● फ़्लैशबैकः 31 साल पहले… राजनीति व कानून व्यवस्था की बिगड़ी तस्वीर पेश करती ‘दलपति’…

■ अनिरुद्ध दुबे

बरसों पहले रजनीकांत, ममुटी, अरविंद स्वामी एवं अमरीश पुरी जैसे फ़ेमस कलाकारों वाली फ़िल्म ‘दलपति’ आई थी। ‘दलपति’ का मूल संस्करण तमिल में था, बाद में यह हिन्दी में डब होकर आई। मणि रत्नम जैसे जाने-माने निर्देशक ने इस फ़िल्म को निर्देशित किया है। साउथ में किसी फ़िल्म की कहानी पर किस तरह काम होता है यह ‘दलपति’ देखकर समझा जा सकता है। ‘दलपति’ की रफ़्तार धीमी लग सकती है, लेकिन यह बांधे रखने वाली फ़िल्म है। इस फ़िल्म का एक गाना “जानेमन आजा आजा… तू लगती क्या मस्तानी है…” उस दौर में काफ़ी सुना गया था। मेरे व्दारा ‘दलपति’ पर लिखी गई समीक्षा का प्रकाशन 4 जनवरी 1995 को हुआ था। आप सबके सामने एक बार फिर प्रस्तुत है-

● मणि रत्नम की ‘रोजा’ के बाद ‘दलपति’

मणि रत्नम की ‘रोजा’ के बाद ‘दलपति’ भी आ गई। ‘रोजा’ की तरह ‘दलपति’ भी पहले तमिल में बनी। बाद में हिन्दी में डब हुई। ‘रोजा’ और ‘दलपति’ में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। ‘रोजा’ कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद की समस्या पर आधारित है और दलपति’ सामाजिक मूल्यों के गिरते हुए स्तर पर केन्द्रित है। बारीक़ी से देखा जाए तो ‘रोजा’ से ज्यादा ‘दलपति’ का निर्माण करना मणि रत्नम के लिए कठिन रहा होगा। ‘दलपति’ की कहानी लम्बी है। कई सारे पात्र हैं। कहानी में अनेक मोड़ आते हैं। ‘रोजा’ की तरह ‘दलपति’ कहीं से सीधी- सपाट नहीं चलती। यदि ‘दलपति’ के बारे में बिना कुछ सुने उसे आप थियेटर में देखने पहुंचें तो आप आसानी से यह अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि फ़िल्म कब और किस जगह पर कैसा मोड़ लेगी। यहीं पर मणि रत्नम की सफलता है। उन्होंने अधिकांश दृश्यों में चमत्कारिक मोड़ लाया है। ‘दलपति’ देखने के बाद निष्कर्ष निकलता है कि मणि रत्नम ने न सिर्फ़ अच्छी कथा और पटकथा लिखी, निर्देशन भी ज़बर्दस्त किया। हो सकता है तेज रफ़्तार वाली फ़िल्में पसंद करने वाले दर्शकों को ‘दलपति’ कहीं-कहीं पर बोझिल लगे, इसलिए कि इसकी गति बेहद धीमी है। निर्देशक मणि रत्नम में कुछ तो ख़ास है तभी तो सुपर स्टार अमिताभ बच्चन भी उनसे प्रभावित हुए गिना नहीं रह सके। बीच में तो यह भी ख़बर उछली थी कि अमिताभ, मणि रत्नम की फ़िल्म करने वाले हैं।

जन्म लेने के कुछ ही देर बाद एक बच्चे को उसकी मजबूर मां ने मालगाड़ी के डिब्बे में डाल दिया। मालगाड़ी से वह बच्चा निचली बस्ती (स्लम एरिया) में जा पहुंचा। वहां उसे एक महिला ने अपनी औलाद मानकर गोद लिया और नाम दिया सूरज। सूरज (रजनीकांत) जवान होकर नामी दादा बन जाता है। गरीबों के साथ ज़्यादती करने वाले रमेश नामक आततायी की मौत सूरज के हाथों हो जाती है। रमेश की मौत से उसको पालकर रखने वाले शहर के नामी दादा देवराज (ममुटी) को झटका लगता है। बाद में देवराज को पता चलता है कि रमेश गरीबों के साथ ज़्यादती करने के कारण मारा गया। इसके बाद देवराज न सिर्फ सूरज को जेल से छुड़ाता है वरन उससे दोस्ती का हाथ भी मिलाता है। सूरज को देवराज अपने गिरोह का नेता बनाता है और नाम देता है ‘दलपति’। सूरज और देवराज दोनों गरीबों के हितैषी हैं। थानों या अदालतों के दरवाजे खटखटाने से गरीबों को न्याय भले ही नहीं मिलता हो लेकिन उनकी समस्याओं का हल सूरज और देवराज के पास जाकर ज़रूर निकल जाता है। अर्थात् सरकार की तरह देवराज और सूरज की समानांतर व्यवस्था चल रही होती है। देवराज और सूरज की दोस्ती शहर के एक चर्चित नेता कालीवर्धन (अमरीशपुरी) को सबसे अधिक खलती है। कालीवर्धन सूरज से अकेले में मिलकर उसे प्रलोभन देते हुए देवराज का साथ छोड़ने कहता है। लेकिन सूरज इस बात से इंकार कर देता है। इसके बाद देवराज के दिल में सूरज के प्रति इज़्ज़त और भी बढ़ जाती है। सूरज शोभा नाम की लड़की को चाहता है जो उसे हासिल नहीं होती। बाद में देवराज रमेश की विधवा पत्नी (भानुप्रिया) से सूरज का ब्याह करवा देता है।

एक नया मोड़ उस समय आता है जब देवराज और सूरज के शहर में अर्जुन (अरविंद स्वामी) कलेक्टर बनकर आता है। लोगों को न्याय दिलाने के नाम पर कदम-कदम पर सूरज एवं देवराज हिंसा का जो रास्ता अपनाते हैं वह अर्जुन को बिलकुल नापसंद होता है। अर्जुन उन दोनों को समझाइश भी देता है लेकिन वे मानने से इंकार कर देते हैं। इधर, सूरज ने जिस लड़की को चाहा था उसकी शादी अर्जुन से हो जाती है। इसके बाद फ़िल्म में एक के बाद एक दिलचस्प मोड़ है। पता चलता है कि अर्जुन सूरज का छोटा भाई हैं। इसके बाद मां सूरज से मिलने उसके पास पहुंचती है। इधर, देवराज सूरज से अर्जुन को ख़त्म करने कहता है। सूरज ऐसा करने से मना करता है। इससे देवराज को सूरज पर शक होता है। जब देवराज को मालूम होता है कि अर्जुन सूरज का छोटा भाई है और सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर वह सब कुछ किनारे लगाकर उसके साथ चला आया है, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। देवराज सूरज के साथ अर्जुन के सामने आत्मसमर्पण के लिए पहुंच जाता है। तभी कालीवर्धन के आदमी व्दारा चलाई गई गोलियों से देवराज मारा जाता है। दोस्त की हत्या का बदला सूरज कालीवर्धन को ख़त्म करके लेता है।

रजनीकांत, ममुटी, अरविंद स्वामी, भानुप्रिया एवं अमरीश पुरी सभी अपने किरदार पर खरे उतरे हैं। दाद देनी होगी मणि रत्नम की निर्देशन क्षमता की, कुछ दृश्यों में रजनीकांत एवं भानुप्रिया आमने-सामने होते हैं, लेकिन वहां कोई संवाद नहीं होता। वहां पूरा खेल एक्सप्रेशन का है। एक पीले कपड़े से मां व्दारा अपने बेटे सूरज की पहचान करना, इसके बाद मां जब सूरज से मिलने पहुंचे तो आकाश में सूरज का उदय होते दिखना निर्देशक की उच्च स्तरीय कल्पनाशीलता को दर्शाता है। फ़िल्म की हिन्दी में डबिंग काफ़ी अच्छी हुई है। राजनीति एवं कानून व्यवस्था की बिगड़ी हुई तस्वीर को पेश करती यह फ़िल्म दर्शकों के सामने कई सवाल खड़े करती है! इल्लया राजा के संगीत निर्देशन में फ़िल्म के एक-दो गाने अच्छे बन पड़े हैं। 95 के साल की शुरुआत में सिनेमा जगत के लिए ‘दलपति’ एक नायाब तोहफ़ा है।

(‘दलपति’ की समीक्षा का प्रकाशन दैनिक  ‘अमृत संदेश’ में हुआ था)

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