निर्देशक भूपेन्द्र साहू ने कहाः ‘मया दे दे मयारू- 2’ में ‘हमारापन’ देखने मिलेगा…

मिसाल न्यूज़/अनिरुद्ध दुबे

निर्देशक भूपेन्द्र साहू अपनी नई छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘मया दे दे मयारू- 2’ को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं, जो 10 अप्रैल को रुपहले पर्दे पर आ रही है। प्रेम चंद्राकर के साथ मिलकर भूपेन्द्र साहू ने इस फ़िल्म को निर्देशित किया है। प्रेम-भूपेन्द्र की जोड़ी कोई आज की नहीं, बरसों पुरानी है। भूपेन्द्र साहू कहते हैं- “हम हमेशा से छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति के बीच जिये। ‘मया दे दे मयारू- 2’ में हमारापन देखने को मिलेगा।

‘मिसाल न्यूज़’ की ‘मया दे दे मयारू- 2’ को लेकर भूपेन्द्र साहू से जो बातचीत हुई शब्दशः यहां प्रस्तुत है-

0 लंबे अर्से बाद प्रेम चंद्राकर व भूपेन्द्र साहू के एक साथ काम करने की ख़बर कानों में सुनाई पड़ी…

00 यह सच है कि किसी दौर में हम लंबा साथ रहे। फिर साथ काम करना बंद कर दिया। फिर प्रेम भैया लंबे समय तक फ़िल्म ‘लोरिक चंदा’ की तैयारी में लगे रहे और मैं ‘दईहान’ की। निर्माता अलक राय जी ने मुझसे कहा कि आप लोगों को मिलकर एक प्रोजेक्ट करना है। इस तरह हम एक बार फिर नया प्रोजेक्ट लेकर आ रहे हैं।

0 ‘मया दे दे मयारू- 2’ का आधार क्या है…

00 इंटरटेनिंग है, ज़बरदस्त स्क्रीप्ट है। शुरुआत में कहानी सीधी सपाट चलती है, फिर घुमाव है। मैंने व प्रेम जी ने जितनी भी फ़िल्में साथ की उनमें विलेन कहानी में ज़बरदस्त घुमाव लाता है।

0 प्रेम जी व आप दोनों छत्तीसगढ़ी लोक कला संस्कृति से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। आपकी फ़िल्मों में भी क्या इसका असर दिखता है….

00 लोक कला संस्कृति के बिना तो हम हैं ही नहीं। हमारापन हम कभी नहीं छोड़ेंगे। जहां ताज महल दिखाया जा सकता है हम वही दिखाएंगे, अनावश्यक रुप से एफिल टॉवर या बुर्ज़ खलीफ़ा दिखाने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। प्रेम भैया व मेरी सोच काफ़ी मिलती है, इसीलिए साथ होकर हम इतना काम कर पाए, बल्कि ये कहें कर रहे हैं।

0 जिस तरह दूसरी चीजें तेजी से बदलीं छत्तीसगढ़ी सिनेमा में भी बदलाव आया। क्या आप दोनों के सामने चुनौतियां नहीं बढ़ीं….

00 दोनों को इतने सालों का अनुभव जो रहा है। हम डिस्कशन करते हैं। जो करना हो आपस में तय करते हैं। मेरा ख़ुद का 14-15 सालों का भारत भवन (भोपाल) का अनुभव रहा है।

0 ‘मया दे दे मयारू- 2’ दो हीरो-दो हीरोइन वाली फ़िल्म है, कलाकारों के परफार्मेंस के बारे में क्या कहेंगे…

00 नये लड़के-लड़कियां काफ़ी टैलेंटेड हैं। फ़िल्म में कुछ लोगों ने ऐसा काम कर दिखाया है, लगता है सुनहरा भविष्य उनका इंतज़ार कर रहा है। अच्छा आर्टिस्ट वही है जिसके पीछे डायरेक्टर को ज़्यादा माथा पच्ची न करना पड़े।

0 छत्तीसगढ़ी सिनेमा को गति पकड़े पूरे 25 बरस हो गए। आप शुरुआती दौर से इसके गवाह रहे हैं। आज छत्तीसगढ़ी सिनेमा को कहां पाते हैं…

00 मुझे लगता है शुरुआती दौर में हम काफ़ी अच्छा काम कर गए। ‘मया दे दे मया ले ले’ एवं ‘परदेसी के मया’ की सफलता का दौर हमने देखा। सतीश जैन जी ने ‘मोर छंइहा भुंईया-1’ एवं ‘झन भूलौ मां बाप ला’ जैसी फ़िल्में दी। शुरुआती दौर में हर वर्ग का दर्शक छत्तीसगढ़ी फ़िल्मों को देखने सिनेमा हॉल जाते दिखा था। बाद के दौर की बात करें तो ख़ास वर्ग का दर्शक ही छत्तीसगढ़ी फ़िल्में देखने आ रहा है। सवाल यह कि एक बड़ा वर्ग छत्तीसगढ़ी फ़िल्मों से दूर क्यों हुआ!

0 ‘मया दे दे मयारू- 2’ के गीत-संगीत के बारे में क्या कहना चाहेंगे…

00 हमारा हमेशा से इस बात पर जोर रहा कि सिचुएशन के हिसाब से गाने हों। ये सही है कि कामर्शियल व इंटरटेनिंग इन दोनों बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है। कोशिश यही रहती है कि गाने दर्शकों को फ़िल्म के साथ जोड़ें।

0 आप बारूका गांव के हैं। फ़िल्म का अधिकांश हिस्सा बारूका या उसके आसपास ही शूट करते दिखते हैं…

00 कुदरत ने बारुका व उसके आसपास के इलाकों को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी जो बनाया है। वहां पर्वत, झरने, नदी, नाले, मंदिर क्या कुछ नहीं हैं।

0 इस बातचीत में ‘मया दे दे मयारू- 2’ पर आपकी अंतिम प्रतिक्रिया…

00 एक दौर में हम ‘मया दे दे मया ले ले’ व ‘परदेसी के मया’ जो बनाए थे वही फ्लेवर देने की कोशिश की है। फ़िल्म में हमने प्योर छत्तीसगढ़ी का इस्तेमाल किया है। फ़िल्म देखते समय नई जनरेशन को कोई शब्द समझ न आए तो दूसरों से समझने की कोशिश कर सकें कि इसका क्या मतलब होता है। अपनी भाषा की कद्र हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा।

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