कारवां (17 मई 2026) ● पेट्रोल-डीजल संकट और साइकिल… ● हानिकारक ‘बुलियन गोल्ड’… ● नया व पुराना रायपुर के बीच ईंधन की बरबादी… ● गाड़ी के बहाने धाक जमाने वाले अफ़सर… ● नक्सल मुक्त होने के बाद अमित शाह का नया ‘मिशन बस्तर’… ● ‘प्रवासी’ पक्षियों के बाद अब कार्यकर्ता… ● ‘गद्दार’ का चलन बढ़ा… ● कुर्सी संभालते ही बरसती आग और मूसलाधार पानी…

■ अनिरुद्ध दुबे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल-डीजल बचाने, सोना नहीं खरीदने, खाद्य तेल का कम उपयोग करने तथा वर्क फ्रॉम होम जैसी अपीलें जो कि उस पर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने तीखा हमला करने में देर नहीं लगाई। प्रेस कांफ्रेंस लेकर बैज ने कहा कि “केंद्र सरकार अपनी विफलताओं का बोझ जनता पर डाल रही है। महंगाई, खाद संकट, पेट्रोल-डीजल और गैस संकट से जूझ रही जनता को राहत देने के बजाय प्रधानमंत्री ज़िम्मेदारी से बच रहे हैं। यदि ईंधन बचाना है तो पहले भाजपा के मंत्री, विधायक और पदाधिकारी साइकिल चलाकर मिसाल पेश करें।“

कभी मुख्यमंत्री रहते हुए में डॉ. रमन सिंह ने भी पेट्रोल डीजल के दामों में वृद्धि का विरोध किया था। डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के समय में जब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़े थे तब डॉ. रमन सिंह सरकार का दूसरा कार्यकाल था। विधानसभा सत्र चल रहा था। तब बलौदाबाजार रोड पर आमासिवनी के आगे पुरानी विधानसभा थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, उनके सारे मंत्री एवं विधायक शंकर नगर से साइकिल से विधानसभा पहुंचे थे। तब की मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ़ किए गए इस प्रदर्शन की देशव्यापी चर्चा हुई थी। कुछ विधायकों व पूर्व विधायकों जिन्हें डॉ. रमन सिंह की सरकार वाला साइकिल प्रदर्शन याद रहा, वे कुछ कांग्रेसियों को सलाह देते नज़र आए कि कांग्रेस ने केन्द्र सरकार का विरोध किया वह राजनीति के हिसाब से ठीक किया, लेकिन धरातल पर आकर प्रदर्शन करने कोई नया फार्मूला अपनाने की भी ज़रूरत है।

हानिकारक ‘बुलियन गोल्ड’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 साल तक सोना नहीं खरीदने की जिस दिन अपील की कितने ही लोगों को लगा कि इससे सोना-चांदी के व्यापार में खलबली मच जाएगी और सराफा व्यवसाय से जुड़े लोग विरोध पर उतर आएंगे, लेकिन तस्वीर इसके उलट देखने को मिली। सराफा व्यवसायियों ने मोदी की अपील का समर्थन तो किया ही, ‘बुलियन गोल्ड’ शब्द पर जोर देते हुए इसे हानिकारक बताया। छत्तीसगढ़ सराफा एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री की अपील को व्यापारियों और राष्ट्रहित में एक मजबूत कड़ी बताते हुए कहा कि “सराफा व्यापारियों को इस अपील से घबराने की ज़रूरत नहीं। 2 वर्षों से वैश्विक स्तर पर युद्ध और अनिश्चितता के कारण सोने में अत्यधिक तेजी आई है, जिससे सिर्फ़ ‘बुलियन गोल्ड’ का लेनदेन हो रहा है। ऐसे निवेश में पहले से ही दो वर्षों में सराफा व्यापारी घाटे और व्यापार की कमी से जूझ रहे हैं। प्रधानमंत्री की अपील हमारे लिए संजीवनी साबित होने जा रही है। इस पहल से देश की मुद्रा को मजबूती मिलेगी। सोने का आयात कम होने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। जब हमारा रुपया मजबूत होगा तो व्यापार के अन्य क्षेत्रों में लागत कम होगी, जिसका सीधा लाभ छोटे और मध्यम व्यापारियों को मिलेगा। तिजोरियों में बंद सोना अर्थव्यवस्था को गति नहीं देता।“

रायपुर सराफा एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री की एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने की अपील का समर्थन करते हुए कहा कि “इस कदम से दीर्घकाल में देश की अर्थव्यवस्था और सराफा व्यापार दोनों को मजबूती मिल सकती है। व्यापारियों को इस मुद्दे पर घबराने की ज़रूरत नहीं। पिछले दो वर्षों में वैश्विक युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और बाज़ार में अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इसका असर सराफा क़ारोबार पर पड़ा है और सामान्य आभूषण व्यापार सीमित होकर बुलियन आधारित लेन-देन तक सिमट गया है। इससे छोटे और मध्यम व्यापारियों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है।“

नया व पुराना रायपुर के

बीच ईंधन की बरबादी

प्रधानमंत्री व्दारा डीजल के सीमित उपयोग और ऊर्जा संरक्षण की सलाह दिए जाने के बाद सबसे अधिक सवाल छत्तीसगढ़ में खड़े हो रहे हैं! एक बड़ा सवाल मुर्दा शहर नया रायपुर व पुराने रायपुर के बीच के अंतर को लेकर भी है। सुबह से शाम तक जनप्रतिनिधियों व आला अफ़सरों की गाड़ियां न जाने कितनी ही बार पुराने रायपुर व नया रायपुर के बीच दौड़ लगाती रहती हैं। प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि जो अफ़सर नया रायपुर में निवास करते हैं, उनके लिए प्रति माह 80 लीटर के हिसाब से ईंधन का कोटा तय है। वहीं पुराने रायपुर में रहने वाले अफ़सर जो नया रायपुर आना-जाना करते हैं उन्हें 250 लीटर ईंधन दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ शासन का वित्त विभाग कागज़ों पर लगातार कहते आ रहा है कि ईंधन की खपत कम से कम करें, लेकिन यहां सुनता कौन है! मंत्रियों के वाहनों के लिए 600 लीटर प्रति माह की सीमा तय है। यह आसानी से समझ में आने वाली बात है कि किसी मंत्री की गाड़ी के आगे व पीछे जो गाड़ियां चल रही होती हैं वह तो 600 लीटर वाले आंकड़े को काफ़ी आगे लांघ जाती हैं।

गाड़ी के बहाने धाक

जमाने वाले अफ़सर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद ओ.पी. चौधरी छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे मंत्री रहे जिन्होंने पायलट या फॉलो गाड़ी का उपयोग नहीं करने का निर्णय लिया। चौधरी के बाद फिर आगे पीछे चलने वाली गाड़ियों का त्याग करने वालों की लाइन लग गई। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर मुख्यमंत्री साय तक अपील कर चुके हैं कि न सिर्फ़ मंत्री, सांसद व विधायक बल्कि अधिकारीगण भी संकट के इस समय में वाहनों को लेकर मितव्ययिता पर ध्यान दें। प्रदेश के बहुत से ऐसे अफ़सर हैं जिन्होंने सरकारी वाहन कम से कम दौड़ें पर ध्यान देना शुरु कर दिया है। पर कुछ ऐसे भी आला अफ़सर होते हैं जिन्हें किसी भी तरह के निर्देश नागवार गुजरते हैं। जिन्हें यह भ्रम रहता है कि वे इस लोक में प्रगट नहीं हुए हैं बल्कि किसी दूसरे ग्रह से आए हुए हैं। अफ़सरी करते हुए भी किसी राजनीतिज्ञ की तरह व्यवहार करने वाले एक अफ़सर जो इस समय नया रायपुर की शोभा बढ़ा रहे हैं किसी समय में पुराने रायपुर में लंबा समय गुजारे थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के शुरुआती दौर की बात है जब वह अफ़सर दूर के कहीं सफ़र में जाते तो अपनी गाड़ी के पीछे दो और गाड़ियां चलवाते। पीछे वाली गाड़ियों में जूनियर अफ़सर, कर्मचारी के साथ वो लोग भी बैठे होते थे जो सरकारी नौकरी में नहीं होते थे।

नक्सल मुक्त होने के

बाद अमित शाह का

नया ‘मिशन बस्तर’

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह 19 मई को बस्तर आ रहे हैं, जहां वे 4 राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों की बैठक लेंगे। जगदलपुर में यह बैठक होगी जिसमें नक्सलवाद मुक्त भारत के बाद अगला बड़ा लक्ष्य क्या होना चाहिए पर चर्चा हो सकती है। उल्लेखनीय है कि 31 मार्च तक देश को नक्सलवाद से मुक्त कर देने का लक्ष्य था और लक्ष्य वाली उस तारीख़ के बाद अमित शाह का यह पहला बस्तर दौरा होगा। जानकार लोगों का मानना है यदि पश्चिम बंगाल का चुनाव नहीं होता तो अमित शाह अप्रैल में ही बस्तर आ जाते। उनका बस्तर प्रेम पुराना है। अमित शाह की सोच है कि बस्तर अब ‘रेड कॉरिडोर’ नहीं ‘डेवलपमेंट कॉरिडोर’ के रूप में पहचाना जाए।

बैठक में नक्सलवाद के अलावा और किन मुद्दों पर बातचीत होगी इसका ख़ुलासा नहीं किया गया है, लेकिन जिस हिसाब से अमित शाह ने चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बातचीत के लिए राजधानी रायपुर की जगह बस्तर को चुना है तो इसमें कुछ तो बात है।

जब केन्द्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी तब तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी नक्सलवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर राजधानी रायपुर के पुराने मंत्रालय भवन में बैठक ली थी। आज जो डीकेएस अस्पताल है नया रायपुर के बनने से पहले मंत्रालय वहीं हुआ करता था। सन् 2010 में चिदंबरम व्दारा ली गई उस बैठक में तीन राज्यों छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मौजूद थे। यह अलग बात है कि चिदंबरम के ईमानदार प्रयासों के बावजूद उस बैठक के बाद कोई ठोंस नतीजा नहीं निकल पाया था।

‘प्रवासी’ पक्षियों के

बाद अब कार्यकर्ता

पश्चिम बंगाल एवं असम विधानसभा चुनाव में शानदार किला फतह करने के बाद भाजपा प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में भाजपा क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल एवं  भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय ने प्रवासी कार्यकर्ताओं की बैठक ली। जामवाल ने तारीफ़ों के पुल बांधते हुए कहा कि “आप प्रवासी कार्यकर्ताओं ने ही बंगाल और असम के चुनाव में पार्टी की नीतियों को घर-घर पहुंचाया। बूथ जीता, चुनाव जीता के मंत्र को धरातल पर उतारा।“ बैठक में कार्यकर्ताओं ने अपने सीनियर नेताओं को बताया कि बंगाल चुनाव में उन्हें वहां रहते हुए किन-किन कठिन अनुभवों से गुजरना पड़ा।

प्रवासी पक्षियों के बारे में तो सुना जाता रहा है, अब ‘प्रवासी कार्यकर्ता’ जैसे शब्द भी सुने जाने लगे हैं। साइबेरिया के प्रवासी पक्षी निश्चित समय के लिए हमारे छत्तीसगढ़ आते हैं। वैसे ही प्रवासी कार्यकर्ता थोड़े-थोड़े समय के लिए चुनावी मिशन में हिस्सा लेने दूसरे स्टेट जाते हैं। ‘प्रवासी’ वाला कल्चर केवल भाजपा में हो ऐसा नहीं है। कांग्रेस में भी है। भूपेश बघेल जब मुख्यमंत्री थे और उनके कार्यकाल में जब उत्तरप्रदेश चुनाव पड़ा था छत्तीसगढ़ के कितने ही कांग्रेस नेता व कार्यकर्ता उत्तरप्रदेश गए थे। नेताओं कार्यकर्ताओं तक बात ठीक थी, राजधानी रायपुर के कितने ही पत्रकारों को हवाई जहाज से उत्तरप्रदेश ले जाया गया था और वहां का चुनावी नज़ारा दिखाया गया था। यह अलग बात है कि आज बंगाल चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन जितना शक्तिशाली रहा उत्तरप्रदेश के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन उतना ही कमज़ोर रहा था। बंगाल चुनाव की जीत पर भाजपा ने उन सभी राज्यों में जमकर जश्न मनाया जहां उसकी सरकार है। कांग्रेस को लंबे समय से बड़े जश्न का इंतज़ार है।

‘गद्दार’ का चलन बढ़ा

राजनीतिक शब्दावली में गद्दार शब्द का विशेष स्थान है। वैसे तो गद्दार काफ़ी चुभता हुआ शब्द है और किसी एंगल से अमर्यादित भी लगता है, लेकिन क्या किया जाए ये दौर ही कुछ अज़ीब है। अब बोलना तो दूर की बाद हो गई दीवाल पर ‘गद्दार’ लिख देना चलन में आ गया है। पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाएं तो छत्तीसगढ़ में दो लोगों के लिए ‘गद्दार’ शब्द का इस्तेमाल हुआ। आम आदमी की पार्टी से भाजपा में गए राज्यसभा सांसद संदीप पाठक व नक्सली नेता देवजी को कहने वाले गद्दार कह गए। ‘गद्दार’ शब्द संदीप पाठक के लिए दीवाल पर लिखा गया और देवजी के लिए कागज़ों पर।

संदीप पाठक के पार्टी बदल लेने पर भारी तरीके से नाराज़ आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं ने मुंगेली जिले में पाठक के पैतृक गांव बटहा में उनके घर की दीवार पर लिखा मारा कि “संदीप पाठक थिंक टैंक नहीं, सैप्टिक टैंक निकले। जिस पार्टी ने उन्हें पहचान दी, उसे छोड़कर उन्होंने जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ किया।“

दूसरी तरफ नक्सलवाद का ख़ात्मा हो जाने पर नक्सलवाद से मुक्त हुए क्षेत्रों में जहां खुशी का माहौल है वहीं नक्सल संगठन के भीतर के अंदरूनी मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। ‘नॉर्थ कोऑर्डिनेशन कमेटी’ के नाम से जारी एक संदिग्ध प्रेस नोट में आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व सीनियर नक्सली लीडर वेणुगोपाल उर्फ देवजी को गद्दार कहा गया है। यह पर्चा बिना किसी हस्ताक्षर के जारी हुआ है, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह भी लगे हैं। पर्चे में कहा गया है कि संगठन कमज़ोर जरूर हुआ है, लेकिन ख़त्म नहीं हुआ। संघर्ष जारी रहेगा।

कुर्सी संभालते ही

बरसती आग

और मूसलाधार पानी

नये रायपुर नगर निगम कमिश्नर संबित मिश्रा अभी राजधानी को समझने में लगे हुए हैं। नगर निगम में ज्वाइनिंग के पांच ही दिनों के भीतर उन्हें भीषण गर्मी व मूसलाधार बारिश दोनों अनुभवों से गुज़रने का अवसर प्राप्त हो गया। जब भीषण गर्मी होती है तो टैंकर दौड़ते हैं और मूसलाधार बारिश होती है तो शहर के कई इलाकों में पानी भर जाता है। जिस तरह घंटे भर की ही बारिश में उन्हें कुछ स्थानों पर पानी भर जाने की सूचना मिली तो अधिनस्थ अफ़सरों की मिटिंग लेते समय वह बोलने से नहीं चूके कि “जब आधे घंटे की बारिश में ही शहर का यह हाल हो जाता है तो फिर बरसात का मौसम कैसा गुजरता होगा।“ उन्होंने जोन कमिश्नरों से कहा कि “आप लोग अधिकार संपन्न हैं, गहरी समझ भी रखते हैं, आने वाले महीनों में बारिश से कैसे जूझना है इस पर अभी से सोचना शुरु कर दें।“

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *