■ अनिरुद्ध दुबे
पिछले सप्ताह के ‘कारवां’ कॉलम में उल्लेख किया गया था कि नया रायपुर में बनी नई विधानसभा में होने जा रहा पहला सत्र अपने आप में ऐतिहासिक होगा। पहला तो सत्र की शुरुआत रविवार के अवकाश के दिन से होना ऐतिहासिक, दूसरा सत्र के पहले दिन का बहिष्कार करते हुए कांग्रेस विधायकगण सदन में न जाएं यह भी ऐतिहासिक। नये विधानसभा भवन में यह दोनों घटनाक्रम तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए ही, सदन के भीतर कुछ और भी ऐसे घटनाक्रम देखने मिले जो इतिहास के कुछ और नये पन्ने बनकर जुड़ गए।
सत्र के पहले दिन यानी रविवार को सदन की कार्यवाही शुरु होते ही वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने ‘विज़न 2047’ को विस्तार से पेश किया। सदन में विपक्ष यानी कांग्रेस विधायकगण तो मौजूद थे नहीं, लग रहा था पहला दिन सांय-सांय निकलेगा और चर्चा ज़ल्द ख़त्म हो जाएगी। लेकिन कहानी में ज़बरदस्त मोड़ आना अभी बाकी था। चौधरी के ‘विज़न 2047’ आने के बाद चर्चा में सबसे पहले हिस्सा लेने का मौका पूर्व मंत्री व वरिष्ठ भाजपा विधायक अजय चंद्राकर को मिला। चंद्राकर ने सवालों की झड़ी लगाते हुए चर्चा की शुरुआत की। शुरुआत में ही चंद्राकर ने जब व्यवस्था का प्रश्न सामने रखा, स्वाभाविक है उस पर 3 लोगों ने ज़रूर गहराई से सोचा होगा- विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, संसदीय कार्य मंत्री केदार कश्यप तथा वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने। व्यवस्था का प्रश्न खड़ा करने के बाद मानो चंद्राकर अपने हर वाक्य पर आइना दिखाते नज़र आ रहे थे कि ‘विज़न 2047’ तो ठीक है, वास्तव में प्रदेश आज कहां पर खड़ा है! सदन में विपक्ष मौजूद नहीं था, लेकिन चंद्राकर की हर लाइन अहसास कराती नज़र आ रही थी कि मानो आइना विपक्ष की तरफ का कोई क़ाबिल व्यक्ति दिखाता नज़र आ रहा हो। इसे संयोग ही कहें कि पिछले महीने पुरानी विधानसभा में हुए अंतिम एक दिवसीय विशेष सत्र में विधानसभा की 25 साल की यात्रा पर चर्चा में सबसे पहले अपनी बात रखने का अवसर भी चंद्राकर को ही मिला था। नई विधानसभा के पहले सत्र के अंतिम दिन सदन में ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा हुई, यह भी तो इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा।
नित नया प्रयोग करने
में माहिर नितिन नबीन
नितिन नबीन के भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने पर सबसे ज़्यादा राजनीतिक हलचल दिल्ली, बिहार व छत्तीसगढ़ में मची। फ़ैसला दिल्ली से होकर सामने आया, बिहार इसलिए कि नितीन नबीन वहीं के हैं तथा छत्तीसगढ़ इसलिए कि अभी तक की स्थिति में वह यहां के भाजपा प्रदेश प्रभारी हैं। भाजपा के इतिहास में पहली बार किसी कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है। पूर्व में कोई या तो राष्ट्रीय अध्यक्ष बना करता था या फिर राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष। माना जाता है कि भाजपा के संविधान में कार्यकारी अध्यक्ष जैसा कोई प्रावधान नहीं है। वर्तमान भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा भी 2019 में पहले कार्यवाहक अध्यक्ष बनाए गए थे, बाद में उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष घोषित कर दिया गया था। नितीन नबीन की नियुक्ति के पीछे मोदी व शाह सिर्फ़ दो लोगों की भूमिका होना बताया जा रहा है, यानी नागपुर का कोई रोल नहीं। फिर यह भी माना जाता रहा है सन् 2023 के चुनावी साल में बेहद कठिन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ में पुनः भाजपा की सरकार बनवाने का श्रेय जिन लोगों को जाता है उनमें नितीन नबीन भी हैं। 2023 के चुनाव के समय में ओम माथुर छत्तीसगढ़ के भाजपा प्रदेश प्रभारी व नितीन नबीन सह प्रभारी थे। 23 के चुनाव के बाद ओम माथुर छत्तीसगढ़ की तरफ नहीं पलटे और नबीन पूर्ण प्रभारी हो गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में नबीन ने छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण भूमिका तो निभाई ही, बाद में 2024 में रायपुर दक्षिण विधानसभा के लिए हुए उप चुनाव और 2025 में पूरे प्रदेश में हुए नगरीय निकाय चुनाव में भी नबीन का अहम् रोल रहा। माना जाता है कि नितिन नबीन की दृष्टि काफ़ी बारीक है। बड़े चुनाव की बात तो दूर, इसी साल हुए नगर निगम चुनाव में राजधानी रायपुर के दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में आने वाले एक वार्ड को उन्होंने अपने टारगेट में ले रखा था। रायपुर दक्षिण विधानसभा के विधायक सुनील सोनी व कुशल प्रबंधन के लिए अलग पहचान रखने वाले केदार गुप्ता के सामने नबीन ने लक्ष्य निर्धारित कर रखा था कि किसी भी कीमत पर यह वार्ड भाजपा की झोली में जाना चाहिए और वह वार्ड भाजपा की झोली में गया भी।
बहरहाल माना यह जा रहा है कि नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से आने वाले समय में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को फ़ायदा हो सकता है। नबीन कायस्थ समुदाय से आते हैं और पश्चिम बंगाल में कायस्थ मतदाताओं की बहुतायत है। उस बिहार में भी कायस्थ मतदाताओं की बहुतायत है जहां के नबीन रहवासी हैं। बिहार सरकार में वे इस समय पथ निर्माण मंत्री हैं।
छत्तीसगढ़ के नेता के भी
नाम पर हुआ था विचार
चर्चा तो ये भी है कि भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के लिए पूर्व में जिन तीन-चार नामों पर विचार हुआ उनमें एक नाम छत्तीसगढ़ से भी था। छत्तीसगढ़ के उन धांसू नेता का नाम बाद में इसलिए किनारे हो गया कि वे 50 से ऊपर के थे।
फिर दिखी बिलासपुर की
ताकत, एयरपोर्ट विस्तार
के लिए डेढ़ सौ करोड़
“दस्तकों का अब किवाड़ों
पर असर होगा ज़रूर
हर हथेली ख़ून से
तर और ज़्यादा बेक़रार…”
पिछले ‘कारवां’ कॉलम में बिलासपुर एयरपोर्ट मुद्दे पर लिखते हुए इस बात का उल्लेख किया गया था कि बिलासपुर वालों को अपनी लड़ाई लड़ना आता है। इसका एक और बड़ा उदाहरण अब सामने आया है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में हाल ही में चार दिनों का जो शीतकालीन सत्र हुआ उसमें पेश हुए अनुपूरक बजट में बिलासपुर एयरपोर्ट के विकास के लिए 150 करोड़ की घोषणा हो गई। बिलासपुर एयरपोर्ट के विस्तार के लिए सेना के हिस्से वाली ज़मीन तत्काल दिलवाई जाए, बिलासपुर से दिल्ली रेगुलर फ्लाइट चले, हैदराबाद के लिए नई फ्लाइट शुरु की जाए समेत अन्य मांगों को लेकर पिछले दिनों बिलासपुर के आंदोलनकरियों ने अपने शहर से लेकर दिल्ली तक में प्रदर्शन किया था। आंदोलनकारियों की आवाज़ सरकार के कानों में तो पहुंचनी ही थी।
पूर्व महापौर के बेटे
को कुत्ता काट खाया
रायपुर नगर निगम के पूर्व महापौर प्रमोद दुबे के बेटे को कुत्ता काट खाया। वाकई यह चिंताजनक बात है। ये उस समय की घटना है जब भीड़-भाड़ वाला समय था। घटना भी किसी व्यस्ततम चौक के पास की है। रायपुर नगर निगम में कुत्तों पर चिंतन-मनन कोई आज से नहीं बल्कि बरसों से होते आ रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले की बात है। वह महापौर-पार्षद वाला ज़माना नहीं था। तब प्रशासक नगर निगम का सर्वोच्च पद होता था, जिस पर कोई आईएएस अफ़सर विद्यमान होता था। हुआ यूं कि नगर निगम के जनसम्पर्क विभाग के एक सम्मानित कर्मचारी किसी विभागीय कार्य से प्रशासक महोदय के बंगले पहुंचे। साहब ने बंगले के लॉन में अपने पालतू महंगे कुत्ते को खुला छोड़ रखा था। उस ईमानदार कर्मचारी को भला कहां मालूम था साहब का कुत्ता खुला घुम रहा है। बंगले में घुसते ही कुत्ता उन पर झपट पड़ा और काट खाया। तत्कालीन प्रशासक महोदय ने इतनी सहृदयता ज़रूर दिखाई कि कर्मचारी को इंजेक्शन लगवाने में देर नहीं की। इस घटना से निगम के कर्मचारियों के बीच से दबे स्वर में ही सही आवाज़ उठी थी कि आवारा कुत्तों के आतंक का समाधान ढूंढने का काम नगर निगम का है। जब साहबों के कुत्ते ही इस तरह आम आदमी पर झपटने लगें तो फिर उन बेचारे आवारा कुत्तों का क्या दोष, जिनका कि कोई पालनहर्ता माई-बाप ही नहीं। छत्तीसगढ़ राज्य व रायपुर राजधानी बनी उस समय रायपुर महापौर तरुण चटर्जी थे। तरुण दादा की मेयर इन कौंसिल की बैठक में पहली बार आवारा कुत्तों की नसबंदी का प्रस्ताव लाया गया था। तब से आज तक रायपुर नगर निगम में आवारा कुत्तों को लेकर न जाने कितनी ही बार बहस हो चुकी है। राजधानी में आवारा कुत्तों का आतंक आज भी कायम है।
सावित्री को पद दिया
फिर वापस लिया…
रायपुर शहर जिला भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा अध्यक्ष पर श्रीमती सावित्री जगत की नियुक्ति हुई, फिर इस नियुक्ति को निरस्त करने में भाजपा प्रदेश संगठन ने देर भी नहीं लगाई। सावित्री की नियुक्ति तथा तूरंत बाद निरस्ति, दोनों स्थितियां न सिर्फ़ भाजपा बल्कि बाहर के लोगों को भी अचरज में डाल गई। माना यही जाता रहा है कि भाजपा में यूं ही कोई निर्णय नहीं हो जाता, काफ़ी सोच विचार के बाद होता है। जब निर्णय हो जाता है तो फिर तूरंत में वह वापस भी नहीं होता, लेकिन सावित्री जगत के मामले में कुछ ऐसा-वैसा हो गया। सावित्री जगत 2023 के विधानसभा चुनाव में रायपुर उत्तर सीट से भाजपा टिकट की मजबूत दावेदार थीं। तभी रायपुर उत्तर में पैराशूट उम्मीदवार पुरंदर मिश्रा चुनावी मैदान में उतर आए, न सिर्फ़ सावित्री अपितु संजय श्रीवास्तव, श्रीचंद सुंदरानी एवं केदार गुप्ता जैसे प्रबल दावेदारों के नाम किनारे लग गए। बाकी टिकट के प्रबल दावेदार तो चुनाव के समय शांति बनाए रखे, लेकिन सावित्री जगत पुरंदर मिश्रा के खिलाफ़ बागी होकर निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में चुनावी मैदान में उतर गईं। पुरंदर व सावित्री दोनों उत्कल समाज से हैं और रायपुर उत्तर में उत्कल समाज के मतदाताओं की बहुतायत है। तत्कालीन कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा व उनके लोगों ने यही अनुमान लगा रखा था कि पुरंदर व सावित्री के बीच वोटों का जो विभाजन होगा उसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा लेकिन अनुमान गड़बड़ा गया। पुरंदर जीत गए और जुनेजा तथा सावित्री दोनों को हार मिली। बागी होकर चुनाव लड़ने के कारण सावित्री भाजपा से निष्कासित तो हुई थीं पर ज़ल्द उनकी पार्टी में वापसी भी हो गई। बताते हैं एक बड़े नेता की सिफ़ारिश पर कुछ ही दिनों पहले सावित्री जगत की रायपुर शहर जिला भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा पर नियुक्ति तो हो गई लेकिन असंतोष के स्वर उठने में भी देर नहीं लगी। रायपुर उत्तर के ही भाजपा के कुछ बड़े चेहरों ने संगठन में अपनी बात रखते हुए कहा कि थोड़े समय पहले ही पार्टी में वापस लौटी नेता को बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपना ज़मीनी नेताओं व कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने वाला होगा। यदि निर्णय बरक़रार रहा तो फिर कांग्रेस व भाजपा में अंतर क्या रह जाएगा! शिकायत करने वाले भाजपा के इन बड़े चेहरों ने संगठन के सामने कांग्रेस भाजपा में अंतर वाली बात का उदाहरण क्या ध्यान में रखते हुए दिया, बहुतेरे लोग इसे समझने की कोशिश में लगे हुए हैं।

