■ अनिरुद्ध दुबे
छत्तीसगढ़ की तासीर न जाने क्या है, यहां किसी सरकार को ढाई साल होते नहीं कि कुछ-कुछ होना शुरु हो जाता है। जोगी जी की पहली छत्तीसगढ़ सरकार तीन साल के लिए थी। उस सरकार के ढाई साल पूरे होते ही एक के बाद एक तूफान जो आते चले गए थे वो इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हैं। फिर रमन सरकार आई और तीन बार रही। रमन सिंह सरकार का पहला कार्यकाल बिना कोई अवरोध वाला रहा। दूसरे कार्यकाल में ढाई साल बाद उथल-पुथल मचना शुरु हुई भी तो कुछ ऐसी अदृश्य ताकतें काम आईं कि 2013 के चुनाव में आसानी से नैया पार लग गई थी। तीसरे कार्यकाल के ढाई साल पूरे होने के बाद अदृश्य ताकत ने अपने ही नये घर की नींव रखना शुरु कर दिया था। 2018 के चुनावी साल में उस नींव पर इमारत खड़ी हो चुकी थी, और सत्ता परिवर्तन हो गया। 2018 में बनी सरकार के सामने तो ढाई साल वाला घोषित तौर पर संकट खड़ा हो चुका था। उस संकट ने पूरे सरगुजा को हिलाकर रख दिया। इधर, जुलाई 2026 में ढाई साल पूरे हुए तो ज़मीन के नीचे उबाल आना शुरु हो चुका है। बचाव का रास्ता कहां नहीं होता। ऐसी कौन सी चीज है जिसकी काट नहीं। यही कारण है कि दिल्ली में बैठे लोगों ने पुराने बल्बों को बदलना शुरु कर दिया है।
‘परिक्रमा’ व
पराक्रम का अंतर
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों दोनों ही बड़ी पार्टी से जुड़े कितने ही लोगों के मन में कन्फ्यूज़न है कि पराक्रम दिखाएं या फिर परिक्रमा की राह पर चलें। फ़िलहाल तो परिक्रमा करने वालों ने पराक्रम को पीछे छोड़ दिया है। सबसे बड़ी कहलाने वाली पार्टी के प्रभारी के नाम की घोषणा क्या हुई परिक्रमा पर पीएचडी कर चुके लोगों को दिल्ली फ्लाइट की टिकट कटाते देर नहीं लगी। दिल्ली पहुंचते ही बुके व ड्राई फुड का पैकेट लेकर पहुंच गए मैडम के पास। फिर दांत निपोरते हुए यह कहते देर नहीं लगी कि “मैडम आपके अनुभवों व आक्रामक राजनीतिक शैली का छत्तीसगढ़ को भरपूर लाभ मिलेगा। पिछले कुछ महीनों से पार्टी की नैया जो डगमगाती नज़र आ रही थी उससे विपक्षियों को लगने लगा था कि उनकी राह ख़ुद ब ख़ुद आसान होती जा रही है। अब उनके मुंह पर ताला लग जाएगा।“
बुके-ड्राई फुड स्पेशलिस्ट सज्जनों को क्या मालूम कि मैडम को छत्तीसगढ़ में बैठाने वाले नेता जी छत्तीसगढ़ के तथाकथित जाने-पहचाने चेहरों की नस-नस से वाकिफ़ हैं। उन्होंने मैडम को पहले ही समझा रखा है कि छत्तीसगढ़ में प्रभारी के रुप में पहला कदम रखने के बाद करना क्या है।
नेता जी तो बाद में
पहुंचे, पहले ही
पहुंच गई यश कीर्ति
पड़ोसी राज्य के एक बड़े नेता की यहां संगठन में नियुक्ति हुई। नेता जी के छत्तीसगढ़ पहुंचने से पहले ही उनकी यश, कीर्ति व पताका मोबाइल के माध्यम से यहां पहुंचने में देर नहीं लगी। बहुत सी पुरानी अख़बारों की कतरनें यश व कीर्ति का बखान कर रही थीं। कुछ ऐसे पोस्टर भी पहुंचे जो सवाल खड़े करने वाले रहे। पहले वाले संगठन से जुड़े नेता जी काफ़ी सुनहरी यादें छोड़ गए हैं। दूसरे वाले जो नये हैं उनका दीदार पाने और साधने राजधानी रायपुर के एक्सप्रेस वे के रास्ते से गाड़ियां दौड़ना शुरु हो गईं। संगठन के प्रभार वाले नये नेता जी कह गए हैं लगातार आते रहूंगा। कुछ लोगों को आश्वासन भी दे गए चिंता न करें आपकी भावनाओं का सम्मान किया जाएगा।
दोनों हैं तो काम के
छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन महामंत्री रहे अजय जामवाल अब महाराष्ट्र भाजपा संगठन महामंत्री बन चुके हैं। जामवाल जी महाराष्ट्र अपना दायित्व संभालने मुम्बई पहुंचे तो छत्तीसगढ़ से धमतरी के महापौर रामू रोहरा एवं राजधानी रायपुर के सर्वगुण संपन्न युवा नेता आकाश विग भी वहां पहुंचे हुए थे। रायपुर में किसी कार्यक्रम में पार्टी के दो लोग आपसी में चर्चा में मशगूल थे। एक ने पूछा- जामवाल जी के साथ वहां रामू रोहरा व आकाश विग कैसे? दूसरे ने ज़वाब में कहा- दोनों नेता काम के जो हैं।
सिंगल का खेल क्या
पहले किसी विभाग की एक साथ संपूर्ण लिस्ट जारी होती थी, जिसमें दो सौ से पांच सौ तक नाम जारी हो जाते थे। पहली बार ऐसा हो रहा है कि ज्ञान का प्रकाश बिखेरने वाले एक विभाग में चल क्या रहा किसी को कानों कान ख़बर नहीं हो रही है। जगह-जगह से नाम अनुमोदन के लिए मुखिया के पास भेजे गए। मुखिया ने सारी कागज़ी कार्यवाही ईमानदारी से आगे बढ़ा भी दी। लेकिन खेल आगे जाकर शुरु होता है। सूची मीडिया तक पहुंचाने की बात तो दूर विभाग में नीचे काम करने वालों तक के टेबलों पर नहीं पहुंचती। ज्ञान के मंदिर का ऊपर से सिंगल आदेश जारी हो जाता है। उस आदेश के बारे में केवल उपभोक्ता व लाभार्थी को पता होता है।
आख़िर कौन
किसकी सुन रहा…
महापौर का कहना है हमारी कोई सुन नहीं रहा! कुछ विधायक कह रहे हमारी सुनवाई नहीं हो रही! कुछ सांसद कह रहे हमारी सुन कहां रहे हैं! कुछ मंत्री कह रहे हमारी सुनी नहीं जा रही! सवाल यह कि आख़िर कौन किसकी सुन रहा…
गांजा गैंग
नया रायपुर की गांजा गैंग की चर्चा अब पुराने रायपुर में भी होने लगी है। सुट्टा मारने वाले लोग कोई धुनी रमाए रहने वाले बाबा नहीं बल्कि वो लोग हैं जो साहब कहलाते हैं। दुनिया अब रेंग नहीं रही बल्कि तेजी से भाग रही है। टेक्नालॉजी का युग है। घर में टेंशन, बाहर भी टेंशन। सब तरफ टेंशन ही टेंशन। जाम छलकाने शाम का कौन इंतज़ार करे, जब दिन में ही बढ़िया जुगाड़ रहे। जाम तो लड़खड़ा देता है, लेकिन लंबा कश अलौकिक दुनिया में ले जाता है। फिर ज़ुबां से आएं-बाएं-शाएं निकलने की गुंजाइश नहीं रहती। ज़िंदगी की भागमभाग से दूर ऊपरी तौर पर शांत नज़र आने वाले मुर्दा शहर नया रायपुर में हैं कुछ ऐसे ठिकाने, जहां कुछ साहब लोग गांजे का लंबा दम लगाकर कुछ देर के लिए ही सही अलौकिक आनंद प्राप्त कर टेंशन फ्री हो जाते हैं।
पत्रकार व मीडिया
इंफ्लुएंसर में फ़र्क
राजधानी रायपुर की सोमा देवांगन के बाद अम्बिकापुर की आकांक्षा टोप्पो की गिरफ़्तारी भी सुर्खियों में है। सोमा देवांगन जमानत पर रिहा हो चुकी है। आकांक्षा टोप्पो को जेल भेजा गया और उसके भी जमानत पर रिहाई का आदेश जारी हो जाने की ख़बर है। आकांक्षा पर सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने और सोशल मीडिया में विवादित पोस्ट डालने का आरोप है। यू ट्यूब पर छाई रहने वाली दोनों युवतियों को लेकर प्रदेश के मीडिया जगत में नई बहस छिड़ गई है कि दोनों पत्रकार हैं या कुछ और? कोई इन्हें पत्रकार बता रहा है तो कोई मीडिया इंफ्लुएंसर। पुलिस ने आकांक्षा को मीडिया इंफ्लुएंसर ही बताया है।
राजधानी रायपुर के जाने-माने फोटो जर्नलिस्ट गोकुल सोनी ने हाल ही में फ़ेस बुक में जो एक पोस्ट डाली वह कोई कम चौंकाने वाली नहीं। गोकुल सोनी की पोस्ट कुछ इस तरह है कि हमारे प्रदेश के एक महाविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की आंतरिक परीक्षा हुई। परीक्षा के एक प्रश्न पत्र में एक बड़ा ही सामान्य-सा प्रश्न पूछा गया- देश की दो महिला पत्रकारों के नाम लिखिए, जिनसे आप प्रभावित हैं और क्यों? अब आप भी सोच रहे होंगे कि उत्तर में किसी प्रसिद्ध राष्ट्रीय पत्रकार का नाम आया होगा। आख़िर पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं, देश-दुनिया की चर्चित महिला पत्रकारों को तो जानते ही होंगे। लेकिन ज़नाब, उत्तर पुस्तिका खोली गई तो कहानी ने ऐसा ट्विस्ट लिया कि पढ़ने वाले प्राध्यापक भी शायद एक पल के लिए चश्मा ठीक करके दोबारा पढ़ने को मज़बूर हो गए! परीक्षार्थी ने जिन दो महिला पत्रकारों के नाम लिखे, वे थे- आकांक्षा टोप्पो और सोमा देवांगन!
शोर शराबे से दूर रहकर
साहब काम में तल्लीन
पुलिस महकमे में हैं कुछ ऐसे लोग जिन्हें रह-रहकर प्रचार प्रसार की भूख लगती रहती है। अख़बारों में कुछ छपवा लेने या स्क्रीन पर कुछ चलवा देने के बाद ही उनकी क्षुधा शांत होती है। वहीं एक पुलिस अफ़सर ऐसे भी हैं जो शोर शराबे से दूर रहते हुए चुपचाप अपने काम में जुटे हुए हैं। खुफिया तंत्र से जुड़े इन अफ़सर ने मानो विभाग का बड़ा भार अपने कंधों पर ले रखा है। साहब का दिल्ली-रायपुर दोनों जगह रहना हुआ है। जैसा कि उनकी शैली है फोटो खिंचवाकर छपवाने की जो होड़ मची है उससे दूर हैं। पुलिस महकमे में ऊंचे लेवल पर सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है केन्द्र व प्रदेश के बीच समन्वय बनाए रखना, वह काम साहब पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कर रहे हैं।

