● फ्लैश बैक- 19 साल पहले… ‘गांधी माई फादर’ में महात्मा गांधी ने कहा- “दो सबसे बड़े ग़म, दोस्त जिन्ना व बेटा हरिलाल”

■ अनिरुद्ध दुबे

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 30 जनवरी 2026 को 78 वीं पुण्य तिथि है। इस बीच फ़िल्म ‘गांधी माई फादर’ का स्मरण हो आया, जो 3 अगस्त 2007 को रुपहले पर्दे पर पहुंची थी। इस पर मेरे व्दारा लिखी समीक्षा का प्रकाशन 4 अगस्त 2007 को हुआ। ‘गांधी माई फादर’ दो पात्रों के इर्द-गिर्द घुमती है- महात्मा गांधी एवं उनके सबसे बड़े बेटे हरिलाल। वास्तव में यह पिता-पुत्र के टकराव की वो कहानी है जो मन को झकझोर कर रख देती है। बेटे को पिता से बड़ी शिकायतें हैं, वहीं पिता के मन में बेटे के प्रति बड़ी समझाइश का भाव! पिता-पुत्र के व्दंव्द के बीच पिसती माता कस्तूरबा गांधी। महात्मा गांधी का रोल किया दर्शन ज़रीवाला ने और हरिलाल के किरदार में नज़र आए अक्षय खन्ना। दोनों ने ही अपने किरदार को मानो जीवंत कर दिया। कस्तूरबा गांधी बनीं शेफाली शाह की भूमिका को भी कम नहीं आंका जा सकता। फ़िल्म में एक जगह पर महात्मा गांधी का संवाद है- “मेरे जीवन का सबसे बड़ा ग़म दो इंसान हैं, एक मेरे दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरा बेटा हरिलाल।“

महात्मा गांधी की पुण्य तिथि पर ‘गांधी माई फादर’ की समीक्षा एक बार पुनः आप सबके सामने प्रस्तुत है-

● ‘गांधी माई फादर’, एक ईमानदार कोशिश

स्कूली जीवन में कदम रखते ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का दर्शन जानने को मिलता है। उन्हें सत्य व अहिंसा का पूजारी कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन को पारदर्शी रखा। ‘सत्य के प्रयोग’ किताब लिखी। इसे उनकी आत्मकथा के रूप में भी जाना जाता है। गांधी का व्यक्तित्व एक महासागर की तरह है। उनके सिद्धांत प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। बापू के जीवन के कुछ अनछुए पहलू भी हैं जिन्हें ‘गांधी माई फादर’ से पर्दे पर उतारने का साहसिक काम हुआ। फ़िल्म बापू व उनके बड़े बेटे हरिलाल गांधी के इर्द-गिर्द घूमती है। गांधी पर ‘गांधी’ (रिचर्ड एटनबरो) जैसी फ़िल्म जो बनी, वो उनकी महानता को प्रदर्शित करती है, जबकि ‘गांधी माई फादर’ में वास्तविकता का चित्रण है। पिता को लेकर पुत्र के तनावपूर्ण संबंधों का चित्रण। ‘गांधी माई फादर’ में ख़ासियत यह है कि गांधी के चरित्र पर ना कोई प्रश्न चिन्ह लगाया गया है, न ही हरिलाल के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की गई है। लगता है इतिहास के पन्नों से जो भी तथ्य मिले उसे यथास्थिति रख दिया गया। ये ‘गांधी माई फादर’ बनाने वालों की ईमानदार कोशिश है।

मोहनदास करमचंद गांधी (दर्शन ज़रीवाला) के चार पुत्रों में से सबसे बड़े हैं हरिलाल (अक्षय खन्ना)। पिता मोहनदास पूरी मानव जाति के कल्याण में लगे हुए हैं। रंगभेद नीति के खिलाफ़ हैं। भारत को अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ाद कराना उनका सपना है। हरिलाल कुंठाग्रस्त जीवन जी रहे हैं। उनके दिमाग़ में यह बात घर कर चुकी है कि दुनिया के कल्याण की बात करने वाला पिता उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहा, जबकि वह कर सकता है। हरिलाल की इस सोच ने उन्हें विद्रोही बना दिया। बापू जिन सिद्धांतों की व्याख्या करते हरिलाल उनके विपरीत चलते। शराब पी। मांस खाया। धर्म परिवर्तन कर हिन्दू से मुसलमान बने। वेश्याओं के पास गए। बाद में मां कस्तूरबा गांधी (शेफाली शाह) की हिदायत पर वापस हिन्दू धर्म अपनाया। हरिलाल का पूरा जीवन तबाह हो गया। उनकी पत्नी गुलाब गांधी (भूमिका चावला) की असमय मौत हो गई। उनके बच्चों को बापू के आश्रम में शरण लेनी पड़ी। हरिलाल गुमनामी की ज़िन्दगी जीये और गुमनामी की मौत ही मरे।

फ़िल्म काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है। कई दृश्य दिल को छू जाते हैं। हरिलाल के साथ गांधी जुड़ा होने पर दुनिया उनके कृत्यों पर परदा ढंकना चाहती है पर पिता गांधी न्याय पर ही अड़े रहते हैं। दिशाहीन होने के बाद ऐसे हर दृश्य जिसमें हरिलाल पिता या मां के साथ संवाद करते नज़र आए हैं, आंखों में नमी ला देते हैं। महात्मा गांधी के अंतिम संस्कार वाला दृश्य जिसमें हरिलाल भीड़ के धक्के खा रहे होते हैं वह झकझोरने वाला है। सरकारी अस्पताल में जिस अनजान आदमी की मौत होती है उसकी जेब से दो तस्वीरें मिलती हैं। एक में बापू व मां, दूसरी में पत्नी गुलाब। इन्हीं तस्वीरों से हरिलाल की शिनाख़्त होती है। महात्मा गांधी का संवाद है- “मेरे जीवन का सबसे बड़ा ग़म दो इंसान हैं, एक मेरे दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरा बेटा हरिलाल।“ तीस और चालीस के दशक में जो देश-काल और परिस्थितियां रही होंगी उसे पर्दे पर उतारने कड़ी मेहनत हुई है। पुराने ज़माने की कार, पुराना रेल इंजन, पुराने कपड़े, पुराने बाज़ार। फ़िल्म के निर्माता अनिल कपूर कहते हैं- “अक्षय खन्ना तो पैदा ही हरिलाल का रोल करने के लिए हुआ है।“ बिलकुल सच है। फ़िल्म के बाकी किरदार भी एकदम फिट हैं। फ़िल्म के लेखक-निर्देशक फिरोज़ अब्बास ख़ान कहते हैं- “महात्मा गांधी हमेशा मेरे आदर्श रहेंगे। मैं दूसरों के सहारे गांधी को समझते हुए बड़ा हुआ हूं।“ लेखक-निर्देशक की इस बात में पवित्रता नज़र आती है। ‘गांधी माई फादर’ को ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए। रंगभेद के खिलाफ़ लड़ने वाले दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला और ना जाने कितने लोग गांधी के रास्ते पर चले। गांधी, गांधी रहेंगे। सादर वन्दे।

(समीक्षा का प्रकाशन सांध्य दैनिक ‘हाईवे चैनल’)

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