक्सपीरियेंस…

00 प्रेम चंद्राकर जी व भूपेन्द्र साहू जी जैसे दिग्गज निर्देशकों की यह फ़िल्म है। इनके साथ किसी प्रोजेक्ट में काम करके कोई आर्टिस्ट सीखकर ही निकलता है। अब संवादों की ही बात कर लें। ‘मया दे दे मयारू- 2’ के लिए लिखे गए संवादों में ऐसे-ऐसे शब्द सुनने को मिले जो पहले कभी नहीं मिले थे। इस फ़िल्म से मेरा शब्द ज्ञान भी बढ़ा।

0 ‘मयारू- 2’ में दीक्षा जायसवाल आपके अपोज़िट हैं। कैसी रही कैमेस्ट्री…

00 दीक्षा के साथ पहली बार काम किया है। वह अच्छी अभिनेत्री होने के साथ अच्छी डॉसर भी है। किसी टैलेंटेड कलाकार के साथ आप स्क्रीन शेयर करें तो आपकी कला भी निखरी हुई नज़र आती है।

0 टैलेंट का ज़िक्र किया। फ़िल्मों में कदम रखने से पहले आपकी ख़ुद की क्या तैयारी थी…

00 हैदराबाद में 3 साल रहकर फ़िल्म मेकिंग का कोर्स किया। न सिर्फ़ अभिनय बल्कि फ़िल्मों से जुड़े विविध पक्षों को भी सीखा।

0 ‘मयारू- 2’ के गानों से चारों कलाकार लक्षित, मन, दीक्षा व इशिका चर्चा में तो हैं…

00 निश्चित रूप से। “पायलिया तैं छम छम बाजे…” गाना 9 लाख क्रास करने जा रहा है। बाकी गानों को भी देखने वालों की संख्या लाखों में है।

0 आपके पिता रजनीश झांझी भी बतौर अभिनेता छत्तीसगढ़ी सिनेमा में बड़ा नाम हैं। उनसे क्या टिप्स मिलती रही है…

00 आपको सीक्रेट बताने जा रहा हूं कि ‘झन भूलौ मां बाप ला- 1’ में पापा के बचपन का रोल मैंने ही किया था। मानकर चलिये सिनेमा मेरे ख़ून में है। मम्मी श्रीमती मिनी झांझी व दादी श्रीमती संतोष झांझी भी एक्ट्रेस रहीं। जिस घर का माहौल ही अभिनय के रंग में रंगा हो सोचिए कि अभिनय की धुन मेरे भीतर किस कदर सवार होगी। सिनेमा से और पीछे चलें। पापा व मम्मी थियेटर आर्टिस्ट भी रहे हैं। बाल कलाकार के रूप में मैंने कभी ड्रामे भी किए। ड्रामे के दिनों को बहुत मिस करता हूं।

0 ‘मयारू- 2’ की तरफ लौटें। इसकी मेकिंग के समय गहराई से क्या महसूस करते रहे थे…

00 इस फ़िल्म को करने के बाद महसूस हुआ कि कहीं-कहीं पर हम अपनी संस्कृति से कटते चले जा रहे थे। मैंने कितनी ही फ़िल्में की, पर ‘मयारू- 2’ जैसी फ़िल्म नहीं की। ‘मयारू- 2’ के संवादों को लें या गीत-संगीत को, या फिर पहनावे को, महसूस होता है इसमें छत्तीसगढ़ की माटी की सुगंध है।

0 बातचीत ख़त्म होने से पहले अपनी तरफ से क्या कहना चाहेंगे…

00 केवल गानों व ट्रेलर से धारणा न बना लें। कीमती समय निकालकर ‘मया दे दे मयारू- 2’ ज़रूर देखें। महसूस करेंगे कि आपने क्या अलग हटकर पाया है।

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