■ अनिरुद्ध दुबे
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उप मुख्यमंत्री अरुण साव की तुलना बंदर से कर दी, जिससे न सिर्फ़ राजनीतिक बल्कि सामाजिक माहौल भी गरमा गया है। साहू समाज आक्रोशित है। समाज के पदाधिकरियों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बघेल 10 दिनों के भीतर माफ़ी मांगकर अपने कहे वचनों को वापस लें, अन्यथा परिणाम भुगतना पड़ेगा।
सोशल मीडिया का ज़माना है। हर हाथ में मोबाइल है। कोई चीज रिकॉर्ड होने, फिर वायरल होने में देर नहीं लगती। फिर कौन सी बात कहां पर तूल पकड़ ले, कहा नहीं जा सकता। बघेल ने साव की तुलना बंदर से की, बरसों पहले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तुलना बैल से कर दी थी। हुआ यूं था कि तत्कालीन डॉ. रमन सिंह सरकार ने ग़रीब आदिवासियों को जीविकोपार्जन के लिए बैल बांटने की योजना लाई थी। जब वितरण शुरु हुआ तो किसी-किसी ग़रीब आदिवासी के हिस्से में कमजोर बैल आ गया। अख़बारों में ख़बर छप गई। जिसे आधार बनाते हुए जोगी जी ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि “ग़रीब आदिवसियों को बांट भी रहे हैं तो मरियल बैल। कहने वाले तो इन बैलों को रमन बैला कहने लगे हैं।“ जोगी जी ने जब ऐसा कुछ कहा था वह मोबाइल पर वीडियो बनाने वाला दौर नहीं था। बात आई गई हो गई। पर यहां तो भूपेश जी वाला मामला तूल पकड़ चुका है। बात कांग्रेस-भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक रहती तो भी ठीक था लेकिन यहां तो साहू समाज ने भूपेश जी के कथन को आड़े हाथों ले लिया है और निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी को गंभीर सोच की मुद्रा में ला खड़ा किया है। गंभीरता से सोचने की ज़रूरत इसलिए भी है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में साहू मतदाता किस तरह कांग्रेस से बिदके यह राजनीतिक विश्लेषक अच्छी तरह जानते हैं। साजा विधानसभा अंतर्गत बिरनपुर गांव में हुए संघर्ष में युवक भुनेश्वर साहू की नृशंस हत्या का होना, बाद में फिर भाजपा व्दारा बड़ा निर्णय लेते हुए भुनेश्वर के पिता ईश्वर साहू को उसी साजा विधानसभा से टिकट देते हुए चुनावी मैदान पर उतार देना, इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम ने चुनाव की दिशा ही बदलकर रख दी थी। भाजपा की उस चुनावी रणनीति ने पूरे छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाक़ों में साहू वोटरों के मन पर गहरा असर डाला था। न सिर्फ़ साजा से सात बार के विधायक रहे कांग्रेस प्रत्याशी रविन्द्र चौबे बल्कि ताम्रध्वज साहू व धनेन्द्र साहू जैसे और भी कई दिग्गज कांग्रेस प्रत्याशियों की हार के पीछे कारण साहू मतदाताओं का मन परिवर्तन माना गया था। राजनीतिक विश्लेषकों ने 23 के चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनते-बनते जो रह गई, उसके पीछे कारण गिनाते हुए बेझिझक कहा था कि साहू वोटों का जो ध्रुवीकरण हुआ वह कांग्रेस को बड़ा झटका दे गया। फिर क्वांटिफायबल डाटा आयोग की रिपोर्ट आज तक सार्वजिनक नहीं हुई। वह रिपोर्ट जब कभी सार्वजनिक होगी तो स्पष्ट हो जाएगा कि छत्तीसगढ़ में साहू समाज के लोगों की संख्या कितनी है।
कांग्रेस में इंटरव्यू
की परंपरा…
कांग्रेस में एक परंपरा अच्छी है। वहां कभी-कभी बड़े पदाधिकारियों की नियुक्ति इंटरव्यू के माध्यम से होती है। इंटरव्यू दिल्ली में होता है। छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद की बात करें अध्यक्ष फूलो देवी नेताम ने विधानसभा चुनाव के दौरान अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। फिर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि कांग्रेस में बड़े फ़ैसले होने में बड़ा वक़्त लगता है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर भी लग गया। फिलहाल जैसी चर्चा है कि छत्तीसगढ़ से 5 नेत्रियों संगीता सिन्हा, तुलिका कर्मा, छन्नी साहू, ममता चंद्राकर एवं लक्ष्मी ध्रुव को दिल्ली बुलाया गया है। इनमें से तुलिका कर्मा व लक्ष्मी ध्रुव अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) तथा संगीता सिन्हा, छन्नी साहू एवं ममता चंद्राकर ओबीसी (पिछड़ा) वर्ग से हैं। जैसा कि छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय आदिवासी समुदाय तथा पिछड़ा वर्ग पर विशेष रूप से केन्द्रित है अतः दिल्ली में बैठे बड़े नेता प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर भी उसी एंगल पर चलते हुए किसी निर्णय पर पहुंचने के मूड में हैं। निवर्तमान प्रदेश महिला कांग्रेस फूलो देवी नेताम आदिवासी समुदाय से हैं तथा बस्तर तरफ से हैं। उसी बस्तर तरफ से तुलिका कर्मा का दावा सामने आया है जो पूर्व मंत्री एवं झीरम घाटी नक्सली हमले में शहीद हुए नेता महेन्द्र कर्मा की बेटी हैं। वर्तमान में वे महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव हैं। दूसरी आदिवासी नेत्री लक्ष्मी ध्रुव पूर्व में सिहावा से विधायक रही हैं। ओबीसी फैक्टर की तरफ नज़र डालें तो संगीता सिन्हा वर्तमान में कांग्रेस विधायक हैं। विधानसभा सत्र जब चल रहा होता है तो सदन में काफ़ी मुखरता से अपनी बात रखती हैं। बीच में वह उस समय और ज़्यादा सुर्ख़ियों में रहीं जब उन्होंने मीडिया के समक्ष चुटकी लेते हुए कहा था कि “पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा विधायक अजय चंद्राकर यदि अपनी पार्टी के 15 विधायकों को साथ लेकर कांग्रेस में आते हैं तो हम उन्हें मुख्यमंत्री बना देंगे।“ महिला कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ में शामिल दो अन्य नेत्रियों छन्नी साहू व ममता चंद्राकर की बात करें, दोनों ही पूर्व में विधायक रह चुकी हैं।
ये तो रही प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की बात। 2018 में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बनने के बाद जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के दायित्व से मुक्त हुए नये प्रदेश अध्यक्ष का चयन इंटरव्यू के माध्यम से ही हुआ था। राहुल गांधी ने बस्तर के दो आदिवासी विधायक मोहन मरकाम व मनोज मंडावी को इंटरव्यू के लिए दिल्ली बुलाया था। इंटरव्यू के बाद प्रदेश अध्यक्ष के लिए मोहन मरकाम के नाम की घोषणा हुई थी।
नक्सलवाद मिटा तो
तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था
बनने में नहीं लगेगी देर
भाजपा राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह ने पिछले दिनों राजधानी रायपुर में कहा कि “भारत चार सालों से लगातार सशक्त और तेज जीडीपी के चलते तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है। चूंकि देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सल प्रभावित था तो देश की जीडीपी में उन हिस्सों का योगदान नहीं था। उन हिस्सों के नक्सल समस्या से मुक्त होने के बाद अब उनका भी योगदान बढ़ेगा। इस तरह जब सभी क्षेत्रों का योगदान बढ़ेगा, भारत विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा।“
अरुण सिंह ने जो बात कही उसमें ख़ासकर बस्तर शामिल है। 2025 में जिस तरह नक्सलवाद तेजी से सिमटा, साल के समापन एवं नव वर्ष के आगमन पर बस्तर में पर्यटकों की संख्या हज़ार को पीछे छोड़ते हुए लाख में पहुंच गई। धुड़मारास, चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, नंबी जलप्रपात, हांदावाड़ा, मेंद्रीघुमर, झारालावा ऐसे स्थान रहे जहां न सिर्फ़ दूसरे प्रदेश बल्कि विदेशों के भी पर्यटक पहुंचे हुए थे। माना जा रहा है बस्तर समेत देश के अन्य हिस्सों से यदि नक्सलवाद समाप्त हो जाता है तो भारत जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाएगा। वर्तमान में अमरीका, चीन व जर्मनी सकल घरेलू उत्पाद में भारत से आगे हैं। जापान को पीछे छोड़ते हुए भारत चौथे नंबर पर पहले ही आ चुका है।
आया नक्सलवाद के
खिलाफ़ निर्णायक
युद्ध लड़ने का समय
कुख्यात नक्सली लीडर हिड़मा के कऱीबी रहे पीएलजीए कमांडर बारसे देवा के समर्पण की ख़बरें आ रही हैं, हालांकि समर्पण की अधिकृत तौर पर कोई घोषणा नहीं हुई है। देवा पर 50 लाख से अधिक का ईनाम होने की बात सुनने में आ रही है। देवा की बीजापुर, सुकमा एवं दंतेवाड़ा तीनों जगह सक्रियता रही थी। हिड़मा के एनकाउंटर के बाद देवा को पीएलजीए के कमांडर की ज़िम्मेदारी दी गई। माना जा रहा है कि जनवरी से मार्च, इन तीन महीनों में नक्सलवाद का ख़ात्मा करने फोर्स पूरी ताक़त लगाएगी। विशेषकर धुर नक्सल प्रभावित रहे सुकमा एवं बीजापुर क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए फोर्स की अगली रणनीति तैयार हो जाने की ख़बरें सामने आ रही हैं। सूरक्षा से जुड़े सूत्र बताते हैं- अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाके में नक्सलियों के ठिकानों को पूरी तरह मिटा दिए जाने के बाद अब छत्तीसगढ़ में उनके लिए दूसरी कोई सूरक्षित जगह नहीं रह गई है। यही नहीं कभी नक्सलियों की अघोषित राजधानी कहलाती रहे अबूझमाड़ के कुतुल गांव तक में स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर मोबाइल नेटवर्क तक पहुंचाने का काम तेजी से जारी है। एक तरह से वहां के रहवासियों का अब नई दुनिया से साक्षात्कार होने जा रहा है। अभी तक तो वहां के लोग मुख्य धारा से कटे रहे थे। नक्सलियों के सारे बड़े लीडरों में अब केवल देव जी ही बड़ा नाम बचा रह गया है। बाकी बड़े लीडरों में कुछ मुठभेड़ में मारे गए और कुछ का समर्पण हो चुका है। माना यही जा रहा है देवजी का समर्पण या एनकाउंटर इन दोनों में से जो भी कोई एक नतीजा सामने आए, उसके बाद बस्तर को नक्सलवाद मुक्त घोषित किया जा सकता है।
मुर्दा शहर, न रेल सुविधा
का ठिकाना न बस का
2025 में मुर्दा शहर नवा रायपुर की तस्वीर वैसी ही रही जैसे की पहले थी। नवा रायपुर के बाकी स्टेशनों की बात तो छोड़ ही दें, मंत्रालय व विधानसभा भवन के क़रीब के सीबीडी रेल्वे स्टेशन को जाकर ही देख लें। पूरे समय वहां वीरानी के सिवाय कुछ नज़र नहीं आएगा। कोई कहीं किसी स्टेशन सफ़र शुरु कर सीबीडी स्टेशन पर उतर भी गया तो वहां से सड़क रास्ते किसी और जगह पर जाने के लिए कोई सरकारी स्तर पर परिवहन व्यवस्था नहीं है। बीच में तो यह भी ख़बर सामने आई थी कि सीबीडी स्टेशन से गिने-चुने यात्री ट्रेन पर जो चढ़ते हैं उन्हें वहां ड्यूटी बजा रहा गार्ड टिकट उपलब्ध कराता है। पुराने रायपुर से नये रायपुर के बीच चलने वाली बीआरटीएस बसों का भी बुरा हाल है। सुबह से शाम तक ले-देकर बीआरटीएस बसें चल भी रही हैं तो घंटे-घंटे के अंतराल में। यात्रियों के साथ इससे बड़ा मज़ाक और क्या होगा कि नया रायपुर जाने वाली बस का भाठागांव अंतर्राज्यीय बस स्टैंड में ही कोई स्टापेज नहीं है। नवा रायपुर में मेडि सिटी, एजुकेशन हब, इंडस्ट्रियल हब जैसे कितने ही बड़े सपने दिखाने वाले दिखाते रहें, फिलहाल तो यह मुर्दा शहर आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरने वाला शहर कहीं से नहीं है। और तो और सुविधाविहीन नवा रायपुर विपक्ष का भी कभी मुद्दा बनते नहीं दिखा है।

