कारवां (1 नवम्बर 2026) ● तारीख़- 31 अक्टूबर, स्थान- वीसी फार्म हाउस, घटना- दिग्विजय सिंह का कुर्ता फटना… ● गुजरात-छत्तीसगढ़ का अटूट रिश्ता… ● निगम-मंडल अध्यक्षों को भी स्मृति की खरी-खरी… ● निगम-मंडल अध्यक्षों को भी स्मृति की खरी-खरी… ● होर्डिंग्स नहीं परफार्मेंस दिखाओ… ● पीए की ज़मीनी मेहनत… ● भाई का ख़्याल रखना… ● फिर विवादों में फ़िल्म सिटी… ● घोसला उजड़ रहा तो तालाबों में ‘पक्षी विहार’ भी तो बन रहा…

■ अनिरुद्ध दुबे

31 अक्टूबर 2000। छत्तीसगढ़ राज्य बनने की बेला क़रीब। ठीक रात 12 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ होनी है।

29 अक्टूबर तक तो चर्चा यही रही थी कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के पहले मुख्यमंत्री होंगे। 30 अक्टूबर की सुबह दूसरी तरह की चर्चा का दौर शुरु हो गया कि मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस आलाकमान ने विद्या भैया की जगह कोई और नाम तय कर लिया है। 31 अक्टूबर की सुबह माज़रा बदल चुका था। तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह समेत कांग्रेस राष्ट्रीय महाचिव गुलाम नबी आज़ाद एवं वरिष्ठ नेत्री श्रीमती प्रभा राव रायपुर पहुंच चुके थे। वे अलग होने जा रहे छत्तीसगढ़ के तत्कालीन कांग्रेस विधायकों के लिए दिल्ली से श्रीमती सोनिया गांधी का पैगाम लेकर आए थे कि किसके नाम पर समर्थन देना है। जब तक दोपहर की दस्तक़ हुई हवा का रुख़ बदल चुका था। यह कहते हुए तत्कालीन कांग्रेस विधायकों को मैसेज दिया जा चुका था कि अजीत जोगी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। शुक्ल के लाभांडी स्थित फार्म हाउस राधेश्याम भवन में मौजूद शुक्ल समर्थक नेताओं व कार्यकर्ताओं को भी अब अहसास हो चुका था कि भैया मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो चुके हैं। राधेश्याम भवन में दोपहर 1 से 2 के बीच का वक़्त रहा होगा। बड़ी संख्या में निराश शुक्ल समर्थक राधेश्याम भवन के परिसर में मौजूद थे। धड़धड़ाते हुए एक कार राधेश्याम भवन के प्रवेश व्दार पर आकर रुकी, जिसमें से दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आज़ाद एवं श्रीमती प्रभा राव उतरीं। तीनों बड़े नेता शुक्ल के आशियाने की तरफ बढ़ ही रहे थे कि सबसे आगे चल रहे दिग्विजय सिंह के लिए आक्रामक स्वभाव वाले एक युवा नेता ने तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। फिर क्या था, वहां मौजूद बाकी नेता-कार्यकर्ता भी उत्तेजित हो गए। कुछ के मुंह से अपशब्द निकले तो कुछ ने दिग्विजय सिंह के साथ धक्का मुक्की की। धक्का मुक्की में दिग्विजय सिंह का कुर्ता फट गया। ज़बरदस्त शोऱ-शराबे की गूंज निवास के भीतर मौजूद विद्याचरण शुक्ल के कानों तक पहुंची और वे बाहर आए। बाहर उत्तेजनापूर्ण माहौल को देख शुक्ल ने अपने लोगों को डांटा-डपटा व तीनों नेताओं को निवास के भीतर ले गए।

इस घटनाक्रम को हुए चंद ही मिनट हुए होंगे, रायपुर नगर निगम के तत्कालीन कांग्रेस पार्षद बसंत गिरेपुंजे ने अपने मोबाइल से प्रेस के लैंड लाइन पर ‘कारवां’ कॉलम के इस लेखक को फोन लगाया और घटना की जानकारी साझा करना शुरु किया। गिरेपुंजे थोड़ी ही बात कह पाए थे कि उन्हीं के साथ वहां मौजूद दूसरे कांग्रेस पार्षद लखवंत सिंग गिल गुड्डा ने नाराज़गी जताते हुए फोन कटवा दिया। तब मैं सांध्य दैनिक ‘हाईवे चैनल’ अख़बार में था और उस समय हमारे रायपुर एडिशन छापने की तैयारी चल रही थी। इस क़लमकार ने डेस्क पर मौजूद साथी पत्रकार मित्रों से तेज आवाज़ में कहा कि विद्या भैया के फार्म हाउस में बवाल मच चुका है और दिग्विजय सिंह को घेरकर जमकर झूमा-झटकी की गई है। उस समय हमारे संपादक प्रभाकर चौबे जी थे और वे अपने खुले केबिन में मौजूद थे। इस क़लमकार की जोर की आवाज़ उनके कानों तक जा पहुंची। उन्होंने वहीं से डपटते हुए कहा कि “इधर-उधर की फालतू बातें छोड़कर काम पर ध्यान दो।“ चौबे जी का ऐसा कहना कहीं से ग़लत भी नहीं था। आख़िर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री जो थे। कोई भी मुख्यमंत्री सूरक्षा के घेरे में रहता है और अचानक किसी के कानों में यह सुनने मिले कि दिग्गी राजा बुरी परिस्थितियों में घिर गए कैसे यक़ीन किया जा सकता था। पांच से दस मिनट लगे होंगे। वीसी के फार्म हाउस में जो भी हुआ, और भी कुछ नेता इसकी पुष्टि कर चुके थे। फिर वह पूरी घटना शाम को ‘हाईवे चैनल’ अख़बार की ख़बर बन चुकी थी। ठीक 31 अक्टूबर की रात 12 बजे छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आ गया और अजीत जोगी ने पहले मुख्यमंत्री की शपथ ली।

विद्याचरण शुक्ल के फार्म हाउस में जो घटना घटी उस पर चुटकी लेते हुए गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि “हम तो सोचे थे ‘मिशन कश्मीर’ फ़िल्म देखेंगे, लेकिन यहां तो ‘मिशन छत्तीसगढ़’ फ़िल्म देखने मिल गई।“ संजय दत्त, ऋतिक रोशन, जैकी श्राफ एवं प्रीटी जिंटा स्टारर फ़िल्म ‘मिशन कश्मीर’ का प्रदर्शन उसी हफ्ते 27 अक्टूबर को हुआ था।

गुजरात-छत्तीसगढ़
का अटूट रिश्ता

गुजरात व छत्तीसगढ़ का मानो अटूट रिश्ता हो गया है। पूछिए कैसे- ‘छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026’ के शुभारंभ समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय श्रम, रोजगार, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मांडविया तथा समापन समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह होंगे। केन्द्र सरकार के ये दोनों ही मंत्री गुजरात से हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अति प्रिय हैं। अमित शाह का बस्तर प्रेम किसी से छिपा नहीं है। वहीं 2023 के विधानसभा चुनाव के समय में मनसुख मांडविया ने राजधानी रायपुर में रहते हुए भाजपा के लिए ज़बरदस्त फ़िल्डिंग की थी। तभी तो भाजपा के किसी राष्ट्रीय नेता ने रायपुर में कहा था कि “हमारे पास मोटा भाई ही नहीं छोटा भाई भी है।“

निगम-मंडल अध्यक्षों को
भी स्मृति की खरी-खरी

भाजपा की नई प्रदेश प्रभारी श्रीमती स्मृति ईरानी दिल्ली से मंत्रियों, सांसदों व विधायकों का रिपोर्ट कार्ड लेकर आई थीं इसकी चर्चा तो काफ़ी रही लेकिन निगम-मंडल में बैठे लोगों का भी हिसाब-किताब उनके पास था इस पर बात कम ही होती दिखी। 4 निगम-मंडल अध्यक्ष तो ऐसे थे जिन्हें मैडम ने काफ़ी ख़रा-खरा कहा। एक से कहा कि “आपको जो पद मिला है उसके अनुरुप आचरण करते हुए कितने व्यापारी संगठनों से जुड़े लोगों से जाकर मिले? और क्या यह जानने कि कोशिश की कि उद्योग व व्यापार को बढ़ावा देने कौन से स्टेप उठाने की ज़रूरत है? केवल रायपुर शहर की किसी ख़ाली पड़ी ज़मीन पर कोई बड़ा प्रोजेक्ट ले आने से काम नहीं चलेगा।“ बैंकिंग क्षेत्र से वास्ता रखने वाले किसी अध्यक्ष से मैडम ने पूछ दिया “सरकार बदलने के बाद भी कुछ जिलों में दूसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी के लोग अपनी दुकान जमाए बैठे हैं, उन लोगों का आपने क्या ईलाज़ किया?” तीसरे अध्यक्ष से कहा “सरकारी स्तर पर सिक्का जो जारी हुआ उस कार्यक्रम की क्या वर्तमान व पूर्व सम्मानित विधायकों समेत अन्य जनप्रतिनिधियों तक सूचना पहुंचाई गई थी?” चौथे अध्यक्ष से कहा कि “किसानों से सीधे जुड़ने क्या आपकी ओर से किस तरह का प्रयास हो रहा है? जिले स्तर पर आप अब तक कहां-कहां दौरा कर चुके हैं?”

होर्डिंग्स नहीं
परफार्मेंस दिखाओ

भाजपा छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रभारी बनने के बाद श्रीमती स्मृति ईरानी जब पहली बार छत्तीसगढ़ दौरे पर आईं तो ऊपर से नीचे तक संदेश पहुंचवा दिया गया कि नो होर्डिंग्स, नो फ्लैक्स। यहां तक कि सेल्फी के लिए बेताब रहने वाले भाई जी व बहन जी लोगों को भी तब भारी निराशा हाथ लगी जब स्मृति जी ने सीधे कह दिया कि कोई फोटो-वोटो नहीं, 3 साल का समय निकल चुका अब परफार्मेंस पर ध्यान दीजिए। मैडम को यहां भेजने से पहले दिल्ली में जिन राष्ट्रीय नेता ने उनका मार्गदर्शन किया था, उन्होंने साफ शब्दों में बता दिया था कि छत्तीसगढ़ ऐसी जगह है जहां होर्डिंग्स टांगने के नाम पर प्रचार युद्ध छिड़ा रहता है। फिर दिल्ली में मैडम को यह भी समझा दिया गया था कि होर्डिंग्स टंगवाने पैसा कहां का लगता है। इसलिए ऊपर से यही मंतर दिया जा चुका था कि फिलहाल पैसे की किसी तरह की बरबादी स्वीकार्य नहीं, किस नेता का परफार्मेंस कैसा है छत्तीसगढ़ जाकर जानना ज़रूरी है।

पीए की ज़मीनी मेहनत

कोई है एक निगम मंडल जिसके अध्यक्ष दिल्ली में सक्रियता बनाए रखते हैं, उनका पीए रायपुर में ख़ूब ज़मीनी मेहनत कर रहा है। ज़मीन मज़बूत करने तरह-तरह के संसाधन की ज़रूरत होती है और इस बात को पीए ख़ूब समझ रहा है। इसलिए संसाधन जुटाने में कोई कमी नहीं की जा रही। जब अध्यक्ष जी का ज़्यादा समय दिल्ली में कटे तो स्वाभाविक है कि उन्हें मिली सरकारी गाड़ी का उपयोग रायपुर में तो पीए ही करेगा। जब संसाधन जुटाने उस ख़ास गाड़ी में पीए निकले तो उसका ख़ास लोगों पर अलग ही असर पड़ना ही है। यदि ख़ास संसाधन जुटाना हो तो ख़ास नज़र आना भी ज़रूरी है। और ख़ास बनने के लिए ख़ास गाड़ी भी ज़रूरी है।

भाई का ख़्याल रखना

“भय बिनु होइ न प्रीति…” दोहे के इस अंश को आपने सुना होगा। प्रीत की जगह काम को रखते हुए “भय बिनु होइ न काम…” फार्मूले पर चलने की कोशिश दवा वाले क्षेत्र में हो रही है। दवा से संबंधित कुछ भी विज्ञापन निकले तो एक साहब का दबाव रहता है मेरे भाई को पार्टनर बनाओ। बड़े भाई जानते हैं परिवार से बढ़कर जीवन में कुछ नहीं होता। प्रदेश में जब चौथी सरकार थी तो एक अफ़सर ने अपने भाई बंधुओं के नाम पर पूरे गांव के गांव की सैकड़ों एकड़ ज़मीन का बड़ा ख़ेल कर दिया था। उन्होंने तो अपने घर में काम करने वाले मज़दूरों के नाम पर तक ज़मीनें चढ़ा दी थीं। और ख़ुद मज़दूरों को नहीं मालूम था कि वे ज़मीन के मालिक हैं। उस चक्कर में साहब निपट भी गए थे। उन साहब के सितारे कमज़ोर रहे होंगे इसलिए निपट गए, लेकिन ज़रूरी तो नहीं सब के साथ वैसा ही हो। अभी के दौर के कई साहब पहले से सोच रखे हैं कि यदि चक्रव्यूह में जाकर फंसे भी तो बचकर कैसे निकलना है। दवा ख़रीदी से जुड़े साहब का कॉन्फिडेंस लेवल ऐसा कि ऊपर तक शिकायत पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपने काम करने का तरीका नहीं बदला है। फिर साहब माल फूंकने के भी शौकीन हैं। नया रायपुर में पहले मयक़श वालों की बहुतायत थी। अब वहां लंबा कश लगाने वालों की संख्या बढ़ गई है।

फिर विवादों में
फ़िल्म सिटी

नया रायपुर से लगे माना तूता में फ़िल्म सिटी के निर्माण को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। फ़िल्म सिटी के निर्माण को लेकर जब वहां पेड़ों की कटाई शुरु हुई ग्रामीणों ने चिपको आंदोलन शुरु कर दिया। अर्थात् वे पेड़ों से लिपटकर खड़े हो गए और कहे कि अब चलाओ आरी। पहले हम कटेंगे, उसके बाद पेड़ कटेगा। कांग्रेस भी इस तरह सैकड़ों पेड़ों की कटाई की कीमत पर फ़िल्म सिटी निर्माण के विरोध में है और वह भी आंदोलन पर उतर आई है। और तो और छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े कितने ही लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि पेड़ों की क़ुर्बानी देकर कम से कम फ़िल्म सिटी न बनाएं। माना तूता जगह अच्छी है वहां के आसपास के गांवों का माहौल भी अच्छा है। ग्रामीणों का शुरु से यही मानना रहा है कि प्रकृति से खिलवाड़ करने वाला कोई भी प्रोजेक्ट न लाएं। नब्बे के दशक में रायपुर के कमिश्नर ए.डी. मोहिले थे। उनका माना तूता की इसी जगह पर भव्य पिकनिक स्पॉट बनाने का सपना देखा था जो पूरा नहीं हो सका। इसके बाद माना तूता क्षेत्र से ही कुछ दूरी पर पर्यटन विभाग ने भोजली रिसॉर्ट बनाया। रिसॉर्ट के नाम जो रुकने के लिए कमरे तैयार किए गए वह जर्जर हो चुके हैं और वहां पिकनिक मनाने के नाम पर कुछ नहीं बचा है। बताते हैं भोजली रिसॉर्ट का ठेका किसी निजी हाथों में दिया जा चुका है और रिसॉर्ट का नाम बदलकर वहां एक नई शुरुआत की तैयारी है। रही बात फ़िल्म सिटी को तो उसका टेंडर हो चुका है। जब सरकार ने तय कर लिया है तो काम आगे ही बढ़ना है। कांग्रेस और ग्रामीणों के विरोध के बाद काम किस हिसाब से आगे बढ़ेगा आने वाले समय में जाकर स्पष्ट होगा।

घोसला उजड़ रहा तो
तालाबों में ‘पक्षी
विहार’ भी तो बन रहा

जगह की उपयोगिता और उस जगह के दोहन के हिसाब से प्रकृति प्रेम तय होता है। जब फ़िल्म सिटी और माना तूता की बात हो रही है तो उसी क्षेत्र से लगे माना बस्ती की बात कर लें। माना बस्ती के तालाबों को ‘पक्षी विहार’ के रुप में विकसित करने की तैयारी है। बताया यही जा रहा है कि प्रवासी पक्षियों को सूरक्षित आवास उपलब्ध कराने का दिशा में यह बड़ा कदम होगा। पहले चरण में माना बस्ती के तालाबों की सफाई करवाई जाएगी। ठीक है, कहीं पर पेड़ कटने से पक्षियों के घोसले उजड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके पानी में डूबकी लगाने और फुदकते रहने की भी तो चिंता हो रही है।

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