स्वतंत्रता सेनानी उमाठे को जयंती पर याद किया गया… सेनानी उत्तराधिकारी संगठन महापौर से मिलकर करेगा शहीद स्मारक में कक्ष की मांग…

मिसाल न्यूज़

रायपुर। छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन ने आज स्वतंत्रता सेनानी स्व. पी.जी. उमाठे की 107 वीं जयंती पर उन्हें याद किया। स्व. उमाठे के पुत्र राजेन्द्र कुमार उमाठे के अवंति विहार स्थित निवास में सेनानी स्व. उमाठे को श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान उत्तराधिकारी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मुरली मनोहर खंडेलवाल एवं महामंंत्री सुनील बजारी समेत अन्य सेनानी परिवार के सदस्यों ने स्व. उमाठे से जुड़ी यादों और संगठन हित से जुड़ी भावनाओं को सामने रखा। तय हुआ कि रजबंधा स्थित शहीद स्मारक भवन में सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के कार्यालय हेतु 2 कक्ष आबंटित किए जाने की मांग को लेकर संगठन का एक प्रतिनिधि मंडल महापौर श्रीमती मीनल चौबे से मिलेगा।

स्वतंत्रता सेनानी स्व. पी.जी. उमाठे की तस्वीर के सामने दीप प्रज्जवलन एवं पुष्पांजलि के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। संगठन के महामंत्री सुनील बाजारी ने स्व. उमाठे की जीवनी का वाचन किया। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मुरली मनोहर खंडेलवाल ने भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज़ल्द सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन आयोजित करने के संबंध में भूमिका तैयार करने एक बैठक बुलाई जाएगी। संगठन के उपाध्यक्ष सुरेश  मिश्रा एवं अरुण दुबे समेत अन्य लोगों ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर समय-समय पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तस्वीरों तथा उनसे जुड़े संस्मरणों की प्रदर्शनी लगाने वाले सेनानी परिवार के सदस्य पी. संतोष नायडू का शाल एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। अनिरुद्ध दुबे को सेनानी उत्तराधिकारी संगठन की गतिविधियों के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी गई। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्र गान हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से डॉ. के.के. अग्रवाल, श्रीमती बबीता नत्थानी, चंद्रकांत पाण्डेय, राजेन्द्र कुमार चतुर्वेदी, प्रवीण कुमार दीक्षित, बसंत कश्यप, अजय सोनी,  मुकेश बाबरिया, शैलेन्द्र राठौर, मंगल सिंग, अजय कुमार जैन, परसराम अहीर उपस्थित थे।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.

उमाठे का संक्षिप्त परिचय

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री पाण्डुरंग गजानन राव उमाठे का जन्म 10 अगस्त 1918 को पारसिवनी (महाराष्ट्र) में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते हुए 10 वर्ष की छोटी सी उम्र में सामाजिक एवं सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ गए। भारत छोड़ो आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका से प्रभावित होकर वानर सेना तैयार की। उस समय लोकल बोर्ड के अंतर्गत शिक्षण संस्थाएं आती थीं। शाला में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों को गांव की शाला में सर्व साधारण बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता था। उक्त घटना का विरोध करते हुए स्व. उमाठे ने शाला का बहिष्कार किया था। तत्पश्चात् अन्य बच्चों के साथ उन्हें भी बैठने दिया गया। सन् 1930 में उन्होंने क्षेत्र में चारगांव जंगल सत्याग्रह में भाग लिया। उस समय 12 वर्ष की उम्र होने के कारण उन्हें बंदी नहीं बनाया गया।  वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया, जिसमें गिरफ्तारी हुई। सन् 1942 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण उन्हें जंगल पारसिवनी गांव में गिरफ्तार किया गया। रामटेक में करीबन 22 दिन रखा गया। इसके उपरांत केन्द्रीय काराग्रह नागपुर में स्थानांतरित किया गया। 1 जून 1943 को कबीबन 9 माह 24 दिन के पश्चात् रिहा किया गया। उक्त अवधि में कारागृह में लाठी चार्ज का सामना करना पड़ा था। उमाठे जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आजीवन क्रियाशील सदस्य रहे थे।

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