● किरदार में जान फूंक देने वाले सलीम भाई… (निधन- 31अक्टूबर 2025)

■ अनिरुद्ध दुबे

छत्तीसगढ़ी सिनेमा जगत में सलीम चाचा के नाम से मशहूर सलीम अंसारी हमारे बीच नहीं रहे। 31 अक्टूबर की सुबह उनके निधन की खबर सुनकर छत्तीसगढ़ के सिनेमा व नाट्य जगत में शोक छा गया। ड्रामे से अपने अभिनय सफ़र की शुरुआत करने वाले सलीम भाई फ़िल्मों के अलावा अलबम व एड फ़िल्मों में भी अपनी ज़बरदस्त छाप छोड़ते रहे थे। सलीम भाई- सतीश जैन, संतोष जैन एवं मनोज वर्मा जैसे जाने-माने निर्देशकों के प्रिय कलाकार थे। सतीश जैन की कोई फ़िल्म बने, उसमें अभिनय के अलावा निर्देशन एवं कलाकारों के मेकअप में सहयोग करने और जब कैमरा ऑफ रहे तो हास-परिहास के साथ पूरी फ़िल्म यूनिट का मनोरंजन करते हुए तनाव व थकान को कम करने में सलीम भाई की अहम् भूमिका हुआ करती थी। सलीम भाई ने जब सिनेमा में काम करना शुरु किया उसके पहले से मैं उन्हें जानता था। दरअसल सन् 1985 में बूढ़ापारा स्थित जगन्नाथ राव दानी स्कूल के हॉल में जाने-माने नाट्य निर्देशक जलील रिज़वी जी के निर्देशन में ‘ताम्रपत्र’ नाटक की रिहर्सल चल रही थी। ‘ताम्रपत्र’ में मैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का दावा करने वाले त्विषामपति (घनश्याम शेन्द्रे) के विद्रोही स्वभाव वाले बेटे बासु की भूमिका में था। सलीम भाई का यूं ही कभी-कभी ‘ताम्रपत्र’ की रिहर्सल के दौरान आना होते रहता। सलीम भाई, रिज़वी साहब के काफ़ी क़रीब थे। दिल के साफ़ सलीम भाई में एक अलग ही किस्म का अक्खड़पन था। उन्हीं के मोहल्ले में रहने वाले रंगकर्मी इस्माइल नवाब ख़ान जो साहेब भाई के नाम से जाने जाते हैं, ने बताया था कि किसी समय में गुस्सा सलीम की नाक पे सवार रहता था। रिज़वी साहब के ‘अग्रगामी’ थियेटर से जुड़ने से पहले मैंने सलीम भाई को नुक्कड़ नाटक ‘जंगीराम की हवेली’ (1984) में अभिनय करते देखा था। इसके अलावा नाटक ‘केम्प’ में भी सलीम भाई का महत्वपूर्ण किरदार था, जिसका मंचन कालीबाड़ी (बूढ़ापारा) के सांस्कृतिक मंच पर हुआ था। ये दोनों ही नाटक मशहूर नाट्य निर्देशक मिर्ज़ा मसूद साहब की नाट्य संस्था ‘अवंतिका’ के बैनर तले हुए थे। सलीम भाई को शेर-ओ-शायरी का भी बड़ा शौक़ था। न जाने कितने ही शेर उन्हें मुंह ज़बानी याद थे।

इसे तारीफ़ के बोल न समझें, ‘ताम्रपत्र’ की रिहर्सल के उस दौर में मेरा चेहरा काफ़ी मासूम हुआ करता था, आज की तरह सख़्त नहीं। मासूम चेहरे को देख सलीम भाई मुझे रोहन कपूर कहकर पूकारा करते। रोहन कपूर मशहूर गायक स्व. महेन्द्र कपूर के बेटे हैं। उन्होंने मशहूर फ़िल्म डायरेक्टर यश चोपड़ा व्दारा निर्देशित फ़िल्म ‘फ़ासले’ से हीरो के रुप में अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की थी। रोहन कपूर की फ़िल्मों में अभिनय की पारी सफ़ल नहीं रही और वे गायक बन गए। भले ही सलीम भाई मुझे रोहन कपूर कहते रहे, सच तो यह था कि मेरा चेहरा रोहन के कहीं आसपास भी नहीं टिकता था।

एक दौर ऐसा आया जब ख़ूब मस्ती भरी ज़िंदगी से ख़ुद को अलग करते हुए मैं पढ़ाई के प्रति बेहद गंभीर हो गया और छत्तीसगढ़ कॉलेज़ में शुरुआती दो साल रहने के बाद 1986 में दुर्गा कॉलेज़ में बी.कॉम. फाइनल में एडमिशन ले लिया। सायकल से कॉलेज़ आना-जाना हुआ करता था। कॉलेज़ जाने पर पता चला कि दुर्गा कॉलेज़ के सायकल स्टैंड का ठेका सलीम भाई व उनके क़रीबी लोगों के पास है। कोई अपनी दुपहिया स्टैंड के बाहर रख दे तो उसकी ख़ैर नहीं होती थी। सलीम भाई बेरहमी से हाथ ठेले में इधर-उधर खड़ी सायकलों को पटकवाते और सीधे स्टैंड भिजवाते। एक बार ज़ल्दबाजी में मेरी सायकल स्टैंड के बज़ाय कॉलेज़ केम्पस के ही भीतर दूसरी जगह पर खड़ी रह गई। बस फिर क्या था, सलीम भाई ने इधर-उधर खड़ी और सायकलों के साथ मेरी भी सायकल को ठेले में डलवाया और अपने सहयोगी पर चिल्लाते हुए सायकल स्टैंड में ले जा पटकने कहा। संयोग से उसी समय मेरा पहुंचना हुआ… मैं बोल पड़ा- “अरे सलीम भाई, मेरी सायकल…” सलीम भाई तेज आवाज़ में बोले- “तूम भी कमाल करते हो रोहन कपूर…” फिर मेरी सायकल ठेले से ससम्मान सलीम भाई के आदमियों ने उतार दी…

27 अक्टूबर 2000 को रिलीज़ हुई छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘मोर छंइहा भुंइया’ ने ताबड़तोड़ सफलता हासिल की थी। राजधानी रायपुर के हृदय स्थल कहलाने वाले जयस्तंभ चौक से थोड़ी दूर आनंद टॉकीज़ वाले रास्ते पर स्थित बगिया रेस्टॉरेंट में ‘मोर छंइहा भुंइया’ की सफलता का जश्न मनाया जा रहा था। उस जश्न में ‘छंइहा भुंइया’ की टीम के अलावा बहुत से अन्य आमंत्रित लोग मौजूद थे। कुछ ऐसा घटित हुआ कि सलीम अंसारी अपने कुछ साथियों के साथ उस जश्न वाले माहौल में पहुंचे और सीधे ‘छंइहा भुंइया’ के डायरेक्टर सतीश जैन से उलझ पड़े। सतीश जी आव देखे न ताव, सीधे सलीम भाई पर आक्रामक अंदाज़ में हमला बोल दिए। जश्न किनारे लग गया और वातावरण बेहद तनावपूर्ण हो गया। कुछ साल गुज़रे, सतीश जी व सलीम भाई एक दूसरे के संपर्क में आए। फिर तो मानो एक दूसरे की ज़रूरत ही बन गए। सतीश जी की कोई फ़िल्म शुरु हो और उसमें सलीम भाई को अभिनय के अलावा दूसरा कोई दायित्व न मिले, ऐसा हो ही नहीं सकता था। सलीम भाई, सतीश जी के हमउम्र रहे होंगे। सलीम भाई के मन में ऐसा आदर भाव रहा था कि वे सतीश जी को पापा, सतीश जी की पत्नी सरिता जी को मां तथा बेटी रुनझुन को बहन कहा करते थे। सलीम भाई डायरेक्टर मनोज वर्मा के भी प्रिय रहे थे। मनोज वर्मा और मैं एक ही समय में दुर्गा कॉलेज़ में अध्ययनरत् थे। सलीम भाई और मनोज भाई दोनों कॉलेज़ के समय से ही एक दूसरे को जानते रहे थे। मनोज वर्मा ने उपन्यास ‘भूलन कांदा’ पर जब फ़िल्म ‘भूलन द मेज़’ शुरु की तो गंजहा जैसे बेहद चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने का दायित्व सलीम भाई को सौंपा। सलीम भाई गंजहा के किरदार को जी गए…

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