● कारवां (10 अप्रैल 2022) …… तो नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार!

■ अनिरुद्ध दुबे

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का वक्तव्य सामने आया है कि “यदि नक्सली भारत के संविधान पर आस्था जताते हुए सामने आते हैं तो सरकार उनसे बातचीत के लिए तैयार है।“ इसमें कोई दो मत नहीं की छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से नक्सली घटनाओं में कमी आई है। इसके अलावा हाल ही में बस्तर के कोंडागांव जिले को केन्द्र सरकार ने अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र की सूची से बाहर किया है। आशा की किरण नज़र आती देख यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नक्सलियों से बातचीत के रास्ते खोलते हैं तो हो सकता है इसके लिए उन्हें कोई सशक्त माध्यम मिल भी जाए। बातचीत के प्रयास तो पहले भी होते रहे थे, लेकिन बीच में कोई न कोई रोड़ा सामने आते रहा। केन्द्र में जब यूपीए की सरकार थी तत्कालीन गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने भी तब सोचा था कि बातचीत के माध्यम से कोई रास्ता निकल आए। इस काम के लिए उन्होंने स्वामी अग्निवेश को तैयार किया था। बातचीत की कोशिशें हो ही रही थीं कि नक्सली नेता आजाद की नागपुर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। प्रयास का वह क्रम वहीं पर टूट गया। छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार थी कुछ जवानों का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था। तब की प्रदेश सरकार ने बातचीत के लिए स्वामी अग्निवेश को ही आगे किया था। अग्निवेश व कुछ अन्य के प्रयासों से जवान छूटकर आ गए थे। यह भी सुनने मिलते रहा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सली समस्या के समाधान के लिए पहल करने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर से अनुरोध किया था। श्री श्री रविशंकर ने तब खुले तौर पर कहा भी था कि “नक्सली भी हमारी तरह इंसान हैं, कोई अलग नहीं। यदि बातचीत की कोई स्थिति बनती है तो वे कदम बढ़ा सकते हैं।“ संभावनाएं कभी ख़त्म नहीं होतीं। किसी ज़माने में जब पंजाब एवं असम आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दोनों राज्यों के कुछ चर्चित नेताओं से बातचीत की थी, जिसे पंजाब समझौता एवं असम समझौता के नाम से जाना जाता है।

खैरागढ़ जिला बनाने की

घोषणा व 71 का आंकड़ा

खैरागढ़ उप चुनाव में कांग्रेस ने घोषणा पत्र के माध्यम से जिला बनाने की घोषणा का जो दांव खेल दिया है वह विपक्ष के सारे समीकरणों पर भारी पड़ गया है। कांग्रेस के घोषणा पत्र आने से पहले कौन सी जाति का वोट किस तरफ पड़ेगा, वनांचल में बसे लोग किस पार्टी के प्रति विश्वास जताएंगे तथा जोगी कांग्रेस कितनी ताकत दिखा पाएगी जैसी चर्चाएं होती रही थीं। अब चुनावी क्षेत्र में जिधर देखो उधर 24 घंटे के भीतर खैरागढ़ को जिला बना देने के वादे की ही चर्चा हो रही है। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद खैरागढ़ से पहले तीन उप चुनाव मरवाही, दंतेवाड़ा एवं चित्रकोट में हो चुके हैं। उन तीनों उप चुनाव में भी कांग्रेस ने ऐसा पांसा फेंका था जो विपक्ष के पांसे पर भारी पड़ता नज़र आया था। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 68 सीट मिली थी। दंतेवाड़ा एवं मरवाही उप चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस विधायकों की संख्या बढ़कर 70 हो गई। यदि खैरागढ़ भी कांग्रेस जीत लेती है तो उसके विधायकों का आंकड़ा 70 के उस पार 71 हो जाएगा। यानी 90 में 71 कांग्रेस के विधायक। इतने बड़े बहुमत के साथ कांग्रेस का छत्तीसगढ़ की सत्ता में रहना वाकई इतिहास के पन्ने में दर्ज होगा। 2018 में मरवाही से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जनता कांग्रेस विधायक  अजीत जोगी ने विधानसभा में कहा भी था कि भविष्य में अब शायद ही ऐसा बहुमत कभी किसी पार्टी को मिल पाए।

विधायक जी के अब

दिखेंगे सख़्त तेवर

राजधानी रायपुर में रहने वाले एक कद्दावर विपक्षी विधायक  परिवार समेत सरकारी बंगले से अपने निजी बंगले में शिफ्ट हो चुके हैं। सरकारी बंगले का उपयोग अब विधायक के कार्यालय के रूप में होने लगा है। विधायक को बेहद क़रीब से जानने वाले बताते हैं कि नेता जी ने तय कर रखा था कि शुरुआती तीन वर्ष शांतिपूर्ण तरीके से सरकार का विरोध करना है और आख़री दो वर्ष में जमकर आक्रामकता दिखानी है। चुनाव को पौने दो साल बचे हैं और विधायक की आक्रामकता की झलक दिखनी शुरु हो गई है। मार्च में हुए विधानसभा के बजट सत्र में विधायक के तेवर काफी तीखे थे। बताते हैं खैरागढ़ उप चुनाव हो जाने के बाद कौन सी रणनीति के तहत आगे बढ़ना है इसका नक्शा विधायक महोदय के दिमाग में तैयार है।

राजधानी का फायर ब्रिगेड

पर सूरक्षा जाल तक नहीं

राजधानी रायपुर में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जो प्रिंट, इलेक्ट्रानिक एवं डिजीटल मीडिया हर तरफ छाई रही। ऐसे देखें तो यह ख़बर मामूली सी लगती है लेकिन उससे जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर गहराई से सोचा जा सकता है। हुआ यूं कि मध्यप्रदेश के सतना का एक युवक रायपुर शहर पर बदनुमा दाग की तरह आधे अधूरे बनकर खड़े स्काई वॉक पर चढ़ गया था। उसका कहना था कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसे बेहतर इलाज़ नहीं मिल रहा है। कलेक्टर-एसपी को बुलाया जाए। उनसे बात करने के बाद ही वह नीचे उतरेगा। इस बात की ख़बर लगते ही विधायक कुलदीप जुनेजा, कुछ पुलिस कर्मी और बहुत से आम नागरिक वहां पर पहुंच गए। विधायक से लेकर मौजूद अन्य लोगों ने उसे कई बार उतरने कहा, लेकिन वह अपनी जिद्द पर अड़े रहा। फायर ब्रिगेड की गाड़ी बुलवानी पड़ी। कुछ पुलिस वाले उसे उतारने ऊपर चढ़े। पुलिस को देख वह कुछ देर स्काई वॉक में लटके रहा। नीचे फायर ब्रिगेड के कर्मचारी चादर फैलाए खड़े रहे। संतुलन खोने के बाद वह कई फुट ऊपर से नीचे गिरा तो वह चादर में न आकर जमीन पर गिर गया। उसे घायलावस्था में मेकाहारा ले जाकर दाखिल कराया गया। इस घटना के बाद से एक बात साफ हो गई राजधानी के फायर ब्रिगेड का यह हाल है कि ऐसी कोई विषम परस्थिति सामने आ जाए तो बचाव के लिए उसके पास जाल तक नहीं है। बरसों पहले रायपुर के राजधानी बनने के बाद नगर निगम ने तय किया था कि शहर के सब तरफ फैलाव को देखते हुए चारों दिशाओं में फायर ब्रिगेड का दफ़्तर रखा जाए, ताकि किसी तरह की इमर्जेन्सी में तत्काल समाधान हो सके, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस सत्ता में तो बाद में आई उसके पहले से उसका नरवा गरवा घुरवा बारी का नारा चला आ रहा है। रोका छेका अभियान को लेकर बड़े-बड़े दावे होते रहे हैं। यह सब चर्चा होते देख कुछ और पुराना भी याद आ जाता है। राजधानी रायपुर में जगह-जगह सड़कों पर गाय-भैंस की बहुतायत को देखते हुए नगर निगम का चारों दिशाओं में गोकुल नगर बनाने का प्लान था। मठपुरैना में एक ही गोकुल नगर बन पाया बाकी तरफ बनने की योजना टॉय-टॉय फिस्स हो गई।

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