कारवां (5 अक्टूबर 2025) ● नक्सलियों को फिर शाह की ललकार… ● निराले ननकीराम… ● रेणुका की दहाड़… ● ‘चीफ’ के चयन में नागपुर का भी रोल… ● नगर निगम को यूएस जैसों की ज़रूरत…

■ अनिरुद्ध दुबे

इस क़लमकार ने अपने पिछले ‘कारवां’ कॉलम में संकेत दिया था कि सितंबर माह के गुजरते ही बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ़ मुहिम और तेज हो जाएगी। अक्टूबर लगते ही इसकी शुरुआत हो चुकी है। 1 अक्टूबर को कोबरा 208 बटालियन ने बीजापुर जिले के पामेड़ थानान्तर्गत काउरगुट्टा इलाके के घने जंगलों में नक्सलियों व्दारा डंप करके रखे गए हथियार व विस्फोटक को बरामद करने में बड़ी क़ामयाबी हासिल की। इसके बाद 3 अक्टूबर की रात नया रायपुर में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा से नक्सली समस्या पर बंद कमरे में लंबी बातचीत की। 4 अक्टूबर को अमित शाह ने बस्तर पहुंचकर दशहरा उत्सव के मंच से नक्सलियों को एक बार फिर ललकारा। शाह ने मंच से अपनी वही बात फिर दोहराई कि 31 मार्च 2025 तक नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा। माना जा रहा है कि इसके बाद नवंबर में अमित शाह का फिर छत्तीसगढ़ दौरा होगा। अगले प्रवास में नक्सलवाद को जड़ से मिटाने अंतिम रणनीति तैयार होगी। 28 से 30 नवंबर के बीच राष्ट्रीय स्तर का डीजीपी-आईजी सम्मेलन राजधानी रायपुर में जो होने जा रहा है, अमित शाह उसमें शामिल होंगे। जैसा कि नक्लवाद की सबसे ज़्यादा गहरी जड़ें छत्तीसगढ़ में ही हैं, यही कारण है ऑल इंडिया डीजीपी-आईजी सम्मेलन के लिए इस बार छत्तीसगढ़ को चुना गया है। संभावना तो यह भी जताई जा रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं।

निराले ननकीराम

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह जब छत्तीसगढ़ प्रवास पर थे, छत्तीसगढ़ सरकार में पूर्व में गृह मंत्री रहे ननकीराम कंवर कोरबा कलेक्टर अजीत वसंत को हटाने की मांग को लेकर राजधानी रायपुर पहुंचे हुए थे। वरिष्ठ आदिवासी नेता कंवर जब राजधानी रायपुर पहुंचे, पुलिस ने टाटीबंद स्थित गहोई वैश्य समाज के भवन में उन्हें हाउस अरेस्ट करके रख दिया। हाउस अरेस्ट वाला वह वीडियो सोशल मीडिया में ख़ूब वायरल हो रहा है। ननकीराम कंवर बिना लागलपेट के अपनी बात कह देने वाले नेता रहे हैं। प्रचार-प्रसार की उन्हें कई अन्य नेताओं जैसी भूख कभी नहीं रही, लेकिन मान-सम्मान के ज़रूर भूखे रहे। प्रचार प्रसार से वे ख़ुद को कितना दूर रखते रहे थे इसका एक बड़ा उदाहरण पूर्व में कभी देखने को मिला था। छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग की ओर से हर मंत्री को उनके क्रियाकलाप एवं कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार के लिए अधिकारी दिया जाता है। कंवर जब गृह मंत्री थे, उन्हें भी जनसम्पर्क विभाग से एक अधिकारी मिला हुआ था। जनसम्पर्क विभाग के अधिकारी ने जब सामने आकर अपना परिचय दिया तो कंवर ने सीधे-सपाट शब्दों में यही कहा था कि “गृह विभाग में तुम्हारा क्या काम। विकास की गंगा बहने वाले काम तो गृह विभाग में होते नहीं, अतः जहां बैठते हो वहीं रहो, जब ज़रूरत होगी तुम्हें बुला लिया जाएगा।“

ऐसा नहीं है कि कंवर पहली बार किसी उच्चाधिकारी के खिलाफ़ मोर्चा खोले हैं। इससे पहले एक आईपीएस अफ़सर को सीधे पत्नी की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने मोर्चा खोल रखा था। डॉ. रमन सिंह सरकार का जब तीसरा कार्यकाल था, उन्होंने लिखित में शिकायत करते हुए जांच की मांग कर डाली थी। 2018 में 68 सीट के साथ कांग्रेस की सरकार बनी और भाजपा 15 सीटों पर सिमटकर रह गई थी, उन बेहद कठिन परिस्थितियों में जीतकर विधानसभा पहुंचने वालों में ननकीराम कंवर भी शामिल थे। तब की कांग्रेस की सरकार के समक्ष भी कंवर ने आईपीएस के खिलाफ़ शिकायत वाला वही पुराना पत्र सामने रखा। कांग्रेस सरकार ने उस पत्र के आधार पर विधानसभा के भीतर उस आईपीएस के खिलाफ़ जांच की घोषणा कर दी थी।

रेणुका की दहाड़

भरतपुर-सोनहत की भाजपा विधायक रेणुका सिंह सोनहत में हुए दशहरा उत्सव में मंच से दहाड़ते हुए जो कुछ कह गईं उसकी वज़ह से सुर्ख़ियों में हैं। रेणुका सिंह ने अपने भाषण में कहा कि “हम हर साल रावण जलाते हैं, लेकिन रावण कभी मरता नहीं। हमारे मन में रावण है, घर में रावण है और सरकार में भी रावण है।“ बस फिर क्या था, कांग्रेस से जुड़े लोग रेणुका सिंह के भाषण के इस अंश को सोशल मीडिया में दौड़ाते हुए नाना प्रकार की टीका-टिप्पणियां कर रहे हैं। रेणुका सिंह की शुरु से ही आक्रामक नेत्री वाली छवि रही है। 2008 में प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थी तब के नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे ने विधानसभा के भीतर रेणुका सिंह को झांसी की रानी उपमा से संबोधित किया था। केन्द्र में जब दूसरी बार मोदी सरकार बनी तो वह केन्द्रीय मंत्री रहीं। 2023 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में भाजपा जब बहुमत में आई तो मुख्यमंत्री पद के लिए जोरों से जो दो नाम चले थे वो नाम रेणुका सिंह व गोमती साय के थे। इन दोनों में से कोई मुख्यमंत्री नहीं बन पाया और केन्द्रीय नेतृत्व ने विष्णु देव साय के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज़ रखा। यही नहीं विष्णु देव साय के मंत्री मंडल में भी इन दोनों नेत्रियों के लिए कोई जगह नहीं बन पाई। इसे ही तो बड़ा उलटफेर कहते हैं! कहां आप मुख्यमंत्री पद की दौड़ में होते हैं और कहां आपको मंत्री मंडल में ही कोई जगह नहीं मिल पाती! ज्वालामुखी के फटने का कभी कोई निश्चित समय नहीं होता, वह कभी भी फट जाता है।

‘चीफ’ के चयन में

नागपुर का भी रोल

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े अफ़सर का नाम जो तय हुआ, उसमें नागपुर का भी रोल है! सुनकर हो रहा होगा न आश्चर्य, लेकिन ऐसा है। सबसे बड़े वाले की दौड़ में तो वो सहज और सरल अफ़सर भी थे जो अपनी यूनियन के पदाधिकारी भी रहे। पिछड़े इसलिए कि नागपुर की तरफ़ से तर्क कुछ दूसरे किस्म का था। यही कारण है कि जिस नाम की किसी को कल्पना नहीं रही थी, वे चार लोगों को पीछे छोड़ते हुए बड़े मुक़ाम पर पहुंच गए।

नगर निगम को यूएस

जैसों की ज़रूरत…

रायपुर नगर निगम में क़रीब सवा साल सेवाएं देने के बाद हाल ही में अपर कमिश्नर यू.एस. अग्रवाल रिटायर हुए। वे पूर्व में रायपुर कलेक्ट्रेट में नजूल ऑफिसर पद पर पदस्थ रहे थे। उन्हें भूमि एवं राजस्व से जुड़े मसलों का गहरा जानकार माना जाता रहा है। रायपुर नगर निगम में प्रशासक और निगम कमिश्नर जैसे दो बड़े पदों को अलग रखकर बाते करें तो बाद के क्रम में ऐसे कम ही अफ़सर देखने को मिलते रहे हैं जिनका नाम लंबे समय तक ज़ेहन में बने रहे। अपर कमिश्नर पद तो बाद में निगम के सेटअप में आया, पूर्व में निगम कमिश्नर के बाद डिप्टी कमिश्नर को ही दूसरे क्रम में बड़ा पद माना जाता था। आशीष मिश्रा, लोकेश्वर साहू एवं आलोक चंद्रवंशी जैसे अफ़सर कभी रायपुर नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर पद पर रहे थे, जिनके काम को आज भी याद किया जाता है। सुखद संयोग रह था कि ये तीनों ही अफ़सर तत्कालीन महापौर सुनील सोनी के कार्यकाल में रहे। आशीष मिश्रा को जहां वित्त से जुड़े मसलों का गहरा जानकार माना जाता रहा था, वहीं आमापारा से तात्यापारा चौक तक के ऐतिहासिक सड़क चौड़ीकरण में लोकेश्वर साहू की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। राजधानी रायपुर में सिटी बस प्रोजेक्ट की शुरुआत करने में आलोक चंद्रवंशी का अहम् रोल रहा। कोरोना महामारी के समय में जब कोरोना से मृत लोगों के अंतिम संस्कार के स्थलों के चयन को लेकर भारी संकट वाली स्थिति थी, तत्कालीन अपर कमिश्नर पुलक भट्टाचार्य ने काफ़ी ज़िम्मेदारी के साथ उन विषम परिस्थितियों का सामना किया था। बात करें यू.एस. अग्रवाल की। नगर निगम के 536 अधिकारियों-कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिलाने में इनकी अहम् भूमिका रही। इसके अलावा निगम की वित्तीय हालत सुधारने आगे जिन कुछ कॉमर्शियल प्रोजेक्ट पर काम शुरु होना है, उनका खाका खींचने में भी अग्रवाल का अहम् रोल है। नगर निगम में अग्रवाल के रहते हुए में जैसा कि कुछ बड़े कामों को तेज गति मिली, कुछ सक्रिय पार्षद समेत कुछ अफ़सर एवं कर्मचारी आगे भी निगम में अग्रवाल जैसे अफ़सरों की ज़रूरत बता रहे हैं। ऐसा नहीं है कि रायपुर नगर निगम क़ाबिलियत के नाम पर शून्य है। क़ाबिल लोगों की लंबी चौड़ी लिस्ट है, लेकिन दो के साथ जब दो और मिल जाएं तो चार हो जाता है। आगे रायपुर नगर निगम को कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी है। स्वाभाविक है वहां बड़ी संख्या में कुशल योद्धाओं की ज़रूरत है।

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