■ अनिरुद्ध दुबे
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं एवं अधिकारियों के खिलाफ़ आपत्तिजनक अश्लील पोस्ट सामने आने से बवाल खड़ा हो गया है। इंस्टाग्राम पर सीजी मोटू-पतलू 18 और सीजी मोटू-पतलू 1257 नाम के अकाउंट से लगातार आपत्तिजनक पोस्ट और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। इस पर राजधानी रायपुर के सिविल लाइन थाने में मामला भी दर्ज हुआ है। पुलिस पता लगाने में जुटी है कि इस सब के पीछे किसका हाथ है।
मोटू-पतलू ऐसे करैक्टर हैं जो सत्तर के दशक से धूम मचाते आ रहे हैं। मोटू पतलू बच्चों के मनपसंद काल्पनिक करैक्टर रहे हैं। 30 साल से अधिक समय तक मोटू पतलू बच्चों की फ़ेमस पत्रिका ‘लोटपोट’ में दिखते रहे थे। फिर एनिमेशन का ज़माना आया। मोटू पतलू पर बनी एनिमेशन सीरीज़ बच्चों-बड़ों सभी में काफ़ी लोकप्रिय है। इस एनिमेशन सीरीज़ को राजधानी रायपुर के राइटर नीरज विक्रम 13 साल से अधिक समय से लिखते आ रहे हैं। नेताओं व अफ़सरों को टारगेट करते हुए जिस तरह मोटू पतलू को मैदान में उतार दिया गया उससे नीरज विक्रम के मन में दर्द है। नीरज जी कहते हैं- “लोगों के दिलों में रचे बसे हास्य पात्र मोटू पतलू को इस तरह विकृत स्वरुप देना बच्चों की भावनाओं से खिलवाड़ है। यह समाज को गलत दिशा में ले जाने वाला घृणित प्रयास है।“
एम्स के दीक्षांत समारोह
से पहले विवाद…
एम्स के दीक्षांत समारोह के आमंत्रण पत्र में रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल का नाम नहीं होने पर विवाद खड़ा हो गया। यही नहीं एम्स सलाहकार समिति के सदस्य सांसद विजय बघेल, विधायक राजेश मूणत और महापौर मीनल चौबे का नाम भी अतिथियों की लिस्ट में शामिल नहीं होने की ख़बर आ रही है। सोशल मीडिया में कितने ही भाजपा नेता व कार्यकर्ता समेत अन्य चिंतनशील लोग इस उपेक्षापूर्ण व्यवहार पर अपने-अपने तरीके से राय व्यक्त करते नज़र आ रहे हैं। जिस किसी शहर में एम्स हो उस क्षेत्र के सांसद की भूमिका अपने आप में उस संस्थान में महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए कि एम्स सीधे केन्द्र सरकार से जुड़ा है।
कोरोनाकाल में हम यह देख चुके हैं जब सुनील सोनी रायपुर सांसद थे। कोरोनाकाल में एम्स के तत्कालीन डायरेक्टर व सुनील सोनी के बीच बातों का सिलसिला लगातार जारी रहा था।
2 सितंबर को होने जा रहे एम्स के दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन शामिल होंगे। जो आमंत्रण पत्र सामने आया, उसमें राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अनुप्रिया पटेल, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, एम्स रायपुर के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) संजीव हांडा और कार्यकारी निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) के नाम उल्लेखित हैं।
दीक्षांत समारोह में किसी बड़ी शख़्सियत को आमंत्रित नहीं किये जाने को लेकर विवाद खड़े होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले एनआईटी रायपुर के दीक्षांत समारोह में उस समय विवाद खड़ा हुआ था जब डॉ. रमन सिंह सरकार का दूसरा कार्यकाल था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को उस समय हुए दीक्षांत समारोह में आमंत्रित नहीं किए जाने पर अख़बारों में हेड लाइन बनी थी। तब दूसरे तरह के तर्क भी सामने आए थे कि प्रोटोकाल में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, राज्यपाल या केन्द्र सरकार के मंत्री की उपस्थिति में होने वाले दीक्षांत समारोह में प्रदेश सरकार के किसी मंत्री को बुलाने जैसी कोई परंपरा नहीं है।
पांचों में कोई नक्सली
तो हाथ लगे…
इसमें कोई दो मत नहीं कि इस बार के स्वतंत्रता दिवस में बस्तर में वहां पर भी तिरंगा लहराया जहां बरसों तक राष्ट्रीय पर्व पर सन्नाटा पसरा नज़र आया करता था। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संकल्प के चलते नक्सलवाद पर नियंत्रण जो पा लिया गया। तो क्या बस्तर से नक्सलवाद समूल नष्ट हो गया, इस सवाल पर वहां के विशेषज्ञ कहते हैं- “नहीं।“ यदि नक्सलियों की संख्या शून्य हो चुकी होती तो अंतागढ़ व उसके आसपास क्षेत्रों में क़रीब डेढ़ सौ की संख्या में जवान किसी को तलाश नहीं रहे होते! सूत्र तो यही बताते हैं कि 5 बड़े नक्सली चेहरे अभी भी हाथ नहीं लगे हैं। कोई कहता है कि बस्तर में हैं, तो कोई कहता है कि नेपाल की तरफ भाग गए होंगे। सच तो तभी पता लगेगा जब पांचों में से कोई हाथ लगेगा।
हर कलाबाजी में
निपुण साहब…
प्रचार तंत्र में बने रहने की कला कोई एक पुराने वाले साहब से सीख ले। कोई मीडिया कर्मी कैमरा ऑन कर मामूली सवाल भी रख दे तो साहब उस पर कम से कम पांच मिनट बोलने की क्षमता रखते हैं। ऐसा नहीं है कि साहब प्रचार कला में धीरे-धीरे मंजे, उन्हें यह कला सर्विस में आते ही आ गई थी। साहब पक्के समाजवादी भी हैं। सेवा बजाने वाला कोई अक्लमंद हो या कम अक्ल, सब के लिए साहब के दिल में स्थान है, बशर्ते वह आदमी उनके काम का हो। प्रशासनिक व राजनीतिक दोनों ही क्षेत्रों में माना यह जाता रहा है कि लंबे समय तक अपने क्षेत्र में डटे रहने वाले क़ाबिल नेताओं में प्रशासनिक तथा अफ़सरों में राजनीतिक गुण आ ही जाते हैं। इस तरह प्रचार तंत्र में अग्रणी रहने वाले साहब राजनीतिक कलाबाजी में भी पूरी तरह निपुण हो चुके हैं। है कोई बड़ा नेता जिसने साहब की क़ाबिलियत को न पहचानने की भूल कर दी थी। सरकार बदली और साहब के वापस अच्छे दिन आ गए।
डटे रहने का रिकार्ड
बना गए आचार्य
भारतीय वन सेवा के अधिकारी विवेक आचार्य संस्कृति व पर्यटन विभाग में लंबे समय तक डटे रहने का रिकॉर्ड बनाकर गए। कांग्रेस व भाजपा दोनों ही सरकार में उन्होंने संस्कृति-पर्यटन की पारी खेली। देखा जाए तो कला संस्कृति में रहते हुए आचार्य के प्रशंसक कम, आलोचक ज़्यादा रहे। वो कहते हैं न जिस पर सरकार मेहरबान तो फिर अधिकारी गामा पहलवान। संस्कृति विभाग में ग्रेडेशन वाली नई व्यवस्था आचार्य ने लाई, जिसका किसी ने स्वागत किया तो किसी ने उंगली उठाई। नया रायपुर से लगकर तूता में फ़िल्म सिटी के निर्माण की शुरुआत आचार्य के कार्यकाल में हुई। देखा जाए तो अंगद के पैर की तरह आचार्य लंबे समय तक संस्कृति-पर्यटन में जमे रहे।
निगम की हवा में नहीं
रही पहली जैसी सुगंध,
सभापति का छलका दर्द
स्वतंत्रता दिवस पर रायपुर नगर निगम मुख्यालय में ध्वजारोहण के दौरान सभापति सूर्यकांत राठौर का दर्द छलक पड़ा। आज तक होता ये आया था कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर निगम मुख्यालय में ध्वजारोहण के बाद महापौर व सभापति के अति संक्षिप्त उद्बोधन की औपचारिकता मात्र होती थी, लेकिन इस बार सूर्यकांत राठौड़ का उद्बोधन लंबा और चोट करने वाला रहा। सभापति ने बिना किसी जन प्रतनिधि या अफ़सर के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि “निगम में इन दिनों जो अहम् का टकराव दिख रहा है उसका सीधा असर शहर के विकास पर पड़ रहा है। अपने 25 साल के कार्यकाल में ऐसी अराजकता पहली बार देख रहा हूं। कुछ मसले बातचीत से सुलझ सकते थे, उसके विपरीत जनप्रतिनिधियों व उनके लोगों के ही खिलाफ़ एफआईआर हो रही है। नगर निगम दिशाहीनता की तरफ बढ़ चुका है। यदि अब भी आपस में तालमेल नहीं बैठा तो देर हो जाएगी।“
अब रायपुर नगर निगम की दूसरी धुंधली तस्वीर की तरफ नज़र डालें। नगर निगम में भाजपा की यानी तीसरे इंजन वाली सरकार है। एक धाकड़ भाजपा पार्षद इन दिनों वर्तमान परिस्थितियों को लेकर आहत हैं। वह करना तो बहुत कुछ चाहते हैं पर नहीं कर पा रहे हैं। वार्ड के उग्र स्वभाव के लोगों का आक्रोश अलग झेलना पड़ रहा है। एक उग्र युवक ने पार्षद जी को चेताते हुए कहा कि “इसके बाद भी काम नहीं हुआ तो सीधे हेड ऑफ़िस व्हाइट हाउस जाकर प्रदर्शन करूंगा।“ असहाय पार्षद जी को उस आक्रोशित युवक की बात पर गुस्सा नहीं आया बल्कि उल्टे उन्होंने कहा कि “व्हाइट हाउस में सिर्फ़ नारे ही मत लगाना बल्कि भीड़ लेकर जाना, मेरा पुतला भी जलाना। लगे तो पुतले का पैसा भी मेरे से ले लेना। हो सकता है पुतला दहन होने पर लोगों की इधर-उधर घुमती रहने वाली आंखें सही जगह पर जाकर ठहरने लगे।“
जान पड़ती दिख
रही आरडीए में
मुर्दा हो चुके रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) में अब जान पड़ती दिख रही है। आरडीए कमल विहार की तरह अब पिरदा-तुलसी की तरफ नई परियोजना लाकर रायपुर शहर का विस्तार करने की तैयारी में है। पिरदा की सीमा नया रायपुर से जाकर मिलती है। हो सकता है पिरदा-तुलसी की नई परियोजना से मुर्दा शहर नया रायपुर की भी रौनक बढ़े। वो कहते हैं न घायल की गति घायल जाने, कुछ ऐसा ही हाल आरडीए का है। एक के बाद एक सीनियर अधिकारी रिटायर होते चले गए। तीन ऐसे विशेषज्ञ रिटायर अधिकारी थे संविदा में रखकर जिनकी सेवाएं ली जा सकती थी, वो काम नहीं हुआ। हाउसिंग बोर्ड (छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल) के छह लोगों के नाम ज़रूर ऑर्डर निकाल दिया गया कि अपने मूल विभाग के काम के साथ-साथ आरडीए जाकर वहां का भी काम देखें। पूर्व में ऐसा आईएएस अफ़सरों के साथ होते रहा था कि अपने मुख्य विभाग के साथ आरडीए भी देखें, लेकिन छह लोगों के नाम अनोखा आदेश निकालकर एक अनोखी परंपरा की शुरुआत होती दिखी है।

