■ अनिरुद्ध दुबे
26 दिसम्बर 1998 को मेरे व्दारा की गई फ़िल्म ‘ज़ख़्म’ की समीक्षा का सांध्य दैनिक अख़बार ‘हाईवे चैनल’ में प्रकाशन हुआ था। अजय देवगन, पूजा भट्ट, सोनाली बेन्द्रे, नागार्जुन एवं आशुतोष राणा स्टारर इस फ़िल्म को उस समय लगातार लाइम लाइट में बने रहने वाले डायरेक्टर महेश भट्ट ने डायरेक्ट किया था। ‘ज़ख़्म’ चूंकि दंगे जैसे चुनौतीपूर्ण सब्जेक्ट पर बनी फ़िल्म थी अतः सेंसर बोर्ड ने इसे पास करने से इंकार कर दिया था। तब महेश भट्ट ने इस फ़िल्म को जनता की अदालत में ले जाना मुनासिब समझा। अलग-अलग शहरों में सेंसर बोर्ड में अटकी हुई इस फ़िल्म के विशेष शो रखे गए। रायपुर के आनंद सिनेमा हॉल में भी इसका विशेष शो रखा गया था। ख़ुद महेश भट्ट, उनकी बेटी पूजा भट्ट एवं फ़िल्म की लेखिका तनुजा चंद्रा ‘ज़ख़्म’ के विशेष शो के लिए रायपुर आए थे। वक़्त लगा, ‘ज़ख़्म’ को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिल ही गई। फ़िल्म ने काफ़ी सराहना पाई। यही नहीं बाद में इस फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। कैसा विरोधाभास!

‘ज़ख़्म’ के प्रदर्शन के बाद छत्तीसगढ़ राज्य बना। छत्तीसगढ़ की पहली अजीत जोगी की सरकार में विधायक परेश बागबाहरा छत्तीसगढ़ फ़िल्म विकास समिति के अध्यक्ष बनाए गए। परेश बागबाहरा ने छत्तीसगढ़ी सिनेमा को आगे ले जाने का लक्ष्य लेकर राजधानी रायपुर के नेताजी सुभाष स्टेडियम में एक भव्य फ़िल्मी कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसके मुख्य अतिथि महेश भट्ट थे। भट्ट साहब को मंच से जो कुछ कहना था उन्होंने कहा, फिर जनता एवं उनके बीच माइक के माध्यम से सीधे सवाल-ज़वाब भी हुए। सौभाग्य से मुझे भी सवाल करने का मौका मिल गया, मेरा प्रश्न था- “एक तरफ आपकी ‘ज़ख़्म’ को सेंसर बोर्ड ने लंबे समय तक लटका रखा था, बाद में उसी फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है, इस विरोधाभास पर आप क्या कहेंगे…” भट्ट साहब ने उत्तर में केवल इतना ही कहा था- “आपके सवाल में ही ज़वाब छिपा हुआ है।“ ‘ज़ख़्म’ का कथानक तो दमदार था ही, संगीतकार एम.एम. कीरावनी के संगीत से सजा कर्णप्रिय गीत “तुम आये तो आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला…” लोगों की ज़ुबान पर चढ़ चुका था। यह गीत आज भी बड़े चाव से सुना जाता है। भागमभाग वाली इस ज़िंदगी में थोड़ा वक़्त मिले तो आप इस गीत को ज़रूर सुनिये…
‘ज़ख़्म’ की वह समीक्षा एक बार पुनः आप सबके सामने प्रस्तुत है-

● ‘ज़ख़्म’
‘ज़ख़्म’ को बड़े पर्दे तक ले जाने महेश भट्ट को काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी। फ़िल्म के दंगे वाले विषय पर सेंसर बोर्ड ने ख़ूब अड़ंगा लगाया। महेश भट्ट ने कह दिया है कि ‘ज़ख़्म’ के बाद वह किसी फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे। आगे उनका काम अधिक से अधिक लिखना व फ़िल्मों का निर्माण रहेगा। ‘ज़ख़्म’ में उनका आख़री निर्देशकीय कार्य संतोषजनक माना जा सकता है। नहीं तो महेश भट्ट बीच में कहां ‘जुनून’, ‘तड़ीपार’ एवं ‘चाहत’ जैसी घटिया फिल्मों से घिर गए थे। ‘अर्थ’ एवं ‘सारांश’ जैसी फिल्मों का सर्जक यदि यह घोषणा करे कि वह अब निर्देशन से छुट्टी पा रहा है तो लोग उसकी ‘ज़ख़्म’ को कसौटी में तो कसेंगे ही। ‘ज़ख़्म’ का विषय आज जो फिल्में आ रही हैं उनसे हटकर है। वाक़ई महेश भट्ट ने ‘ज़ख़्म’ काफ़ी दिल से बनाई है।
हालांकि महेश भट्ट पर पूर्व में जिन बातों का प्रभाव रहा उससे वह ‘ज़ख़्म’ को मुक्त नहीं कर सके। अपनी आत्मकथा को पर्दे पर ले जाना महेश भट्ट की फ़ितरत रही है। ऐसा समझा जाता है कि ‘ज़ख़्म’ में पूजा भट्ट ने जो भूमिका निभाई वह महेश भट्ट की मां शिरीन पर केन्द्रित है। इसी तरह ‘ज़ख़्म’ के अंतिम दृश्य में मौत के बाद जन्नत में पूजा भट्ट को नागार्जुन से मिलते हुए दिखाया जाने वाला काल्पनिक दृश्य फ़िल्म ‘नाम’ की याद ताजा करा देता है। ‘नाम’ भी महेश भट्ट की ही थी और उसमें भी अंत में काल्पनिक दृश्य में मरने के बाद आसमान में संजय दत्त व अमृता सिंग को मिलते दिखाया गया। ‘ज़ख़्म’ एक गंभीर सिनेमा है। उन दर्शकों के लिए, जिन्हें कुछ नयेपन की तलाश रहती है। अजय देवगन व पूजा भट्ट ने इस फ़िल्म में अपने किरदारों में डूबकर काम किया है। ‘दुश्मन’ के बाद ‘ज़ख़्म’ में भी आशुतोष राणा ने जता दिया कि उनमें प्रतिभा की कमी नहीं है। फ़िल्म का अधिकांश भाग फ्लैशबैक में है।
अजय (अजय देवगन) एक स्थापित कलाकार है। उसका एक छोटा भाई आनंद (अक्षय आनंद) है और मां (पूजा भट्ट)। सोनिया (सोनाली बेन्द्रे) अजय की प्रेमिका है। आनंद एक ख़तरनाक राजनीतिज्ञ सुबोध (आशुतोष राणा) का अनुयायी है। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद मुम्बई शहर दंगे की चपेट में आ जाता है। दंगाई चर्च से लौट रही अजय की मां को जला देते हैं, जिससे अस्पताल में उसकी मौत हो जाती है। अजय मुसलमान मां व हिन्दू पिता का बेटा रहता है। मां की अंतिम इच्छा रहती है उसे दफ़नाया जाए। उसकी मौत पर सुबोध राजनीतिक रोटी सेंकने में लग जाता है जिस पर उसे मुंह की खानी पड़ती है।
कलाकार- अजय देवगन, पूजा भट्ट, नागार्जुन, सोनाली बेन्द्रे, आशुतोष राणा, अक्षय आनंद, शरत सक्सेना, अवतार गिल, विश्वजीत प्रधान, कथा- तनुजा चंद्रा, संगीत- एम.एम. कीरावनी, निर्देशक- महेश भट्ट।

