■ अनिरुद्ध दुबे
छत्तीसगढ़ मंत्री मंडल के विस्तार की बातें एक एक बार फिर जोरों से होने लगी हैं। विस्तार की बातें तो साल भर में न जाने कितनी ही बार होती रहीं, लेकिन इस बार जैसा कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किरण देव ने प्रदेश भाजपा संगठन के नये पदाधिकरियों की घोषणा कर दी, बस उसी दिन के बाद से चर्चा जोर पकड़े हुए है कि अब मंत्री मंडल का विस्तार तय है। इतना ही नहीं रात-दिन चिंतन मनन में डूबे रहने वाले कुछ भाजपाई तो यह भी कहते नज़र आए हैं कि देख लेना स्वतंत्रता दिवस के बाद वाले हफ्ते में नये मंत्रियों के नाम सामने आ ही जाएंगे, सितंबर महीने में निगम-मंडल के जो पद खाली हैं वहां पर भी काम के लोग बैठा दिए जाएंगे। मंत्री पद की दौड़ मैं कौन, इसे लेकर साल भर से आधे दर्जन विधायकों के नाम हवा में तैर रहे हैं। इन नामों के बीच सबसे मजबूत नाम दुर्ग के विधायक गजेन्द्र यादव का माना जाता रहा है। दावे तो यही हो रहे हैं कि जो भी दो या तीन नये मंत्री बनेंगे उनमें गजेन्द्र यादव का बनना तय है। ऐसा करके यादव समाज को साधा जाएगा। भाजपा अब सीधे दो लाइन पर काम कर रही है, जातिगत समीकरण को साधना और नये क्षमतावान लोगों को मौका देना। यानी नई लीडरशिप तैयार करना। भाजपा के नये प्रदेश पदाधिकारियों की सूची देखने के बाद इसे भली-भांति समझा जा सकता है। यही कारण है कि गजेन्द्र यादव के साथ आरंग विधायक गुरु खुशवंत साहब के नाम की भी चर्चा हो रही है। 2004 से 2018 के बीच भाजपा की जब 3 बार सरकार रही थी, तीनों बार बृजमोहन अग्रवाल व राजेश मूणत मंत्री रहे थे। बृजमोहन जी के सांसद बनने के बाद रायपुर से अब एक ही बड़ा नाम बचा है- राजेश मूणत। जब कभी भी भाजपा के मूर्धन्य नेतागण साथ बैठकर मंत्री मंडल विस्तार के बारे में विचार विमर्श करते होंगे तो उन्हें रायपुर तो नज़र आता ही होगा। मंत्री पद के लिए रायपुर से मूणत के अलावा एक और नाम चलते रहा है पुरंदर मिश्रा का। सुनने में यही आता रहा है कि पुरंदर मिश्रा के नाम को लेकर ओड़िशा के दिग्गजों के फोन दिल्ली तक होते रहे हैं। फिर भाजपा में लंबा राजनीतिक सफ़र तय कर चुके कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रायपुर के चारों विधायकों में से शायद ही किसी को जगह मिले। गुरु खुशवंत साहेब को मंत्री बनाकर यह संदेश देने का प्रयास किया जाएगा कि रायपुर जिले को प्रतिनिधित्व दे दिया गया है। खुशवंत साहेब का आरंग विधानसभा क्षेत्र रायपुर जिले में जो आता है। फिर यह भी चर्चा है कि बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल के नाम पर कुछ असहमत लोगों ने सोची-समझी रणनीति के तहत अंबिकापुर विधायक राजेश अग्रवाल का नाम सामने किया है। इस मजबूत तर्क के साथ कि राजेश अग्रवाल ने कांग्रेस के उस कद्दावर टी.एस. सिंहदेव को हराया है जो कि पिछली सरकार में उप मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर तो थे ही पिछली सरकार को बनवाने में भी उनकी (सिंहदेव) बड़ी भूमिका रही थी। जातिगत समीकरण की बात होगी तो इस बात पर भी गौर किया सकता है कि आदिवासी समुदाय से खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के अलावा रामविचार नेताम एवं केदार कश्यप मंत्री हैं। इसलिए संख्या के समीकरण के हिसाब से बस्तर तरफ के विधायक लता उसेंडी व विक्रम उसेंडी के मंत्री बनने के रास्ते में बड़ा अवरोध है।
चौंकाने वाले ही होते
हैं भाजपा के फैसले
भाजपा के एक तेज तर्रार युवा नेता से हाल ही में जो बातचीत हुई रोचक थी। युवा नेता ने कहा- “भाजपा में फैसले चौंकाने वाले ही होते हैं। चौक-चौराहे पर चाहे जो भी अटकलें लगती रहें, लिखने वाले चाहे जो भी लिखते रहें। ख़ूब छपा कि अभिषेक सिंह भाजपा प्रदेश महामंत्री बनने जा रहे हैं। बने यशवंत जैन। वो भी बालोद जिले से, जो कि राजनीतिक महत्ता की दृष्टि से राजनांदगांव व कबीरधाम जिले से काफ़ी छोटा है।“
एक और उदाहरण सामने है। बेलतरा के पूर्व विधायक रजनीश कुमार सिंह का नाम भाजपा प्रदेश महामंत्री के लिए जोरों से चला था। रजनीश सिंह 2018 में बेलतरा से विधायक बने थे। विधानसभा में विपक्षी विधायक के रूप में अपनी बातों को वे काफ़ी मुखरता से रखा करते थे। 2023 के चुनाव में आश्चर्यजनक तरीके से रजनीश सिंह की टिकट कट गई। माना यही जा रहा था कि टिकट कटने के बाद भी बिना निराश हुए पार्टी के प्रति लगे रहने वाले रजनीश सिंह भाजपा प्रदेश महामंत्री बनाए जाएंगे। वे महामंत्री बन सकते हैं ऐसा अख़बारों में छपा भी था। उन्हें बधाई मिलना शुरु हो गई थी। जब पदाधिकारियों की लिस्ट जारी हुई अभिषेक सिंह की तरह उनका भी नाम उसमें नहीं था।
कार्टून के नाम पर इतनी
गिरावट… ऐसी तो
पहले कभी नहीं दिखी…
राजनीति में इस कदर गिरावट आ गई है कि कोई कार्टून में किसी नेता को कुत्ता बना दे रहा है तो कोई किसी को बंदर। फिर कार्टून में कुत्ता व बंदर किसी ऐसे-वैसे को नहीं बनाया जा रहा, बल्कि ऐसे नेताओं को बनाया रहा जिनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर है। सोशल मीडिया का ज़माना है, सुबह कुछ घटिया कॉसेप्ट बनाकर डाल दो… दोपहर, शाम व रात तक वह लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। शब्द पर गौर करें, ‘घटिया’। ‘अच्छे’ को देखने, पढ़ने व समझने वालों की संख्या कुछ हज़ार में पहुंच जाए तो बहुत है। फिर मानवीय प्रवृत्ति है कि कहीं गाली-गलौच या मारपीट का प्रत्यक्ष नज़ारा देखने मिल जाए तो चलते कदम थम जाते हैं या चलती हुई गाड़ियां सड़क पर रुक जाती हैं। देखने वाले तो सड़कों पर चार-छह कुत्तों का जो गेम चल रहा होता है उसका भी आनंद लेने में लग जाते हैं। सोचने वाली बात यह है कि प्रकृति ने जितनी व्यापक चेतना इंसानों को दी है उतनी कुत्तों को नहीं। फिर चेतना संपन्न लोग ही किसी पूर्व मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री का घटिया कार्टून सोशल मीडिया में दौड़ाने में लग जाएं तो ऐसे कृत्य को क्या कहा जाए! चैनलों से परे जब अख़बारों का ज़माना था, होली पर्व के समय पाठकों के मनोरंजन के लिए किसी का चेहरा हटाकर उसकी जगह किसी दूसरे चेहरे को लगाने का काम अख़बारों के होली विशेष अंक में ख़ूब होता था, लेकिन मर्यादित तरीके से। होली का बहके रहने वाला मूड मानो अब राजनीति में आए दिन देखने मिल रहा है।
नशे में डोलता छत्तीसगढ़
अब बेसुध होकर
गिरने भी लगा…
नशे को लेकर रायपुर, भिलाई व बिलासपुर जैसे शहरों का तो ख़ूब उल्लेख होता था लेकिन अब पूरा प्रदेश ही नशे की गिरफ़्त में नज़र आने लगा है। कस्बाई एवं ग्रामीण क्षेत्रों से इन दिनों लगातार लूटपाट, नारियों से दूराचार एवं हत्या से जुड़ी ख़बरें जो आ रही हैं, अधिकांश में पाया जाता है कि आरोपी नशे की हालत में था या आरोपीगण नशे की हालत में थे। राजधानी रायपुर में ओड़िशा, मुम्बई या गोवा से नशीले पदार्थ पहुंचने की ख़बरें सामने आती रहती हैं। जब रायपुर के ड्रग कनेक्शन के तार पाकिस्तान से जुड़ जाने की ख़बर सामने आए तो खोपड़ी का हिल जाना स्वाभाविक ही है। हाल ही में ड्रग्स के 9 क़ारोबारी पकड़े गए। पुलिस व्दारा उनसे पूछताछ करने पर पता चला कि पाकिस्तान से ड्रग्स पहले पंजाब पहुंचती है, फिर रेल मार्ग से इसे रायपुर पहुंचाया जाता है। पीने, फूंकने व नाक से नशा खिंचने वाले नशेड़ियों की बातें तो सुनने मिलते रही थीं, लेकिन अब रायपुर के कुछ युवकों व्दारा इंजेक्शन से ड्रग्स लेते रहने की बात सामने आई है। इससे समझ में आता है कि यह शहर कहां था और कहां पहुंच गया। इसके अलावा इन दिनों वह वीडियो भी सोशल मीडिया में ख़ूब दौड़ रहा है, जिसमें कुछ युवक एटीएम कार्ड व मोबाइल पर ड्रग्स की लाइन बनाकर उसे भीतर की तरफ खींचते नज़र आ रहे हैं।
बृजमोहन की बैठक ने
नगर निगम की उड़ाई
नींद, अब मूणत की बारी
रायपुर नगर निगम में इस समय मिटिंग-मिटिंग का दौर चला हुआ है। 13 अगस्त की शाम 7 बजे के आसपास पूर्व मंत्री एवं सांसद बृजमोहन अग्रवाल मिटिंग लेने निगम मुख्यालय पहुंचे। शाम का समय क्यों चुना गया, यह सवाल उठने पर पता चला कि अफ़सर स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में लगे हुए थे, इसीलिए ढलती शाम का समय चुना गया। 7 बजे के आसपास शुरु हुई बैठक रात क़रीब 11 बजे तक खिंच गई। बैठक ख़त्म होने के बाद न सिर्फ़ अफ़सर बल्कि महापौर, सभापति से लेकर एमआईसी सदस्यों, जोन अध्यक्षों व पार्षदों सब का हाल-बेहाल था। इसलिए कि 13 वर्किंग डे था। अफ़सरों ने दिन भर ड्यूटी बजाई फिर रात में न सिर्फ़ बृजमोहन जी बल्कि 3 अन्य विधायक सुनील सोनी, पुरंदर मिश्रा व मोतीलाल साहू के भी मनोभावों से अवगत होना पड़ा। ऐसे में दिन के बाद शाम व रात वाकई थका देने वाली रही। बृजमोहन जी को राजनीतिक जगत में यूं ही रातों का राजा नहीं कहा जाता। 14 अगस्त को नगर निगम में मानो छुट्टी जैसा माहौल था। निगम के भाजपा नेतागण 13 की दोपहर तिरंगा यात्रा में लगे रहे, फिर शाम को मैरॉथन बैठक, 14 को निगम जाने की ताकत ही नहीं बची थी। बैठक का एक और एपिसोड 16 अगस्त को होने की भी ख़बर थी। सुनने यही आ रहा था कि पूर्व मंत्री व विधायक राजेश मूणत 16 तारीख़ को शहर के भव्य दीनदयाल ऑडिटोरियम में निगम के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों व अफ़सरों की ऐतिहासिक बैठक लेने जा रहे हैं। फिर ख़बर ये आई कि निगम से ही जुड़े कुछ साहसी लोगों ने मूणत जी को अवगत कराया कि स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां, ऊपर से बृजमोहन जी की बैठक फिर 15 अगस्त की व्यस्तता, उसके बाद 16 अगस्त को बैठक, यह सब निगम के नेताओं व अफ़सरों दोनों को पस्त करके रख देगा। बताते हैं यह जानने-समझने के बाद मूणत जी को रहम आया और अब वह 21 अगस्त को बैठक लेने के मूड में हैं।
रायपुर में कुत्ते-मवेशी
आज की नहीं
बरसों पुरानी समस्या…
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लेते हुए निर्देश जारी किया है कि एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) की सड़कों से आठ हफ्तों के भीतर सभी आवारा कुत्तों को हटाएं और विशेष शेल्टर होम भेजें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी हिदायत दी है कि आवारा कुत्ते दोबारा सड़कों पर नज़र नहीं आने चाहिए। यह निर्देश दिल्ली-एनसीआर में आने वाले नगर निगमों के लिए जारी हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद देश भर में आवारा कुत्तों पर बहस छिड़ गई है। राजधानी रायपुर में आवारा कुत्तों की जो भरमार है उस पर जमकर सोशल मीडिया में लिखा जा रहा है। आवारा कुत्तों को लेकर रायपुर नगर निगम सदा से मीडिया व आमजन के निशाने पर रहा है। रायपुर नगर निगम में आवारा कुत्तों की नसबंदी का पहली बार प्रस्ताव 2002-2003 में मेयर इन कौंसिल की बैठक में पारित हुआ था। तब से लेकर आज तक समय समय पर आवारा कुत्तों की नसबंदी या फिर उन्हें पकड़कर शहर से दूर ले जाकर छोड़ने के दावे नगर निगम की ओर से होते रहे हैं। फिर भी शहर का ऐसा कोई इलाक़ा नहीं होगा जहां आवारा कुत्तों का समूह नहीं नज़र आता हो। रायपुर नगर निगम की तरफ से सोनडोंगरी में डॉग शेल्टर होम के निर्माण कार्य की प्रगति की ख़बरें सामने आती रहती हैं। लेकिन इस सवाल का ज़वाब पक्के तौर पर नहीं मिल पाता कि शहर भर से आवारा कुत्तों को पकड़कर डॉग शेल्टर होम में रखा कब जाएगा? रायपुर में अलग-अलग रिहायशी इलाकों पर चल रही डेयरियों को चारों दिशाओं में गोकुल नगर बनाकर शिफ्ट करने का प्रोजेक्ट भी 2002-2003 के समय का है। अब तक की स्थिति में नगर निगम केवल एक ही गोकुल नगर मठपुरैना में बनवा पाया है।

