■ अनिरुद्ध दुबे
राजनीति में गहरी जिज्ञासा रखने ज़्यादातर लोग इन दिनों 3 बड़े सवालों का ज़वाब खोजने की कोशिश में लगे हुए हैं। नितिन नबीन के भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद अब भाजपा का नया छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रभारी कौन होगा? क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर कहीं और एडजस्ट किया जाएगा, अगर ऐसा हुआ तो उनकी जगह कौन लेगा? प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसे मिलेगी?
बात नितीन नबीन की करें। 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद जब भाजपा बेहद कठिन दौर से गुज़र रही थी, ठीक 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को संकट से उबारने वालों में जो दो बड़े नाम रहे वे तत्कालीन भाजपा प्रदेश प्रभारी ओम माथुर व तत्कालीन सह प्रभारी नितिन नबीन थे। लोकसभा चुनाव की बारी आई तो नितिन नबीन भाजपा सह प्रभारी से मुख्य प्रभारी बन चुके थे। विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भी छत्तीसगढ़ में भाजपा का शानदार प्रदर्शन रहा। यही नहीं ट्रिपल इंजन सरकार का नारा चला और छत्तीसगढ़ में हुए नगर निगम व पालिका चुनाव तक में नबीन जमकर जुटे रहे। इससे पहले देखने में यही आया करता था कि भाजपा प्रदेश प्रभारी की नगरीय निकाय चुनावों में कोई बड़ी भूमिका नहीं हुआ करती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कभी छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे थे और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नक्सलवाद ख़ात्मे को लेकर ‘मिशन मार्च 2026’ के चलते लगातार छत्तीसगढ़ आना होते रहा, इस तरह बड़े मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाले ये दोनों नेता छत्तीसगढ़ की तासीर से ख़ूब अच्छी तरह परिचित रहे हैं। हो सकता है कि मोदी और शाह के इस रुचिकर छत्तीसगढ़ प्रदेश में किसी बड़े क़द के नेता को ही प्रभारी का दायित्व सौंपा जाए! वैसे कौन बनेगा छत्तीसगढ़ का अगला प्रभारी, इसका ज़वाब प्रदेश के बड़े से बड़े भाजपा नेताओं के पास नहीं है!
पिछले कुछ दिनों से हवा बनी हुई है कि किसी बड़े लीडर को छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी दी जा रही है। वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की क़ाबिलियत का इस्तेमाल पार्टी कहीं और पर करेगी। विशेषकर दिल्ली दरबार में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत विधानसभा नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व मंत्री टी.एस. सिंहदेव और दीपक बैज का बुलावा आया उसके बाद से ही अटकलें तेज हो गईं कि प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसी और को सौंपी जा सकती है। सवाल यह कि किसी और को सौंपी जाए तो प्रमुख नाम कौन? ज़्यादा चर्चा तो सिंहदेव के ही नाम की है। बताते हैं 2023 में सरकार बदलने के बाद एक अवसर आया था जब सिंहदेव को प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी देने पर विचार हुआ था। सिंहदेव इस ज़िम्मेदारी के लिए थोड़ा समय लेना चाह रहे थे। तो क्या वह समय आ गया है? राजीव भवन में गहरी दख़ल रखने वाले कुछ लोगों का तो यही मानना है कि यदि दिल्ली वाले अब बाबा का मन टटोलेंगे तो शायद वह अध्यक्ष पद के लिए मना न करें। फिर उन्हें डॉ. चरणदास महंत का भी साथ मिल सकता है। यह ज़रूर है कि प्रदेश अध्यक्ष के लिए भूपेश बघेल की पहली पसंद युवा विधायक उमेश पटेल हो सकते हैं।
बात करें प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद की। इस पद से फूलो देवी नेताम काफ़ी पहले इस्तीफ़ा दे चुकी हैं। महिला कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा समेत दिल्ली के कुछ अन्य कर्ता-धर्ताओं ने जब जानने की कोशिश की कि प्रदेश नेतृत्व के लिए कौन उपयुक्त हो सकता है तो यहां से विधायक संगीता सिन्हा समेत तुलिका कर्मा, छन्नी साहू, ममता चंद्राकर एवं लक्ष्मी ध्रुव का नाम ऊपर गया था। इन सबका दिल्ली बुलावा भी हुआ। अब सुनने में आ रहा है कि संगीता सिन्हा व छन्नी साहू में से किसी एक का नाम तय होना है। सूत्र बताते हैं भूपेश बघेल संगीता सिन्हा के पक्ष में हैं, जबकि दूसरे बड़े क़द के दो नेताओं का छन्नी साहू को समर्थन है।
दो महीने और नक्सलवाद
के खिलाफ़ निर्णायक लड़ाई
नक्सलवाद के ख़ात्मे के लिए चलाए जा रहे ‘मिशन मार्च 2026’ को आज 1 तारीख़ से हिसाबें तो ठीक दो महीने बचे हैं। 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य है। रेड कॉरीडोर बिछाकर नक्सलियों के घर वापसी का जो अभियान चलाया गया था उसकी अंतिम तारीख़ 31 जनवरी मानी जाती रही है। तो क्या अब नक्सलियों के खिलाफ़ ताबड़तोड़ कार्रवाई होगी? माना तो यही जा रहा है कि फोर्स के कदम रुकने वाले नहीं। तभी तो लाल आतंक का गढ़ मानी जाती रही कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराकर जवानों ने बड़ा संदेश दिया। इस सबके बाद भी सरकार व बस्तर में ऑपरेशन पर लगातार नज़र रख रहे कानून व्यवस्था के ज़िम्मेदार लोगों की फ़िलहाल चिंता कम नहीं हुई है। 19 या 20 जनवरी की बात है जब बीजापुर जिले के पामेड़ थाना क्षेत्र के कावरगट्टा गांव में नक्सलियों ने एक पूर्व सरपंच की गोली मारकर हत्या कर दी। फिर कर्रेगुट्टा समेत बस्तर में न जाने कितने ही स्थानों पर आईईडी विस्फोट ज़मीन के भीतर अब भी बिछा पड़ा है। इस आईईडी विस्फोट में बरसों से ग्रामीण व सूरक्षा में डटे रहने वाले जवान जान गंवाते रहे हैं या दिव्यांगता के शिकार होते रहे हैं। बस्तर में अब तक डेढ़ हज़ार से ऊपर नक्सलियों का समर्पण हो चुका है। माना यही जा रहा है कि शस्त्रधारी और गैर शस्त्रधारी मिलाकर 300 से अधिक नक्सली अब भी बस्तर के दुर्गम इलाकों में सक्रिय हैं। यानी नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ का लक्ष्य बहुत दूर नहीं तो बहुत पास भी नहीं है। फरवरी-मार्च का महीना निर्णायक होगा। ठंड का मौसम रवानगी पर है और दिन बड़े होने लगे हैं। परिस्थितियां जवानों के अनुकूल होती जा रही हैं। बचे-खुचे लोग समर्पण के रास्ते पर न चले तो फरवरी-मार्च में बस्तर के शेष नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बंदूकों की धांय-धांय गूंजेगी।
चोरों ने 60 फुट लंबे
पुल पर ही कर
दिया हाथ साफ़…
श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ को साहित्य जगत में यूं ही कालजयी कृति नहीं कहा जाता। ‘राग दरबारी’ में व्यवस्था का मज़ाक उड़ाते हुए अनेकानेक चित्रण जो बारी-बारी से सामने आते हैं, उससे मिलते-जुलते कितने ही जीते-जागते प्रसंग यहां-वहां देखने मिलते रहते हैं। महान गीतकार प्रदीप ने किसी धार्मिक गाने की पहली लाइन “यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां…” जो लिखी, जिसमें बाद वाले धार्मिक शब्दों को हटाते हुए शुरुआती इन्हीं कुछ शब्दों को रखकर सोचें तो लगता है ‘राग दरबारी’ ‘कहां-कहां’ नहीं है। कोरबा हसदेव बायीं तट नहर में क़रीब 40 साल पहले बना लगभग 60 फुट लंबा और 5 पांच फुट चौड़ा पुल पिछले हफ़्ते रात में चोरी हो गया। वहां आसपास रहने वालों ने बताया कि रात 11 बजे का वक़्त रहा होगा जब हम पुल पर से होकर ही लौटे थे। सुबह हुई तो देखा पुल गायब है। पुल की मज़बूती का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है गर्डर के ऊपर मोटी-मोटी कई प्लेट लगाकर इसका निर्माण किया गया था। इतने सालों में उसका कोई भी कोना क्षतिग्रस्त नहीं हुआ था। चोरों के हौसले किस क़दर बुलंद हैं कि गैस कटर से पुल काटकर ही ले गए। कोरबा के सिविल लाइन थाना क्षेत्र में स्थित सीएसईबी पुलिस चौकी में इस पुल के चोरी होने की रिपोर्ट दर्ज़ हुई है। ऐसी अजीबोग़रीब चोरी जिला व पुलिस प्रशासन समेत वहां के नेतागण सब के लिए पहेली बनी हुई है।
‘साहित्य उत्सव’ में कुछ
इधर-उधर की बातें…
नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में पिछले दिनों हुए ‘रायपुर साहित्य उत्सव’ के आयोजन स्थल की साज सज्जा काफ़ी मनमोहक थी। देश के कई बड़े चर्चित चेहरे इस आयोजन का हिस्सा बने। काफ़ी योजनाबद्ध तरीके से हुए इस आयोजन को सराहने वाले काफ़ी लोग थे। मेहनत का फल मीठा ही होता है। जवान, अधेड़ से लेकर उम्रदराज़ सभी उम्र के लोग आयोजन स्थल पर नज़र आए। महान साहित्य विभूतियों को समर्पित अलग-अलग पंडाल बने हुए थे। मौसम भी मानो आयोजन पर मेहरबान था। ठंड जो कम हो चुकी थी। आयोजन की रुपरेखा बनाने वालों की तारीफ़ की जानी चाहिए कि तीन दिन चले इस उत्सव के सत्र सुबह ज़ल्दी शुरु कर शाम ढलने से पहले समाप्त कर दिए जाते रहे। व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह बिलकुल सही था। पुराने और नये रायपुर के बीच की खाई (दूरी) अब तक कम जो नहीं हो पाई है! फिर बात पुराने रायपुर की ही क्यों, छत्तीसगढ़ के दूसरे अन्य शहरों, कस्बों व गांवों की भी विभूतियां तो इस उत्सव में पहुंची हुईं थीं। जब आयोजन बड़ा हो तो वहां घुमते-फिरते लोग कई तरह की चर्चाएं करते नज़र आ जाते हैं। आयोजन स्थल के किसी कोने पर कुछ लोग बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान साहित्यकार मनोज रुपड़ा के साथ हुए अपमान वाली घटना पर हल्की-फुल्की चर्चा करते दिख गए। कोई कहता नज़र आया कि “मनोज रुपड़ा के उस अपमान वाली घटना पर हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. गौरी त्रिपाठी को पद से जो हटा दिया गया कहां का न्याय है! इसी को कहते हैं करे कोई, भरे कोई…”
राजधानी का एक
‘कुत्ता’ सब पर भारी
देश के जाने-माने व्यंग्यकार रहे प्रोफेसर विनोद शंकर शुक्ल से जुड़ी किसी याद को यहां फिर दोहराना पड़ रहा है। बरसों पहले विनोद शंकर शुक्ल रायपुर के छत्तीसगढ़ कॉलेज़ में पत्रकारिता की क्लास ले रहे थे। तभी कोई शरारती लड़का कुत्ते के भौंकने वाली आवाज़ निकालते तेजी से क्लास रूम के बाहर की तरफ से गुजरा। इससे चलती क्लास में कुछ क्षण के लिए व्यवधान पैदा हुआ। विनोद शंकर शुक्ल मुस्कराए और कहा कि “कुछ लोग होते हैं जो अपने पिछले जन्म के संस्कारों को नहीं छोड़ पाते।“ कितना क़रारा व्यंग्य था।
राजधानी रायपुर में प्रतिबंधित पिटबुल कुत्ता एक बार फिर राह चलते किसी को काट खाया। यह पॉश एरिया में रह रहे किसी संवेदनहीन आदमी का पालतू कुत्ता है, जो वहां आसपास रहने वालों या गुज़रने वालों के लिए लंबे समय से आफ़त बना हुआ है। पिछले साल भी इस पिटबुल कुत्ते ने एक डिलवरी ब्वॉय को बुरी तरह काट खाया था। तब भी काफ़ी हल्ला मचा था। चैनलों में ख़ूब चला था और अख़बारों में ख़ूब छपा था। भला कहां जिला, पुलिस या नगर निगम प्रशासन में दम कि इस कुत्ते या कुत्ते के मालिक के ख़िलाफ कुछ कर पाते। उस एरिया के आसपास रहने वाले बताते हैं- “पिछले साल जब इस हिंसक पिटबुल कुत्ते ने डिलवरी ब्वॉय को काटा और चैनलों व अख़बारों में वह ख़बर ख़ूब चली, उसके बाद से मानो यह जंगली कुत्ता उसके मालिक के लिए और बड़ा स्टेटस सिंबल बन गया। पहले की तुलना में वह और ज़्यादा शान से उसे टहलाने के लिए निकलने लगा।“ जंगली ख़ूख़ार कुत्ता राह चलते किसी आम आदमी को काटते रहे उससे भला प्रशासन में बैठे ज़िम्मेदार लोगों को क्या लेना देना! ज़्यादातर ज़िम्मेदार पदों बैठे लोगों का दर्द आधुनिक साज सज्जा से सुसज्जित कमरे के भीतर बातचीत के दौरान उभरता है, कभी माइक पर गूंजता है या फिर चैनलों के कैमरे के सामने झलकता है। ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग यदि कड़ाई बरत लें तो किसमें इतनी हिम्मत कि जंगली किस्म के कुत्ते को अपना स्टेटस सिंबल मानकर सड़कों पर सीना तानकर घूम ले…

