■ अनिरुद्ध दुबे
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर की जन्म शताब्दी पर राजधानी रायपुर में संगोष्ठी हुई। पूर्व मंत्री रमाशंकर सिंह जैसे विद्वजन चंद्रशेखर जी से जुड़े अनुभवों को सामने रखने आए थे। चंद्रशेखर जी पर विमर्श के दौरान न सिर्फ़ समाजवादी दिग्गज नेताओं बल्कि कांग्रेस व भाजपा से जुड़े कद्दावर नेताओं के नाम भी रह-रहकर वक्ताओं की ज़ुबान पर आए।
चंद्रशेखर जी के साथ रायपुर शहर के न जाने कितने ही लोगों की यादें जुड़ी हैं। रायपुर के समाजवादी नेता महावीर अग्रवाल चंद्रशेखर जी के काफ़ी क़रीबी रहे थे। छत्तीसगढ़ के जाने-माने गायक व संगीतकार पद्मश्री मदन चौहान जी के भजनों को चंद्रशेखर जी ने अग्रवाल जी के निवास में सुना था। हर बड़े नेता के राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव आता ही है। 1975 में आपातकाल का विरोध करते हुए धूमकेतु की तरह चमके चंद्रशेखर जी ऊंचाई व ढलान दोनों देखे। 1980 के आसपास की बात रही होगी, जब चंद्रशेखर जी राजधानी रायपुर के गांधी चौक मैदान में आमसभा को संबोधित करने आए थे। तब इस राष्ट्रीय स्तर के नेता को सुनने दो-ढाई सौ की ही भीड़ मौजूद थी। फिर एक समय ऐसा भी आया जब समाजवादी जनता पार्टी के नेता चंद्रशेखर जी कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री के रूप में उनका स्थायी कार्यकाल क़रीब छह महीने का ही रह पाया। कांग्रेस व्दारा समर्थन वापस ले लेने का बाद मध्यावधि चुनाव होने तक वह राष्ट्रपति के अनुरोध पर प्रधानमंत्री बने रहे। उस बीच श्रीपेरंबदूर में मानव बम हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जान चली गई। उस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। राजीव गांधी की हत्या के कुछ ही दिनों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का रायपुर आना हुआ। तब इलेक्ट्रानिक मीडिया का उदय नहीं हुआ था। प्रिंट मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकार प्रधानमंत्री के आगमन की ख़बर को कवर करने एयरपोर्ट पहुंचे हुए थे। पीएम जब विमान से उतरे तो पत्रकारों की तरफ से सवाल तो होने ही थे। तभी एक वरिष्ठ प्रतिष्ठित पत्रकार ने सवाल नहीं करते हुए चंद्रशेखर जी से कह दिया कि “आप तनाव में दिख रहे हैं।“ यह सुनते ही चंद्रशेखर जी उन सम्मानित पत्रकार पर भड़क गए थे। बाद में जब केन्द्र में डॉ. मनमोहन सिंह यानी यूपीए की सरकार थी, चंद्रशेखर जी का राजधानी रायपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बार दैनिक देशबन्धु के कार्यक्रम में हिस्सा लेने रंग मंदिर आना हुआ था। उस कार्यक्रम में चंद्रशेखर जी आधे से पौन घंटे बिना रुके लगातार संबोधन दिए थे। रंग मंदिर में श्रोताओं की तरफ से सवाल भी हुए थे, चंद्रशेखर जी ने बेहद सुलझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह उनका बख़ूबी ज़वाब दिया था।
झीरम हमले पर
अब अंतिम बहस
झीरम घाटी नक्सली हमले मामले की सुनवाई अंतिम चरण पर पहुंच गई है। ख़बर यही है कि इस मामले में 10 अगस्त सोमवार को अंतिम बहस होगी। इसके बाद अदालत या तो फ़ैसले को सुरक्षित रख सकती है या फिर फ़ैसले की तारीख तय कर सकती है। देश भर में चर्चित रहे इस मामले में वर्तमान में 11 आरोपियों के खिलाफ़ अभियोजन चल रहा है। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो चुकी है। मामले को सिद्ध करने के लिए अदालत में 101 गवाहों के बयान हुए। कई अहम् साक्ष्य सामने रखे गए।
झीरम घाटी नक्सली हमला 25 मई 2013 को हुआ था, जिसमें नंद कुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा एवं उदय मुदलियार जैसे कद्दावर नेताओं की जानें गईं। नंद कुमार पटेल के बेटे दिनेश पटेल समेत और भी लोग इस नक्सली हमले में मारे गए। घटना को तेरह साल बीत गए। अब तक इसके पीछे की कहानी सामने नहीं आ सकी है। इस घटना को लेकर भाजपा व कांग्रेस दोनों पार्टियों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर ज़रूर चलते रहा है। भाजपा के लोग अक्सर मीडिया के सामने दोहराते रहे हैं कि कांग्रेस के एक दिग्गज नेता तो कहा करते थे कि झीरम हमले का सच उनकी जेब में है, समय आने पर उसे सामने लाएंगे। 2018 से 2023 तक पांच साल कांग्रेस की सरकार रही, फिर नेताजी सच को सामने क्यों नहीं लाए! वहीं कांग्रेस नेता कहते रहे कि जिस समय हमला हुआ सरकार तो भाजपा की थी। उस सरकार ने जांच एजेन्सी भी बिठाई थी। इसके बाद भी भाजपा की तत्कालीन सरकार किसी ठोस निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुंच पाई!
छात्र रोपा लगा रहे तो
छात्राओं से कराया
जा रहा मसाज…
छत्तीसगढ़ के छात्रावासों में रह रहे छात्र-छात्राओं से बेगारी करवाने के एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं। कोरबा जिले के पोंड़ी उपरोड़ा स्थित गर्ल्स हॉस्टल एवं सुकमा जिले के कोर्रा स्थित बालक आश्रम छात्रावास से जो कहानियां निकलकर सामने आईं वह सोचने पर मजबूर किए दे रही हैं कि किस तरह वहां शिक्षित होने पहुंचे बच्चे शोषित हो रहे हैं।
पोंड़ी उपरोड़ा स्थित कस्तूरबा गांधी गर्ल्स हॉस्टल की स्कूली छात्राओं ने छात्रावास अधीक्षिका पर प्रताड़ना और मालिश करवाने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए कटघोरा-अंबिकापुर रोड पर चक्काजाम कर दिया। छात्राओं ने हॉस्टल में घटिया खाना देने का भी आरोप लगाया। छात्राओं का यह भी कहना रहा कि अधीक्षिका देर रात तक पूजा पाठ करती हैं, जिससे हम सबकी पढ़ाई प्रभावित होती है। वे घर के काम करवाने के साथ हमसे मसाज करवाती हैं। मना करने पर मारपीट की जाती है।
सुकमा जिले के कोर्रा स्थित बालक आश्रम-छात्रावास में रह रहे छात्रों से धान का रोपा लगवाने, भोजन में कटौती करने और शाम का नाश्ता नहीं देने जैसे आरोप सामने आए हैं। छात्रों का आरोप है कि आश्रम अधीक्षक हमसे अपने निजी कार्य करवाते हैं। कभी खेत में काम पर लगा देते हैं तो कभी घर का काम करवाते हैं। मानसिक दबाव के कारण हमारी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। यहां तक कि नाश्ते और भोजन तक में काट-छांट कर दी जाती है।
सेंसर बोर्ड महिमाः तारीख़
के बाद भी अटक जाता है
सीजी फ़िल्मों का प्रदर्शन
छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘लोक परलोक’ इस हफ्ते सिर्फ़ इसलिए रिलीज़ नहीं हो पाई कि समय रहते सेंसर बोर्ड की तरफ से प्रमाण पत्र जारी नहीं हो सका। शुक्रवार को यह फ़िल्म रिलीज़ होनी थी और गुरुवार की शाम फ़िल्म के निर्माता की तरफ से सूचना जारी हुई कि सेंसर प्रमाण पत्र नहीं मिल पाने के कारण ‘लोक परलोक’ का प्रदर्शन टल गया है। प्रदर्शन की अगली तारीख़ बाद में घोषित की जाएगी। निर्माता ने फ़िल्म के प्रदर्शन की अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर रखी थी। यूट्यूब पर फ़िल्म के गाने आ चुके थे, जिन पर रील्स बन रही थीं। पूरे छत्तीसगढ़ में जगह जगह-जगह पोस्टर चिपक चुके थे। सोशल मीडिया पर फ़िल्म का प्रमोशन दौड़ रहा था। अचानक में किसी फ़िल्म का प्रदर्शन टल जाए तो स्वाभाविक रुप से निर्माता को आर्थिक चोट पड़ती है। ऐसा नहीं कि सेंसर का प्रमाण पत्र समय पर नहीं मिल पाने के कारण ‘लोक परलोक’ के प्रदर्शन की तारीख़ टली। इससे पहले ‘मोर मन के मीत’, ‘मयारू गंगा’, ‘टूरी नंबर 1’, ‘मया होगे रे’, ‘जानकी’, ‘जय शीतला मां’, ‘भुंईया’ एवं ‘जान लेबे का’ जैसी छत्तीसगढ़ी फ़िल्मों के भी सेंसर प्रमाण पत्र समय पर जारी नहीं हो पाने के कारण इनके प्रदर्शन की तारीख़ को आगे बढ़ाना पड़ा था।
सेंसर प्रमाण पत्र दिलाने का काम करने वाले मुम्बई में बैठे एक-दो एजेंट अच्छे हैं तो एक दो बुरे भी हैं। ‘मोर डवकी के बिहाव’ के सेंसर प्रमाण पत्र दिलाने का ठेका लेने वाले एजेंट ने उल्टा सीधा खेल खेलने की कोशिश की थी तो फ़िल्म के निर्माता क्षमानिधि मिश्रा ने उसे मुम्बई में ही थाने में बिठवा दिया था। उसी एजेंट ने एक और छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘कहर द हैवॅक’ का फर्ज़ी प्रमाण पत्र भेज दिया था जिससे वह फ़िल्म तय तारीख़ में प्रदर्शित नहीं हो पाई थी।
छत्तीसगढ़ी फ़िल्मों के निर्माता-निर्देशक सेंसर प्रमाण पत्र के लिए मुख्य कार्यालय मुम्बई या फिर रीज़नल कार्यालय कटक (ओडिशा) की राह पकड़ते हैं।

