कारवां (31 अगस्त 2025) ● चौबे ने बताई भूपेश की ज़रूरत, ये रिश्ता क्या कहलाता है… ● छत्तीसगढ़ में केवी शाला खोलने ‘युग कवि’ का सपना… ● शहीद स्मारक के खाली स्थान को भरें भी तो कैसे… ● जब किरणमयी का दिखा था संघ के प्रति सम्मान… ● कौन है नशे की सौदागर वो फ़ैशन डिज़ाइनर…

■ अनिरुद्ध दुबे

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जन्म दिन पर पूर्व मंत्री रवीन्द्र चौबे छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस संगठन को लेकर चिंता जताते नज़र आए। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के लिए फिर से भूपेश बघेल की ज़रूरत बताई। इस बारे में जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज से पूछा गया तो उन्होंने इतना ही कहा कि “चौबे जी महाज्ञानी हैं।“ इसमें कोई दो मत नहीं कि रविन्द्र चौबे की गिनती विव्दान नेताओं में होती है। प्रखर वक्ता हैं। उनका संसदीय ज्ञान भी तगड़ा है। यह अलग बात है कि 2023 के चुनाव में गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ईश्वर साहू के सामने उन्हें बड़ी पराजय झेलनी पड़ी। भाजपा का ईश्वर साहू वाला दांव चौबे के साजा विधानसभा क्षेत्र ही नहीं छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों में भी काम कर गया। वोटों का ध्रुवीकरण जो हो गया। चौबे जिस तरह दिल खोलकर बघेल का नाम लेते हैं क्या बघेल के प्रति उनके मन में ऐसा गहरा प्रेम पहले से रहा है? बरसों से कांग्रेस में एड़ियां घिसते आ रहे किसी नेता से यह सवाल करने पर उन्होंने कहा- “बिलकुल नहीं।“ पुराने चावल की क्वालिटी वाले ये पुराने कांग्रेसी बताते हैं- “तस्वीर तेजी से उस समय बदली जब 2018 में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद नई सरकार बनने की बेला क़रीब थी। 2018 के चुनाव में कांग्रेस से दिग्गज ब्राह्मण नेता सत्यनारायण शर्मा, रविन्द्र चौबे, अमितेष शुक्ल व अरुण वोरा चुनाव जीते थे। तब मुख्यमंत्री की शपथ लेने से पहले भूपेश बघेल ने इन चारों में चौबे को ही मंत्री बनाना श्रेयस्कर समझा। उसके बाद से आज तक चौबे, बघेल के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते चले आ रहे हैं। याद करें 2018 में जब ढाई-ढाई साल वाला मामला चला था, तत्कालीन भूपेश सरकार में मंत्री रहे टी.एस. सिंहदेव जो ख़ुद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में रहे थे, बीच-बीच में उनके चौंकाने वाले बयान सामने आया करते थे। सिंहदेव के बयानों पर लगाम कसने उस समय के जिन तत्कालीन दो मंत्रियों को सरकार का प्रवक्ता बनाया गया वो रविन्द्र चौबे और मोहम्मद अक़बर थे। जब कभी सिंहदेव चोट करने वाली बात कह जाते, उनकी बात का खंडन करने सरकार के प्रवक्ता चौबे सामने आ जाया करते थे। सिंहदेव के बयानों पर तब चौबे दहाड़ते हुए मीडिया के सामने कहा करते थे “यह बयान महाराज साहब का व्यक्तिगत बयान हो सकता है, सरकार का नहीं।“ बहरहाल चौबे संगठन में बघेल की ज़रूरत महसूस होना जो बता रहे हैं तो उसके पीछे कौन से समीकरण काम कर रहे होंगे, इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है। वहीं कांग्रेस में युवाओं का एक बड़ा समूह स्पष्ट रूप से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के साथ खड़े नज़र आ रहा है।

छत्तीसगढ़ में केवी

शाला खोलने ‘युग

कवि’ का सपना

छत्तीसगढ़ में इन दिनों नामी कवि कुमार विश्वास को लेकर लंबी बहस छिड़ी हुई है। कुमार विश्वास को रायगढ़ के चक्रधर समारोह में कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। माना यही जा रहा है कि कवि सम्मेलन में दूसरे प्रदेशों से आए अन्य तीन-चार कविगण कुमार विश्वास की ही पसंद के थे। रायगढ़ में कवि सम्मेलन के बड़े होर्डिंग्स लगे। दो-तीन बातें ऐसी रहीं जो छत्तीसगढ़ के कविता प्रेमी, बल्कि ये कहें साहित्य प्रेमियों को खटक गई। पहला तो होर्डिंग्स में कुमार विश्वास के नाम के आगे ‘युग कवि’ लिखा था। ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया पर लिखते नज़र आए कि कुमार विश्वास ‘युग कवि’ कब से हो गए, ‘युग कवि’ की उपाधि उन्हें किसने दे दी! दूसरा- कुछ होर्डिंग्स हिन्दी में तो कुछ अंग्रेजी में थे। साहित्य प्रेमियों का कहना रहा- जब कवि सम्मेलन हिन्दी में है तो होर्डिंग्स अंग्रेजी में क्यों? तीसरी बात- होर्डिंग्स में कुमार विश्वास समेत जो अन्य कवियों के चेहरे नज़र आ रहे थे उनमें एक भी छत्तीसगढ़ का नहीं था। सोशल मीडिया में लोगों की कुछ इस तरह आपत्ति दर्ज़ हुई कि दूसरे प्रदेशों के क़ाबिल कवियों का स्वागत है लेकिन क्या इतने बड़े छत्तीसगढ़ में एक भी योग्य कवि नहीं मिला, जिसकी चक्रधर समारोह में जगह बन पाती! कविता वाले मंच से वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी की तारीफ़ों के पूल बांधते कुमार विश्वास ने कहा कि “वे छत्तीसगढ़ में नये कवियों को तलाशेंगे और उनको मांजने का काम करेंगे।” उन्होंने मंच से चौधरी के समक्ष छत्तीसगढ़ में नये कवियों की पौध तैयार करने केवी शाला का प्रस्ताव भी रख दिया। यहां पर कुछ साहित्य प्रेमी यह सवाल खड़ा करते दिख रहे हैं कि काव्य प्रतिभा तो ईश्वर प्रदत्त है, क्या किसी को ट्रेनिंग देकर कवि बनाया जा सकता है!

अंतर्राष्ट्रीय कवि

काव्य धारा में बहते रहने वाले एक शख़्स का कुछ इस निराले अंदाज़ में यह कहना रहा- “कुमार विश्वास ‘युग कवि’ हैं तो हमारे यहां भी एक अंतर्राष्ट्रीय कवि हैं। नाम है संजीव ठाकुर।“ कुछ वर्षों पहले अख़बारों में तो यही शीर्षक पढ़ने मिलता था- कविता पाठ करेंगे अंतर्राष्ट्रीय कवि संजीव ठाकुर…

शहीद स्मारक के

खाली स्थान को

भरें भी तो कैसे…

राजधानी रायपुर का शहीद स्मारक इन दिनों सुर्खियों में है। शहीद स्मारक के मेंटेनेंस में भारी आर्थिक भार पड़ते देख नगर निगम ने वहां के बड़े खाली परिसर में फूड जोन जैसा कुछ लाना चाहा और इसके लिए मेयर इन कौंसिल की बैठक में प्रस्ताव भी पास हुआ। भीतर के सूत्र बताते हैं- शहीद स्मारक के इर्द-गिर्द जो दुकानें हैं निगम को उससे क़रीब 60 लाख रुपये सालाना किराया मिलता है। निगम इसे शहीद स्मारक के मेंटेनेंस के लिए अपर्याप्त बता रहा है। इस गड्ढे को पाटने के लिए निगम शहीद स्मारक के खाली परिसर को किसी एजेन्सी को ठेके पर देना चाह रहा था। इसके पहले कि कोई निर्णय निकल पाता स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजन विरोध पर उतर आए। पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा, पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा, पूर्व महापौर प्रमोद दुबे, पूर्व नगर निगम एमआईसी सदस्य श्री कुमार मेनन समेत कांग्रेस के कई बड़े नेता सेनानी परिवारों के समर्थन में खड़े हो गए। दूसरी तरफ महापौर मीनल चौबे ने सेनानी परिवारों के प्रति आस्था जताते हुए कहा कि “वे जैसा चाहेंगे वही होगा। लेकिन स्मारक के दाएं-बाएं दोनों तरफ खाली पड़े परिसर का उपयोग भी ज़रूरी है। इसका क्या उपयोग करें, यह सेनानी परिवार के लोगों को ही बताना होगा।“

सन् 1990 के आसपास जब शहीद स्मारक का काम शुरु हुआ था तब शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी कि 2000 आते तक छत्तीसगढ़ राज्य बन जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य बना तो रायपुर को उसकी राजधानी बनना ही था। 90 के दशक में जैसा कि रायपुर छोटा शहर था उसी हिसाब से शहीद स्मारक जैसे विशाल भवन के निर्माण की छोटी कल्पना कर ली गई। आज जब रायपुर शहर मेट्रो का रुप ले चुका है, हर चीज बहुत तेजी से बदली है तो शहीद स्मारक काफ़ी पुराना सा लगने लगा है। वहां सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। शहीद स्मारक के मेंटेनेंस के नाम पर भवन के निचले हिस्से में सौ से अधिक दुकानें निकाल दी गईं। फिर शहीद स्मारक के ऑडिटोरियम तक पहुंचने कई सीढियों की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। उम्रदराज़ लोगों के लिए इन सीढ़ियों को चढ़ पाना काफ़ी मुश्किल काम है। सीढियों के बाजू चढ़ने-उतरने के लिए ढलान जैसा बना भी हुआ है तो वह भी ऐसा कि बुजुर्गों को थका दे। शहीद स्मारक भवन का ढांचा खड़ा होने से पहले जब वहां कुछ दुकानों का निर्माण हुआ था, पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने उसे देखकर कहा था कि “क्या यह शहीद स्मारक है, जिसे बाज़ार की शक्ल दे दी जा रही है। मेरा बस चले तो इस पर बुलडोजर चलवा दूं।“ शुक्ल ने यह भी कहा था कि “जबलपुर का शहीद स्मारक देखें, जो अपने आप में एक मिसाल है।“ खुद महापौर श्रीमती मीनल चौबे को शहीद स्मारक में भारी तकनीकी ख़ामियां नज़र आती हैं। उनका मानना है कि शहीद स्मारक का स्वरुप कुछ और ही होना चाहिए था।

जब किरणमयी का दिखा

था संघ के प्रति सम्मान

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) के प्रार्थना गीत “नमस्ते सदा वत्सले…” मानो इन दिनों कर्नाटक के बड़े कांग्रेस नेताओं को ख़ूब रास आया हुआ है। कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डी.के. शिव कुमार के बाद वहां के कांग्रेस विधायक एच.डी. रंगनाथ भी पिछले दिनों इस गीत को गाते नज़र आए। यह अलग बात है कि ऐसा कुछ होने के बाद वहां के बहुत से कांग्रेसी असहज नज़र आए। कर्नाटक ही क्यों, और भी स्थानों पर ऐसे उदाहरण देखने मिल जाते हैं जब किसी एक पार्टी का नेता किसी दूसरी पार्टी के आदर्श संस्कारों पर सम्मान जताते नज़र आता हो। कभी-कभी सम्मान जताने वाले से उसकी पार्टी के बड़े लोग पूछताछ कर बैठते हैं, फिर उस पर सफ़ाई भी पेश करनी पड़ती है। कर्नाटक से मिलता-जुलता एक उदाहरण राजधानी रायपुर में कभी देखने को मिला था। 2009 में श्रीमती किरणमयी नायक कांग्रेस की टिकट पर रायपुर महापौर का चुनाव जीती थीं। तब तक नये निगम मुख्यालय यानी व्हाइट हाउस का काम पूरा नहीं हुआ था। मालवीय रोड स्थित पुराने दफ़्तर में ही महापौर का बैठना हुआ करता था। श्रीमती नायक से पहले भाजपा के सुनील सोनी महापौर रहे थे। श्रीमती नायक के विशेष अनुरोध पर सहजता व सरलता के साथ सोनी उन्हें महापौर का चार्ज सौंपने पुराने निगम मुख्यालय आए थे। सोनी के वहां से रवाना होने के कुछ देर बाद ख़बर पहुंची कि आरएसएस का पथ संचलन मालवीय रोड यानी निगम मुख्यालय के सामने से गुज़रने वाला है। तत्कालीन महापौर श्रीमती किरणमयी नायक ने पास के ही फूल चौक से फूल मंगवाए। जैसे ही संघ का पथ संचलन निगम मुख्यालय के सामने पहुंचा श्रीमती नायक ने फूलों की वर्षा कर उसका स्वागत किया। तब कांग्रेस के भीतर इस घटनाक्रम को लेकर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। पिछली बार भूपेश बघेल की सरकार बनी तो श्रीमती नायक को उनकी वरिष्ठता के नाते राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। अब विष्णुदेव साय की सरकार है, अभी भी महिला आयोग अध्यक्ष का प्रभार श्रीमती नायक के ही पास है।

कौन है नशे की सौदागर

वो फ़ैशन डिज़ाइनर…

अब तो राजधानी रायपुर के यूनिवर्सिटी व कॉलेज़ के केम्पस तक में ड्रग्स के पहुंचने की बातें दबी ज़ुबान से सामने आने लगी हैं। जो रायपुर कभी गांजा, भांग, अफीम व शराब तक सीमित था अब यहां हेरोइन एवं एमडीएमए जैसे ख़तरनाक नशीले पदार्थ भी पहुंचने लगे हैं। हज़ारों का ज़माना मानो चला गया, अब कोई ड्रग्स तस्कर पकड़ा जाता है तो उसके पास से लाखों का ड्रग्स ज़ब्त होता है। एक कहानी तो ये सामने आई है कि एक फ़ैशन डिज़ाइनर युवती ने रायपुर में नशे का क़ारोबार फैला रखा है। नशे का सामान लेकर वह मुम्बई से रायपुर आती है। उसने हरियाणा से 50 लाख का ड्रग्स रायपुर मंगवाया था। पुलिस जब हरक़त में आई फ़ैशन डिज़ाइनर तो भाग निकली, उसके साथ काम में संलग्न रहे 3 लोग ज़रूर कानून की गिरफ़्त में आ गए। अंदर की ख़बर रखने वाले बताते हैं कि ड्रग्स की सबसे ज़्यादा खपत रायपुर के आसपास के फार्म हाउस एवं रिसॉर्ट में हो रही है। इवेंट कंपनियों से जुड़े कुछ लोगों की इस काम में संलग्नता बताई जाती रही है। फार्म हाउस या रिसॉर्ट में शाम-रात से लेकर दूसरे दिन सुबह तक की पार्टी रखी जाती है। नशे की एक पुड़िया के पीछे 10 हज़ार तक की कीमत चुकानी पड़ती है। इसके अलावा रायपुर में रेव पार्टी का कल्चर कोई आज का नहीं बल्कि पुराना है। इवेंट की दुनिया से जुड़ी एक महिला लड़के-लड़कियों को एक अलग ही आनंद की दुनिया में पहुंचाने का सपना दिखाते हुए किसी ज़माने में रेव पार्टी का आमंत्रण दिया करती थी। अपराध की दुनिया पर बारीक नज़र रखने वाले एक शख़्स का मानना है कि रायपुर शहर में हेरोइन, ब्राउन शूगर, स्मैक एवं मेथीलीनडायऑक्सी (एमडीएमए) का सेवन करने वाले लड़के-लड़कियों का आंकड़ा सैकड़ों से बढ़कर अब हज़ार में जा पहुंचा है।

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