कारवां (20 जुलाई 2025) ● 3 कारणों से याद रहेगा इस बार का मानसून सत्र… ● विधानसभा का पता ज़ल्द बदलेगा, लेकिन नया शहर अब तक बेरौनक… ● बड़े क़द वाले साहब… ● बस्तर से जुड़े सवालों में गहरा मर्म या दर्द… ● सदन से सड़क तक छाया रहा पीएम आवास का मुद्दा… ● एक्टिंग मेयर…

■ अनिरुद्ध दुबे

छत्तीसगढ़ विधानसभा का 5 दिवसीय मानसून सत्र सोमवार से शुक्रवार तक चला। दो-तीन बातें ऐसी रहीं जिनके कारण इस बार का मानसून सत्र लंबे समय तक याद रखा जाएगा।  पहला तो इसलिए कि बलौदाबाजार रोड पर आमासिवनी के आगे बरौदा गांव में स्थित विधानसभा की पुरानी इमारत में होने वाला यह आख़री सत्र था। इसके बाद विधानसभा जब भी लगेगी नया रायपुर की नई इमारत में लगेगी। यानी दिसंबर माह में होने वाला शीतकालीन सत्र नई इमारत में होगा। 1 नवंबर को राज्योत्सव के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करकमलों व्दारा नये विधानसभा भवन के लोकार्पण की संभावना है।

दूसरा, इस बार का शीतकालीन सत्र इसलिए याद रखा जाएगा जब डीएपी खाद की कमी के मुद्दे पर विपक्षी कांग्रेस विधायकों ने नारेबाजी करते हुए गर्भ गृह में आकर धरना दिया। हालांकि गर्भ गृह में धरना पुरानी परंपरा रही है, लेकिन 17 जुलाई का जो घटनाक्रम रहा, कुछ अलग हटकर रहा। कांग्रेस विधायकगण जब नारेबाजी करते हुए गर्भ गृह में आ गए तो विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने उनसे कहा कि “नियम प्रक्रिया के तहत आप सब निलंबित हो गए हैं। गर्भ गृह से बाहर चले जाएं।“ निर्देश के बाद भी कांग्रेस विधायक नारे लगाते हुए जिस तरह गर्भ गृह में आसन जमाकर बैठ गए और उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने जो कुछ कहा वह शायद 25 साल के विधानसभा के इतिहास में पहली बार कहा गया कठोर वाक्य रहा होगा। अध्यक्ष ने विपक्षी सदस्यों से सीधे-साफ शब्दों में कहा कि “आप लोग असंसदीय व्यवहार करते हुए 25 साल पुरानी परंपरा को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। मेरे दो बार, तीन बार के आग्रह की आप लोग धज्जियां उड़ाते रहे।“

इसके अलावा तीसरे एक और बड़े कारण के लिए यह सत्र जो याद किया जाएगा वह यह कि शुक्रवार यानी अंतिम दिन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को ईडी व्दारा गिरफ़्तार किया जाना। शुक्रवार को सुबह से ही ईडी की टीम चैतन्य बघेल से पूछताछ करने उनके निवास पहुंच गई थी। उसी दिन चैतन्य का जन्म दिन था और परिवार में जन्मोत्सव मनाने की तैयारियां चल रही थीं। उधर ईडी पूछताछ कर रही थी इधर भूपेश बघेल सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने पहुंचे हुए थे। प्रश्नकाल को ख़त्म होने, यानी 12 बजने में कुछ ही समय बचा रहा होगा कि विधानसभा के कर्मचारी ने सदन के भीतर भूपेश बघेल के हाथ में एक पर्ची लाकर दी। भूपेश बघेल ने वह पर्ची बगल में बैठे नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की तरफ बढ़ा दी। चर्चा यही है कि उस पर्ची में चैतन्य की गिरफ़्तारी की ख़बर थी। प्रश्नकाल के बाद वह समय भी आया जब सारे कांग्रेस विधायक ईडी की इस कार्यवाही के विरोध में विधानसभा की आगे की कार्यवाही का बहिष्कार करते हुए सदन से बाहर आ गए।

विधानसभा का पता ज़ल्द

बदलेगा, लेकिन नया

शहर अब तक बेरौनक

विधानसभा के मानसून सत्र के समापन दिवस पर आसंदी से विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने स्पष्ट किया कि शीतकालीन सत्र नया रायपुर के नया विधानसभा भवन में होगा। निश्चित रूप से नया भवन मंत्रियों, विधायकों, विधानसभा अधिकरियों-कर्मचारियों तथा कव्हरेज़ के लिए जाने वाले पत्रकारों को नया अनुभव देने वाला होगा। ख़बर यही है कि नया रायपुर के निर्माणाधीन विधानसभा भवन का क़रीब 70 प्रतिशत काम हो चुका है। अगले 3 महीने में युद्ध गति से शेष निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार के कुछ मंत्री नया रायपुर में रहना शुरु कर चुके हैं, इस साल विधानसभा भवन एवं अगले साल यानी 2026 में राज भवन भी नई राजधानी में शिफ्ट हो जाएगा। कहने को तो पुराने रायपुर एवं नया रायपुर के बीच ट्रेन भी चलने लगी है, इस सब के बाद भी अरबों-खरबों खर्च करके बसाया गया नया रायपुर अब भी बेरौनक है! मुर्दा शहर! आम आदमी की पहुंच से दूर। वैसे तो लगातार बड़ी औद्योगिक इकाईयां, शिक्षण संस्थान व अस्पताल नया रायपुर में लाने के बड़े-बड़े दावे होते रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि चकाचौंध वाली यह नगरी क्या आम आदमी से अपनापन स्थापित कर पाई? ज़वाब है- बिलकुल नहीं। वैसे तो एक मंत्री जी का रायपुर से लेकर भिलाई-दुर्ग तक की तस्वीर बदल देने का सपना है, काश वे नई राजधानी और आम जन के बीच सामंजस्य बिठाने की दिशा में भी कोई बड़ा कदम उठा पाते।

बड़े क़द वाले साहब

विधानसभा के मानसून सत्र में कौन मंत्री सबसे ज़्यादा चर्चा में बने रहा, यदि किसी के मन में सवाल उठे तो ज़वाब है- चौधरी साहब। विधानसभा के प्रश्नकाल में डीएपी खाद की कमी के मुद्दे पर विपक्ष के भारी हंगामे के बीच हाउसिंग बोर्ड के विभिन्न क्रियाकलापों को लेकर वरिष्ठ भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने सवाल पूछा, जिसका कि आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी ने सिलसिलेवार ज़वाब दिया। सदन में हंगामा ऐसा मचा हुआ था कि चंद्राकर जी व चौधरी साहब के बीच हुए संवादों को कानों पर जोर डालते हुए सुनना पड़ा था। मीडिया में कांग्रेस विधायकों के हंगामे को जितनी जगह मिली उतनी ही जगह चौधरी साहब के उन ज़वाबों को मिली। मानसून सत्र के और दिनों में भी किसी न किसी ख़बर में चौधरी साहब की फोटो लगती रही। सरकार में उनके बड़े क़द का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है। एक समय वह भी था जब सरकारी नौकरी में रहते हुए साहब जनसम्पर्क विभाग में संचालक थे। पुरानी आत्मीयता भी तो कहीं न कहीं काम आती ही है।

बस्तर से जुड़े सवालों

में गहरा मर्म या दर्द

अजय चंद्राकर, राजेश मूणत, सुनील सोनी, किरण सिंह देव एवं सुश्री लता उसेंडी कुछ ऐसे बड़े चेहरे रहे जो विधानसभा के मानसून सत्र में गंभीर मुद्दों को लेकर अपनी ही सरकार को घेरते नज़र आए। इनमें से किरण देव एवं लता उसेंडी बस्तर से हैं। जब आवाज़ बस्तर की तरफ से उठती है तो आवाज़ में छिपे गहरे अर्थों को समझने की भी कोशिश होती है। सत्र के दूसरे दिन प्रश्नकाल के दौरान किरण सिंह देव ने सीएसआर मद से अपने विधानसभा क्षेत्र में किसी भी तरह का कार्य नहीं होने का आरोप लगाया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि “मैंने बहुत से प्रस्ताव बनाकर दिए, किसी पर भी काम नहीं हुआ।“ ज़वाब में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन ने कहा कि “आपके यहां 1 करोड़ का बैडमिंटन कोर्ट स्वीकृत हुआ है। 17 प्रस्ताव बजट के अभाव में रोके गए हैं। आप हमारी पार्टी के अध्यक्ष हैं। पूरा प्रयास करेंगे कि आपके यहां काम रुकने नहीं पाए।“

सत्र के दूसरे दिन प्रश्नकाल में भाजपा विधायक सुश्री लता उसेंडी ने सवाल पूछा कि “जिला कोंडागांव में जनवरी 2023 से जून 2025 तक कौन-कौन अधिकारी मुख्य स्वास्थ्य एवं जिला चिकित्सा अधिकारी के प्रभार में थे या हैं? इनके विरुद्ध किसके व्दारा, किसको, क्या-क्या शिकायत की गई है और शिकायतों के आधार पर इनके विरुद्ध क्या-क्या कार्रवाई की गई?” इन सवालों पर स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल का जो ज़वाब आया उस पर असहमत होते हुए सुश्री उसेंडी ने कड़े लहज़े में कहा कि “आलम यह है कि लोकल लोगों का ध्यान नहीं रखा जाता, विभाग के अधिकारी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। क्या दोषी अधिकारी को निलंबित कर ईओडब्लू से जांच कराएंगे। विभाग के अधिकारी गए थे जांच करने, निष्कर्ष क्या निकला। आप केवल नोटिस देकर क्यों दोषी को बचाना चाह रहे हैं।“

सदन से सड़क तक छाया

रहा पीएम आवास का मुद्दा

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर सदन से लेकर सड़क तक लड़ाई छिड़ी नज़र आई। बुधवार को विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने का आरोप लगाया। डॉ. महंत ने कहा कि “पीएम आवास ग्रामीण को लेकर 2900 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं। कबीरधाम में पीएम आवास के नाम पर बैगा आदिवासियों से अवैध वसूली की शिकायत प्राप्त हुई है। तखतपुर व बीजापुर समेत कितने ही स्थानों पर पीएम आवास योजना का बूरा हाल है।“ इसके ठीक दूसरे दिन गुरुवार को राजधानी रायपुर के कचना क्षेत्र में बने पीएम आवास में रहने वाले सैकड़ों रहवासी नगर निगम मुख्यालय के प्रवेश व्दार पर धरने पर बैठ गए। इनका कहना था कि नगर निगम ने कचना में ढाई हज़ार से अधिक पीएम आवास तो बना दिए लेकिन सुविधाओं के नाम पर सड़क-नाली कुछ नहीं बनाई। बरसात के दिन हैं। कचना पीएम आवास कॉलोनियों की हालत बद से बदतर है।

एक्टिंग मेयर

रायपुर महापौर श्रीमती मीनल चौबे अध्ययन दौरे पर इजराइल गईं तो अपना चार्ज मेयर इन कौंसिल (वित्त) के सदस्य महेन्द्र खोड़ियार को सौंपकर गईं। ये वही खोड़ियार हैं जिन्होंने 5 हज़ार से भी अधिक मतों से पार्षद चुनाव जीतकर इतिहास रचा है। खोड़ियार के क़रीबी मित्रों के मुताबिक़ चंद दिनों के लिए ही सही महापौर का चार्ज मिलने पर हमारे इस मित्र की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। महापौर यदि किसी को चार्ज देकर जाएं तो उसके लिए दो शब्द चलन में हैं- मेयर इंचार्ज तथा एक्टिंग मेयर। व्यवस्था यही है कि महापौर को जिस किसी को भी चार्ज सौंपना हो उसके लिए बक़ायदा नोट शीट चलती है, और यह नोट शीट निगम कमिश्नर तक जाती है। निगम कमिश्नर जब आदेश जारी करे तब कोई एक्टिंग मेयर बन पाता है। एक्टिंग मेयर को किसी भी तरह का नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता। नगर निगम दफ़्तर में निगरानी रख लें, एक्टिंग मेयर के लिए यही काफ़ी है। पूर्व में जब इसी रायपुर नगर निगम में श्रीमती किरणमयी नायक महापौर थीं, तत्कालीन एमआईसी सदस्य मनोज कंदोई को चार्ज सौंपकर जाती थीं। उस कार्यकाल में श्रीमती मीनल चौबे पार्षद हुआ करती थीं। श्रीमती चौबे ने ही कंदोई के लिए नगर निगम में ‘राजा भैया’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस ‘राजा भैया’ की राजनीति कभी रायपुर तो कभी राजिम के इर्द-गिर्द घुमती रहती है।

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