● टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुज़रने की यात्रा ‘भूलन’

■ (जैसा कि मनोज वर्मा ने अनिरुद्ध दुबे को बताया)

छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘महूं दीवाना तहूं दीवानी’ बनाने के बाद जब मेरी मुलाक़ात जाने-माने साहित्यकार संजीव बख्शी जी से हुई तो सामान्य चर्चा में उन्होंने बताया कि मुख्यतः वो एक कवि हैं और कुछ कविताओं का शीर्षक उन्होंने मुझे बताया- जैसे ‘सफेद की कुछ दूरी पर पीला रहता था’, ‘तार को आ गई है हल्की सी हॅसी।‘ इन शीर्षकों में ही इतना कुछ था कि मेरी बख्शी जी की अन्य रचनाओं में रुचि हो आई और मैं उनसे पूछ बैठा कि क्या आपने कोई कहानी नहीं लिखी, उनका जवाब था “लिख रहा हूं भूलन कांदा।“ कहानी का ऐसा अनोखा शीर्षक सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। मैं उनसे पूछ बैठा ये भूलन कांदा क्या होता है? तब बख्शी जी ने बताया कि “ये एक ऐसा पौधा है जो छत्तीसगढ़ के जंगलों में पाया जाता है, जिस पर पैर पड़ जाए तो आदमी होश खो बैठता है और रास्ता भटक जाता है। वह तब तक होश में नहीं आता जब तक कोई उसे छू न ले।“ लगा कि शायद मुझे वो मिल गया जिसे मैं खोज रहा था और आनन-फानन में मैंने बख्शी जी से इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने की इच्छा जाहिर कर दी।

बख्शी जी ने कहा कि “अभी उपन्यास पूरा नहीं हुआ है और जब भी पूरा होगा मैं बताऊंगा और फिर बेशक आप उस पर फ़िल्म बना सकते हैं।“ उसके बाद मेरी छत्तीसगढ़ी फ़िल्में ‘मिस्टर टेटकूराम’ और ‘दू लफाड़ू’ भी आ गईं। इसी बीच ‘भूलन कांदा’ उपन्यास आ गया और आते ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय भी बन गया। इस पुस्तक का विमोचन समारोह हुआ। समारोह में विश्वविख्यात फ़िल्म समीक्षक एवं अनुवादक विष्णु खरे जी ने इच्छा ज़ाहिर की कि “इस उपन्यास पर फ़िल्म बननी चाहिए और फ़िल्म बनाने वाले में सत्यजीत रे जैसी दृष्टि होनी चाहिए।“ अब मेरे लिए ये बड़ी चुनौती थी कि फ़िल्म में वो स्तर हो जिसकी आशा मुझसे की जा रही थी। मैंने इसे काफ़ी गंभीरता से लिया और कई बार ‘भूलन कांदा’ पढ़ा। फ़िल्म निर्माण के लिए लगभग चार साल तैयारी चली। फ़िल्म में जिस लोकेशन की आवश्यकता थी वो सिर्फ़ और सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में ही मिल सकती थी, ऐसा मेरा मानना था। इसके लिए बस्तर के कांकेर, जगदलपुर के आसपास एवं भानुप्रतापपुर में लोकेशन तलाशी गई लेकिन इन सभी जगहों में वो बात नज़र नहीं आ रही थी जो कि बख्शी के उपन्यास में लिखा है। गांव में साफ सुथरे मिट्टी के बने घर, कच्ची सड़कें और जंगल। बस्तर इलाके में हम लोकेशन तलाशने जहां भी जा रहे थे वहां के गांव विकसित हो चुके थे। ऐसा भी महसूस हुआ कि कहीं कहीं पर विकास ने आदिवासियों की मौलिकता गुम कर दी है। अब हमने रुख़ किया गरियाबंद की तरफ जहां मुझे वो गांव मिल गया जिसकी मुझे तलाश थी। वह गांव महुआभाठा था। जब विष्णु खरे जी ने उस लोकेशन के चित्र देखे तो उन्होंने कहा कि “तुम्हारी 60 प्रतिशत फ़िल्म तो बन गई, कितना खूबसूरत लोकेशन है।“ उनके यह कहने से मेरा आत्मविश्वास और बढ़ गया और फिर इसी क्रम में जेल को भी नज़दीक से जाकर देखा। चूंकि फ़िल्म में जेल के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य हैं, इसलिए जेल के अंदर किस तरह की व्यवस्था है, कैदियों का एक दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार होता है, नंबरदार या चक्करदार क्या होता है, एक फ़िल्म के डायरेक्टर होने के नाते यह सब जानना मेरे लिए ज़रूरी हो गया था। हम 5 नवंबर 2016 से शूटिंग शुरु करने वाले थे। इससे पहले आर्टिस्ट फाइनल करने की बात थी। मुम्बई के एक बड़े आर्टिस्ट फाइनल हो गए थे। चर्चा के वक़्त उन्होंने यही कहा था कि “मैं यह फ़िल्म कर रहा हूं।“ मैंने उनसे कहा था आपको एडवांस में कितने का चेक दे दूं। उन्होंने हॅसते हुए कहा था- “आप ग़लत आदमी से बात कर रहे हैं। बस इतना ध्यान रखें कि मैं फ़िल्म कर रहा हूं।“ मैंने कहा कि आपको कुछ तो टोकन मनी दे दूं। तब भी उन्होंने कहा था- “नहीं।“ शूट शुरु होने से कुछ दिनों पहले मैंने उन्हें फोन लगाकर कहा कि 3 नवंबर की आपकी फ्लाइट की टिकट बुक करा रहा हूं। 4 को आप रेस्ट कर लेंगे। 5 से हम महुआभाठा में शूटिंग शुरु कर देंगे। तब उन्होंने मुझसे कहा कि “मनोज भाई पैसे की बात तो नहीं हुई है।“ मैंने उन्हें याद दिलाया कि मुम्बई में तो वैनेटी वेन में आपसे बात की थी, हो सकता है आपको कन्फ्यूजन हो रहा हो। उन्होंने यह सुनने के बाद बड़ी रकम की डिमांड कर दी। तब मुझे लगा कि बाद में और दूसरे किस्म की परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। मैंने जाने-माने आर्ट डायरेक्टर जयंत देशमुख जी को फोन लगाया और मार्गदर्शन मांगा। जयंत दादा ने तूरंत सुप्रसिद्ध फ़िल्म राइटर एवं नाट्य निर्देशक अशोक मिश्रा जी से बात करने कहा। मैंने अशोक मिश्रा जी से महत्वपूर्ण रोल के लिए फोन पर संपर्क साधा। उस समय वे सतना में थे। आत्मीयता दिखाते हुए वे उस रोल को करने सहर्ष तैयार हो गए और तूरंत रायपुर के लिए निकल पड़े। हमने बॉलीवुड एक्ट्रेस अणिमा पगारे से बात की, वो लीड हीरोइन का किरदार करने के लिए तैयार हो गईं। जयंत दादा के माध्यम से राजेन्द्र गुप्ता जी एवं मुकेश तिवारी जी जैसी बॉलीवुड के नामी हस्तियां ‘भूलन’ से जुड़ीं। निर्धारित तारीख़ 5 नवंबर को शूटिंग स्टार्ट हो गई। फिर 8 नवंबर की रात अचानक नोटबंदी हो गई। यहां भी ऊपर वाला हमारे साथ था। हम 5 लाख के बड़े नोट लेने बैंक पहुंचे। वहां हमें 100-100 नोट के 50 बंडल पकड़ा दिए गए। चूंकि हम बड़ा नोट चाहते थे अतः बैंक के स्टॉफ के साथ हमारा जमकर विवाद हुआ। बड़ी मुश्किल से हमें स्टॉफ ने 500 के नोट की दो गड्डियां पकड़ाईं। उस समय कुछ दिनों के लिए पेट्रोल पंप को 500 एवं 1000 के पुराने नोट लेने की परमिशन मिली हुई थी। वहां हमने कुछ पुराने नोट चलाए। रोजमर्रा के कामों में 100-100 की गड्डियां काम आईं। जहां शूट कर रहे थे वह जंगली इलाक़ा था। शुद्ध पानी के लिए भी 30 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। सबसे अहम् फैक्टर ये कि किसी भी मामले में हम समझौता करने के मूड में नहीं थे। रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए हमें गरियाबंद आना-जाना करना पड़ता था। मजे की बात ये कि खाना बनाने वाले के सामने अलग धर्म संकट था। कोलकाता से जो कैमरा वाली टीम आई थी वह सबेरे नाश्ते में रोटी पसंद करती थी। हमारे यहां सुबह नाश्ते में रोटी कम ही लोग खाया करते हैं। मुम्बई की टीम को हम गरियाबंद में रुकवाए हुए थे, अतः वहां किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी। इस तरह 20-22 दिन महुआभाठा में शूट चला। वहां का काम पूरा होने के बाद पूरी टीम रायपुर शिफ्ट हुई। कलेक्टोरेट का सीन फ़िल्माना था। तब रायपुर कलेक्टर ओ.पी. चौधरी थे। हमने उनसे संपर्क किया। उन्होंने कलेक्टोरेट में फ़िल्मांकन की अनुमति दे दी। अब कोर्ट का सीन फ़िल्माने की बारी थी। रायपुर के सिविल लाइन इलाके में मैसॉनिक लॉज है, जिसे भूत बंगला भी कहते हैं। आर्ट डायरेक्टर जयंत दादा ने इस जगह को कोर्ट बिल्डिंग का बेहतरीन स्वरुप दिया। इस तरह लगातार 5 दिन रायपुर में शूट चला। अब जेल का सीन फ़िल्माना था। यहां भी किस्मत मेहरब़ान थी। उसी समय खैरागढ़ में नई जेल बनी थी, जिसका लोकार्पण नहीं हुआ था। वहां जेल का सीन शूट करने की अनुमति मिल गई। अब दिक्कत यह थी कि जेल मुख्य खैरागढ़ शहर से 20-25 किलोमीटर दूर थी। जेल की बैरक में ही हमारी टीम के बहुत से लोग गद्दे डालकर सोए। कुछ लोगों की खैरागढ़ तो कुछ की छुईखदान में ठहरने की व्यवस्था करवाई गई। पहले जंगली इलाका, फ़िर रायपुर उसके बाद खैरागढ़ इस तरह हवा पानी बदलने से पांच- छह लोगों की तबियत काफ़ी ख़राब हो गई थी। रायपुर में शूटिंग के दौरान कोलकाता से आए लाइटमेन पंकज मैती को अचानक सीने में दर्द उठा। थोड़ी देर में मेरे सहयोगी एंथोनी गार्डिया का फोन आया कि पंकज की तकलीफ़ बढ़ती ही जा रही है। मैं पंकज का हाल जानने निकल ही रहा था कि मेरे बड़े भैया डॉ. अनूप वर्मा जी बोले मैं भी चलता हूं। जब वे पंकज को देखे तो उन्हें डाउट हुआ कि अटैक हो सकता है। फिर हम पंकज को लेकर तूरंत डॉ. अजय सहाय जी के यहां गए। सहाय जी ने हार्ट अटैक होने की पुष्टि कर दी। रातों रात हम पंकज भाई को एमएमआई लेकर गए। वहां उनकी एंजियोप्लास्टी हुई। उस पूरी रात सोना नहीं हुआ। ठीक दूसरे दिन शूट था। कॉल टाइम 7 बजे का था। मैं तैयार होकर सुबह 6 बजे सेट पर पहुंच गया। दिन का काम ख़त्म होने के बाद पूरी रात “झूमर जा पड़की झूमर जा…” गाने का शूट चला। कोरियोग्राफर निशांत उपाध्याय ने इस गाने की काफ़ी अच्छी कोरियोग्राफी की। पर्दे पर सारा कुछ वास्तविक दिखाने के लिए महुआभाठा से जिन ग्रामीणों को हमने बुलवाया था वह उस गाने का हिस्सा बने। इस तरह जागरण की वो दो रातें कभी भुलाई नहीं जा सकेंगी। महुआभाठा के ग्रामीणों का जो सहयोग रहा वह कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उन्हें बता दिया जाता था शूट के वक़्त कैमरे की तरफ नहीं देखना है और वे बिल्कुल नहीं देखते थे। एकदम अनुशासित लोग। उनकी एक्टिंग भी एकदम नैचुरल। उनके कारण फ़िल्म का लुक ही अलग आया है। शूट पूरा हो जाने के बाद मैं और मेरे सहयोगी तुलेंद्र पटेल एडिटिंग में लग गए। एडिट के बाद फ़िल्म 2 घंटे 37 मिनट की थी। हमें लगा कि बहुत बड़ी हो रही है। फिर काट-पीटकर हम उसे 2 घंटे 27 मिनट पर लाए। अब लगा कि शूट अच्छा हुआ है तो बेकग्राउंड म्यूज़िक भी अच्छा ही होना चाहिए। छत्तीसगढ़ी व हिन्दी फ़िल्म बना चुके मेरे प्रोड्यूसर मित्र रॉकी दासवानी ने सूझाव दिया कि बेक ग्राउंड म्यूज़िक मोंटी शर्मा जी से करवाइये। बॉलीवुड में उनका काफ़ी नाम है। फिर ये भी पता चला कि हमारे रायपुर शहर के ही दर्शन सांखला मोंटी जी के क़रीबी हैं। हमने दर्शन सांखला से बात की। दर्शन के माध्यम से मोंटी जी से मुलाक़ात हुई। वे क़माल के लगे। ‘भूलन’ जैसे सब्जेक्ट के बारे में सुनकर वे काफ़ी अविभूत हुए और बेक ग्राउंड म्यूज़िक करने तैयार हो गए। बेक ग्राउंड म्यूज़िक के लिए मैं कुछ दिन मुम्बई में रहा। न्यू महाड़ा के पास मोंटी जी का ऑफिस था और मैं अंधेरी स्टेशन के पास रुका था। एक रात जब मोंटी जी के पास से लौट रहा था भयंकर बारिश होने लगी। सड़कों पर घुटने तक पानी था। महसूस हुआ कि ऐसी दिक्कत फिर सामने आई तो उससे काम प्रभावित होगा। मेरी ससुराल नवी मुम्बई के खार घर में है। वहां से मैं बुलेट बाइक लेकर आया। तब छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जाने-माने डायरेक्टर सतीश जैन जी भी मुम्बई में ही थे। वहां रोज़ाना सतीश जी से मुलाक़ात हो जाया करती थी। मोंटी जी ने क़माल का बेक ग्राउंड म्यूज़िक तैयार किया। इसके बाद बालाजी स्टूडियो मुम्बई में सौविक फुकान ने मिक्सिंग की। जिस समय हमारी फ़िल्म की मिक्सिंग चल रही थी, सौविक अक्षय कुमार स्टारर फ़िल्म ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ की भी मिक्सिंग कर रहे थे। मैं जब फ़िल्म का शीर्षक गीत “भूलन कांदा भूलन कांदा…” लिख रहा था तभी तय कर लिया था इसे मशहूर सिंगर कैलाश खेर जी से गंवाना है। मैं और मोंटी शर्मा जी कैलाश खेर जी के सेक्रेटरी से मिले जिनका नाम सतीश था। सेक्रेटरी के माध्यम से संदेश कैलाश जी के पास पहुंचा और वे गाने के लिए तैयार हो गए। कैलाश जी दो घंटे में गाना गाकर रिकॉर्डिंग रूम से बाहर आ गए। उनका वह गाना इन दिनों यू ट्यूब पर ख़ूब देखा जा रहा है। कैलाश जी ने ख़ूब मस्ती के साथ इस गाने को गाया है। निर्माण का काम पूरा हो जाने के बाद हमारी फ़िल्म नेज़ इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल कोलोकाता में दिखाई गई। वहां तक़रीबन सारे दर्शक बंगाली भाषी थे। वहां दर्शकों ने इस फ़िल्म को सिर आंखों पर उठाया। हमारी फ़िल्म के डीओपी कोलकाता के ही संदीप सेन थे। उन्होंने मुझसे कहा कि “बूरा नहीं मानें तो मनोज जी एक बात कहूं, मैंने पूरी फ़िल्म देखी। डीआई में उतना मजा नहीं आ रहा है। अग़र आप चाहें तो कोलकाता में ही डीआई करवा लें। कोशिश करूंगा कि कम कीमत में हो जाए।“ फिर कोलकाता के कलरिस्ट मानस भट्टाचार्य ने फिर से पूरी फ़िल्म का डीआई किया। इसके बाद अन्य फेस्टिवलों में भी इस फ़िल्म को भेजने का क्रम जारी रहा। क़रीब 10 फेस्टिवल में यह फ़िल्म गई। लगा कि क्यों न इस फ़िल्म को नेशनल अवार्ड के लिए भेजा जाए। फिर सेंसर कराने मैं और मेरे मित्र शैलेन्द्रधर दीवान ओड़िशा सेंसर बोर्ड के दफ़्तर गए। वहां आर.ओ. ऑफिसर गोपालकृष्ण जी ने यह फ़िल्म देखी। फ़िल्म देखने के बाद उन्होंने मुझे गले लगा लिया और पूछा कि “इसे नेशनल अवार्ड के लिए भेज रहे हैं या नहीं। नेशनल अवार्ड इसे नहीं मिलेगा तो फिर किसे मिलेगा।“ मैंने कहा- “इसीलिए सेंसर करवाने आए हैं।“ फ़िल्म सेंसर होने के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए दिल्ली पहुंची। उप राष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू जी के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने का मुझे गौरव हासिल हुआ। ये उपलब्धि केवल मेरी नहीं ‘भूलन द मेज़’ से जुड़ी पूरी टीम की है। ‘भूलन कांदा’ पर फ़िल्म बनाने के पीछे मेरा मक़सद यही रहा कि हम छत्तीसगढ़ की संस्कृति को देश-विदेश में दिखा सकें और लोगों की सोच पर खरे उतर सकें।

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