■ अनिरुद्ध दुबे
राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस से ठीक 3 दिन पहले 23 जनवरी को देशभक्ति पर केन्द्रित फ़िल्म ‘बॉर्डर- 2’ का प्रदर्शन देश भर के सिनेमाघरों में होने जा रहा है। ‘बॉर्डर-1’ के बाद ‘2’ में भी सनी देवल नज़र आएंगे। ‘बॉर्डर-2’, ‘बॉर्डर-1’ की आगे की कहानी बताई जा रही है। पहली की तरह दूसरी का भी विषय भारत-पाकिस्तान युद्ध है। ‘बार्डर-1’ के लिए मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर के लिखे गीतों “संदेसे आते हैं…” तथा “ऐ जाते हुए लम्हों ज़रा ठहरो…” ने धूम मचा दी थी। ‘बार्डर-2’ में भी ये दोनों गीत रखे गए हैं। दोनों गीतों का मुखड़ा तो वही है, बाद की लाइनें यानी अंतरा बदल दिया गया गया है। दो गानों के इस दोहराव वाले प्रयोग को कहीं पर सराहना मिल रही है, तो कहीं पर आलोचना। स्वयं गीतकार जावेद साहब ने कहा है कि “जो बीत गया उसे रीक्रिएट करने क्या ज़रूरत!” हाल ही में एक इंटरव्यू में जावेद साहब ने कहा कि “बार्डर-2 बनाने वाले मेरे पास आए थे कि गाने की बाद की लाइनों को नया लिखकर कुछ अलग किया जाए। मैंने मना कर दिया।“ जावेद साहब आगे कहते हैं- “नये गाने बनाओ या फिर मान लो कि आप उस लेवल का काम नहीं कर सकते। जब मैं ‘बॉर्डर-1’ के गाने लिख रहा था तो मेरे सामने ‘हक़ीक़त’ जैसी फ़िल्म थी, जिसका कालजयी गाना “कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों…” सामने था, लेकिन मैं अलग तरह से गाने लिखा।“

‘बॉर्डर-2’ के निर्माता टी. सीरीज़ वाले भूषण कुमार हैं व निर्देशन किया है अनुराग सिंह ने। ‘बॉर्डर-2’ में प्रमुख भूमिकाएं सनी देओल, वरुण धवन, दिलजीत दोसांझ, अहान शेट्टी, मोना सिंह, सोनम बाजवा, आन्या सिंह और मेधा राणा की हैं।
‘बॉर्डर-1’ का प्रदर्शन 12 जून 1997 को हुआ था। राजधानी रायपुर के ऐतिहासिक बाबूलाल सिनेमाघर में सुबह 5 बजे का पहला शो देखने के बाद मैंने इस फ़िल्म की समीक्षा लिखी थी, जिसका प्रकाशन 13 जून 1997 को हुआ था। पुरानी ‘बॉर्डर’ की समीक्षा एक बार पुनः आपके समक्ष प्रस्तुत है…

● भारत-पाकिस्तान जंग
पर आधारित बॉर्डर
जे.पी. दत्ता की गिनती लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले निर्माता निर्देशकों के बीच होती रही है। ‘गुलामी’, ‘क्षत्रिय’ एवं ‘हथियार के बाद अब दत्ता ने देशभक्ति पर आधारित फ़िल्म ‘बार्डर’ बनाई है। इस फ़िल्म के बारे में दत्ता का कहना है ‘बॉर्डर’ मेरे अपने सगे भाई की 1971 में लड़ी हुई जंग पर आधारित आत्मकथा है, जो वायुसेना में था। इस जंग में लोंगोवाल कस्बे से पाकिस्तानी फौज भारत में प्रवेश करना चाहती थी। फ़िल्म का क्लाइमेक्स 5 दिसंबर की भयानक रात का दिल दहला देने वाला दृश्य पैदा करता है, जब पंजाब की 23 टुकड़ी कर्नल हुसैन के हथियार डालने के प्रस्ताव को ठुकराकर केवल अपने 120 जवानों और बहुत कम गोला-बारूद एवं हथियारों से सारी रात डटकर उनका मुकाबला करती है। मेजर कुलदीप सिंह की इस टुकड़ी को 6 दिसंबर की सुबह वायु सेना से मदद मिलती है।
मेजर कुलदीप सिंह की भूमिका सन्नी देवल ने निभाई है। कुलदीप सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले सैनिकों की भूमिका में सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना, सुदेश बेरी, पुनीत इस्सर एवं कुलभूषण खरबंदा नजर आए हैं। वायुसेना के मेजर का किरदार जैकी श्राफ ने निभाया है।
फ़िल्म के क्लाइमेक्स में भारत-पाकिस्तान सेना के बीच युद्ध वाला दृश्य दमदार बन पड़ा है। शुरू में दिखाए गए दो गीत ज़रूर फिल्म की रफ्तार में बाधक लगते हैं। “संदेसे आते हैं…” फ़िल्म का सबसे बेहतरीन गीत है। जावेद अख्तर की इस रचना को संगीत से सजाया है अनु मलिक ने। फ़िल्म में संगीत को लेकर एक प्रयोग हुआ है। अनु मलिक का संगीत सिर्फ़ गानों में है। बाकी पार्श्व संगीत आदेश श्रीवास्तव का है। सबसे लंबी भूमिका सनी देवल को सौंपी गई। अपने रोल को सनी अच्छे से निकाल ले गए है। सुनील शेट्टी ने सैनिक की भूमिका के लिए जान तो लड़ा दी लेकिन पीछे की तरफ बढ़े हुए लंबे बाल नजर आने के कारण उनका व्यक्तित्व सैनिक के रूप में नहीं उभर पाया। अक्षय खन्ना का काम बढ़िया है। यहां पर तारीफ करनी होगी निर्देशक की जिसने इस नये कलाकार से अच्छा काम लिया। जैकी श्राफ, सुदेश बेरी, पुनीत इस्सर और कुलभूषण खरबंदा निराश नहीं करते। पूजा भट्ट ने इस फ़िल्म में साबित कर दिखाया है कि यदि उसे मौका मिले तो उसमें कुछ कर गुज़रने की क्षमता है। राखी, तब्बू, शबर्नी मुखर्जी और सपना बेदी की भूमिकाएं काफ़ी सीमित हैं।
चिट्ठियों के पहुंचने पर उन्हें हासिल करने के लिए सैनिकों का उतावला होने वाला दृश्य लाज़वाब है। जे.पी. दत्ता लेखन व निर्देशन दोनों के लिए तारीफ़ के पात्र हैं।
(समीक्षा का प्रकाशन दैनिक देशबन्धु)

