■ अनिरुद्ध दुबे
छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र 23 फरवरी से 20 मार्च के बीच चलना है। कुल 15 बैठकें होनी हैं। कितने ही नेताओं को खटक रहा है कि बजट सत्र में बैठकें कम क्यों! किताबी की जगह व्यावहारिक ज्ञान रखने वालों का मानना है कि 15 बैठकों में सत्र को समेटना 100 प्रतिशत सही निर्णय है। संसदीय ज्ञान की गहरी समझ रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि बजट सत्र के लिए 10 से 12 बैठकें भी पर्याप्त हैं। भूपेश बघेल सरकार के समय में 2020 के बजट सत्र में जो 13 बैठकों का निर्णय लिया गया था, उसे भी सराहनीय कदम माना गया था। इसी छत्तीसगढ़ विधानसभा में कभी एक बड़ी शख़्सियत सदन की बड़ी कुर्सी पर बैठा करती थी। उस बड़ी शख़्सियत का बेहद क़रीबी बड़ा अफ़सर श्रीमान जी को जैसा पहाड़ा पढ़ाते वैसा वे पढ़ लिया करते थे। हुआ ये कि अफ़सर की सलाह पर श्रीमान जी को अपने कार्यकाल में विधानसभा की सबसे अधिक बैठकें करने की धुन सवार हो गई। उनके कार्यकाल में सर्वाधिक बैठकों का रिकॉर्ड बना भी। फिर उसके बाद क्या हुआ… चुनाव में श्रीमान जी को उन्हीं के क्षेत्र की जनता ने निपटा दिया और उनके सामने काफ़ी कम राजनीतिक समझ रखने वाले विपक्षी नेता को जीता दिया। फिर ये जुमला चल पड़ा था कि सर्वाधिक बैठकें करके जब आप अपने क्षेत्र की जनता को ही नहीं साध पाए तो पूरे प्रदेश में भला क्या असर डाल पाते। श्रीमान जी आज अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जनता बैठकों के रिकॉर्ड से नहीं सधती, बल्कि सड़क पर जीवंत सम्पर्क बनाए रखने वाले नेताओं से दिल से जुड़ती है।
राहुल-बृजमोहन की
मुलाक़ात पर तूल क्यों
दिल्ली में वरिष्ठ भाजपा नेता एवं रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल की लोकसभा के परिसर में मुलाक़ात क्या हो गई, तूल दे दिया गया। कहां लिखा है कि सत्ता पक्ष के बड़े लोग विपक्ष के बड़े लोगों से नहीं मिल सकते! आमने-सामने हो जाने पर अभिवादन एवं एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछना तो शिष्टाचार के दायरे में आता है। फिर यह कथा कहानी क्यों गढ़ना कि इन दिनों पार्टी लाइन से अलग चल रहे बृजमोहन अग्रवाल की राहुल गांधी से मुलाक़ात कुछ और इशारा कर रही है! कभी-कभी किसी के किरदार को समझने के लिए उसके जीवन के पिछले पन्नों को भी पलट लेना पड़ता है। वह 2006 से 2008 के बीच का दौर रहा होगा जब बृजमोहन अग्रवाल छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति मंत्री थे। साइंस कॉलेज़ के मैदान में राज्योत्सव का आयोजन था। राज्योत्सव के किसी एक दिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल (जो कि भाजपा में नहीं थे) का आयोजन स्थल पर पहुंचना हुआ। संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने तब ससम्मान विद्या भैया को अपने साथ मंच पर बिठाया था। शिष्टाचार, शिष्टाचार होता है।
भावना के क्षेत्र में
ऑपरेशन घर वापसी
भाजपा विधायक भावना बोहरा ने अपने पंडरिया विधानसभा क्षेत्र के 64 आदिवासी परिवारों को उनके मूल धर्म में वापस कराया। भावना ने यह काम उन आदिवासी परिवारों के चरण धोकर किया जिन्होंने दूसरा धर्म अपना लिया था। धर्म परिवर्तन तो देश के आज़ाद होने के पहले से होते आ रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में ऑपरेशन घर वापसी की परंपरा पूर्व केन्द्रीय मंत्री जशपुर राज परिवार के कुमार दिलीप सिंह जूदेव ने सत्तर के दशक में शुरु की थी। वह अख़बारों व पत्रिकाओं का युग था। ऑपरेशन घर वापसी अभियान के कारण जूदेव को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हो चुकी थी।
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय में 1988 में अर्जुन सिंह जब सीधे मुख्यमंत्री बना दिए गए और उन्हें उप चुनाव लड़कर जनमत सिद्ध करना था, उन्होंने उप चुनाव के लिए खरसिया विधानसभा क्षेत्र चुना। तब कांग्रेस उम्मीदवार अर्जुन सिंह के सामने भाजपा ने दिलीप सिंह जूदेव को चुनावी मैदान में उतारा था। जूदेव के पक्ष में ऐसा तगड़ा माहौल बना था कि पूरे चुनाव के दौरान अर्जुन सिंह समेत खरसिया में जमे सारे कांग्रेस नेताओं की रातों की नींद उड़ गई थी। हालांकि अर्जुन सिंह किसी तरह वह उप चुनाव जीतने में क़ामयाब रहे लेकिन उसके साथ ही ऑपरेशन घर वापसी के लिए फ़ेमस हो चुके नेता दिलीप सिंह जूदेव की लोकप्रियता में और चार चांद लग चुके थे। दिलीप सिंह जूदेव के निधन के बाद उनके पुत्र प्रबल प्रताप जूदेव भी समय-समय पर धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों की घर वापसी कराते रहे हैं। क़रीब 50 साल हो गए धर्म परिवर्तन और ऑपरेशन घर वापसी दोनों जारी है।
राजिम कुंभ कल्प
पर विवादों की छाया
इस बार के राजिम कुंभ कल्प में विवादों की छाया पड़ी रही। संत महासभा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी राजेश्वरानंद ने राजिम कुंभ के शुभारंभ अवसर पर हुई अनियमितता को लेकर काफ़ी नाराज़गी जताई। स्वामी राजेश्वरानंद श्री सुरेश्वर महादेव पीठ के संस्थापक भी हैं। उनका कहना रहा कि “पिछले वर्ष किसी भी संत को सम्मान निधि प्राप्त नहीं हुई। पिछले वर्ष के राजपत्र में 100 के आसपास संतों के नाम काट दिए गए थे। संतों के सम्मान पर लगातार चोट पहुंचाई जा रही है। इस वर्ष राजपत्र में मुझे विशिष्ट सदस्य एवं सचिव की उपाधि प्रदान की गई थी। लेकिन राजिम कुंभ कल्प से संबंधित किसी मिटिंग में मुझे नहीं बुलाया गया। इस पर मुझे बड़ा खेद है। प्रयागराज में हुए महा कुंभ का उदाहरण देख लीजिए जहां श्री सुरेश्वर महादेव पीठ का कैंप लगा था। उस कैम्प का पूरा सम्मान हुआ था और हमें सम्मान पत्र के साथ विदा किया गया था।“
राजिम कुंभ कल्प में स्थल पर व्यवस्था में लगे लोगों से भी कहीं-कहीं पर बड़ी चूक हुई। कुछ नहीं तो अभनपुर के विधायक इंद्र कुमार साहू की पत्नी को मंच के क़रीब जाने से काफ़ी देर तक रोके रखा गया। वे बार-बार परिचय देती रहीं पर सूरक्षा के नाम पर लगे तथाकथित लोग कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे। मेला अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद वे मंच के क़रीब जा सकीं।
‘कमल विहार’ का अब
हो सकता है उद्धार
छत्तीसगढ़ सरकार की कैबिनेट की बैठक में एक बड़ा फ़ैसला यह हुआ कि राजधानी रायपुर में हाउसिंग बोर्ड एवं रायपुर विकास प्राधिकरण की 11 कॉलोनियों के रखरखाव की ज़िम्मेदारी अब रायपुर नगर निगम पर होगी। कमल विहार एक ऐसा प्रोजेक्ट रहा जिसे लेकर आरडीए एवं नगर निगम के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती आई है। आरडीए की शिकायत रहती आई है कि कमल विहार से जुड़े डूंडा, लालपुर एवं देवपुरी के सीवर लाइन में नगर निगम ने अपना ड्रेनेज सिस्टम जोड़ दिया है। इस पर आरडीए की तरफ से निगम को पत्र पर पत्र भेजा जाता रहा। वहीं नगर निगम का आरोप रहा कि आरडीए अपनी कॉलोनियों के लिए पानी तो ले रहा है पर उसका पैसा निगम को नहीं पटा रहा। एजाज़ ढेबर के महापौर कार्यकाल में नगर निगम की ओर से बड़े बक़ायादारों की एक सूची जारी की गई थी, जिसमें आरडीए पर 1 करोड़ से अधिक का बकाया होना दिखाया गया था। हो सकता है राजधानी रायपुर की कमल विहार एवं इंद्रप्रस्थ कॉलोनी नगर निगम के सुपुर्द हो जाने के बाद कुछ तस्वीर बदले, निगम व आरडीए के बीच की खींचतान ख़त्म हो और इन कॉलोनियों में रहने वाले आम नागरिकों का भला हो सके।

