● कारवां (5 जून 2022)- छिपा हुआ पत्ता रमेश बैस

■ अनिरुद्ध दुबे

आसार तो यही नज़र आ रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा किसी चेहरे को सामने रखकर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगी। कई ऐसे पहलू हैं जिन्हें लेकर भाजपा को लगातार विचार मंथन करना पड़ रहा है। दिल्ली में बैठे भाजपा के बड़े नेताओं को बराबर इस बात की ख़बर है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के जन मानस के बीच गहरी पैठ बना चुके हैं। आगे चाहे जो हालात रहें अभी की स्थिति में तो अंगद के पांव की तरह बघेल के पैर जमे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि इसकी काट के बारे में ऊपर के भाजपा नेता कुछ सोच नहीं रहे। बहुत अंदर की ख़बर यह है कि भाजपा के दिग्गजों के मन में विचार चल रहा है कि भूपेश बघेल पिछड़ा वर्ग से हैं। क्या उनकी काट कोई पिछड़ा वर्ग नेता हो सकता है? भाजपा को इस समय पिछड़ा वर्ग के ऐसे नेता की तलाश है जो कि पार्टी के भीतर सर्वमान्य हो। वैसे तो भाजपा में धरमलाल कौशिक, अजय चंद्राकर, विजय बघेल एवं ओ.पी. चौधरी जैसे पिछड़ा वर्ग के नामी नेता हैं लेकिन दिग्गज नेताओं के मन में रह-रहकर जो दूसरा एक नाम आ रहा वह रमेश बैस का है। सात बार सांसद रह चुके बैस वर्तमान में झारखंड के राज्यपाल हैं। इससे पहले त्रिपुरा के राज्यपाल थे। 2019 में सीटिंग सांसद होने के बाद भी जब उनकी रायपुर लोकसभा क्षेत्र से टिकट काट दी गई थी तब उन्हें तरह-तरह से उकसाने की कोशिश की गई थी कि वे खुलकर अपना विरोध दर्ज कराएं। बैस ने यह कहते हुए बाग़ी तेवर दिखाने से मना कर दिया था कि “पार्टी का हुक्म सिर आंखों पर।“ इसका उन्हें प्रतिसाद भी मिला, पहले त्रिपुरा फिर झारखंड के राज्यपाल के रूप में। लगातार बाहर रहने व सक्रिय राजनीति से दूर रहने का उनके पक्ष में फायदा यह रहा कि वर्तमान में पार्टी के भीतर उनकी छवि पूरी तरह निर्विवाद है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में तो वे सन् 2003 में भी थे लेकिन उस समय डॉ. रमन सिंह बाजी मार ले गए। जिस तरह ओबीसी कार्ड के नाम पर दिल्ली के रास्ते रह-रहकर बैस का नाम आ रहा है उससे हो सकता है कि आगे कुछ नये समीकरण उभरकर सामने आएं।

राज्यसभा चुनाव में

छत्तीसगढ़ किनारे

छत्तीसगढ़ की राज्यसभा सीटों के लिए कांग्रेस के जिन दो उम्मीदवारों के नाम की घोषणा हुई वह काफी चौंका देने वाले रहे- राजीव शुक्ला और रंजीत रंजन। राजीव शुक्ला राजनीति में आने से पहले बरसों पत्रकार रहे। खेल जगत से उनका गहरा वास्ता रहा। वर्तमान में वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष हैं। रंजीत रंजन बिहार के बहुचर्चित नेता पप्पू यादव की पत्नी हैं। पूर्व में माना यही जा रहा था कि दो सीटों में से भले ही एक पर किसी दूसरे राज्य के नेता को एडजस्ट कर दिया जाए लेकिन दूसरे पर ज़रूर छत्तीसगढ़ के किसी नेता के राज्यसभा में जाने के रास्ते खोले जाएंगे। हुआ इसका एकदम उलट। दोनों ही सीटों के लिए दिल्ली से दूसरे प्रदेशों के नेताओं का नाम भेज दिया गया। सूत्र तो यही बताते हैं कि छत्तीसगढ़ से जो नाम भेजे गए थे उन्हें किनारे लगा दिया गया। वैसे छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए गिरीश देवांगन, विनोद वर्मा, सतीशचंद्र वर्मा, डॉ. राकेश गुप्ता एवं राजेन्द्र तिवारी के नामों की लगातार चर्चा होती रही थी। दूसरी तरफ विधानसभा अध्यक्ष डॉ.चरणदास महंत ने ख़ुद से होकर इच्छा जताई थी कि वे राज्यसभा जाना चाहते हैं। दिल्ली इतनी दूर हो गई कि यहां के नामों की वहां तक आवाज़ ही नहीं पहुंची और राजीव शुक्ला एवं रंजीत रंजन जैसे चौंकाने वाले नाम सामने आ गए। सिविल लाइन व शंकर नगर में ज़्यादा समय बिताने वाले कुछ कांग्रेसी बताते हैं कि “पैराशूट की तरह ऊपर से छत्तीसगढ़ में जो दो नाम उतारे गए उन्हें लेकर खुद मुखिया हैरान थे। दो दिन तो ऐसे भी गुज़रे जब मुखिया के चेहरे पर से उत्साह ग़ायब था।“ रंजीत रंजन को लेकर कांग्रेस के कुछ लोग चुटीले अंदाज़ में यह कहते नज़र आए कि “जन्म रींवा में हुआ, बचपन जम्मू कश्मीर में बीता, पढ़ाई पंजाब में हुई, सैटल दिल्ली में हुईं, शादी बिहार में हुई और राज्यसभा सदस्य छत्तीसगढ़ से बनीं।“ इसे कहते हैं तक़दीर।

भूपेश का ‘भूलन’ देखना

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद तीन ऐसे मौके आए जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने मंत्री मंडल के सदस्यों व विधायकों के साथ मल्टीप्लेक्स में जाकर फ़िल्म देखे। पहली बार देखने गए थे ‘हॅस झन पगली फॅस जबे’, उसके बाद ‘द कश्मीर फाइल’ और अब ‘भूलन द मेज़।‘ इस कॉलम में पहले भी लिखा जा चुका है कि लोग अब इसे टोटका मानने लगे हैं कि भूपेश बघेल जिस फ़िल्म को जाकर देख लें वह टिकट खिड़की पर कमाल कर जाती है। ‘हॅस झन पगली फॅस जबे’ व ‘कश्मीर फाइल’ के साथ तो ऐसा ही हुआ था और अब ‘भूलन द मेज़’ के साथ भी ऐसा ही होते दिख रहा है। सिंगल स्क्रीन एवं मल्टीप्लेक्स में ‘भूलन’ देखने वालों की संख्या पहले से कहीं और ज़्यादा बढ़ गई है।

शराब और गांजे

के शौकीन ये चूहे

कुछ ऐसे भी किस्से होते हैं जो जुड़े तो अपराध की दुनिया से होते हैं लेकिन उन्हें पढ़ने या सुनने में काफ़ी मज़ा आता है। जब थानों में चूहे अपराध व अपराधी से जुड़े साक्ष्यों को प्रभावित करने लग जाएं तो इसे क्या कहियेगा! सुनने में तब और ज़्यादा मज़ेदार लगता है जब यह पता चले कि चूहे गांजे और शराब के भी शौकीन होते हैं। मामला कुम्हारी एवं नंदिनी थाने का है। इन दोनों थाने के मालखाने में जब्त गांजे रखे हुए थे। कुछ दिनों पहले कोर्ट में दोनों थानों की ओर से लिखकर दिया गया कि गांजे के सैंपल के पैकेट जो जब्त करके रखे गए थे उन्हें चूहों ने कुतर दिया। ये तो रही गांजे की बात। बरसों पहले रायपुर रेल्वे पुलिस थाने से एक दिलचस्प जानकारी निकलकर सामने आई थी। रेल्वे पुलिस व्दारा किसी मामले में जब्त की गई शराब थाने के मालखाने में लाकर रखी गई थी। एक लंबे अंतराल के बाद जब पुलिस स्टाफ मालखाने में घुसा तो पाया कि कुछ बोतलों में शराब काफ़ी कम मात्रा में नज़र आ रही है। जब उन्हें उठाकर देखा तो मालूम हुआ कि बोतलों की सील नहीं टूटी है लेकिन ढक्कन में ऊपर से छेद है। अब माथापच्ची इस बात को लेकर होती रही कि यह हुआ तो कैसे हुआ? वहां का एक पुलिस कर्मी ग़हरी समझ रखता था। उसने सस्पेंस पर से पर्दा उठा दिया। उसने कहा कि “दरअसल यह चूहों का काम है। थाने को अपना अड्डा बना चुके ये चूहे शराब के शौकीन हो गए हैं। इन्हें शराब की गंध जब लुभाने लगी तो ढक्कन को कुतरने में इन्होंने कोई कोताही नहीं की। ढक्कन में जब छेद हो गया तो ये अपनी लंबी पूंछ को बोतल के भीतर डूबो-डूबोकर निकालते रहे होंगे। जब पूंछ बाहर आती फिर उसे ये चाटते रहे होंगे।“ बाक़ी पुलिस वालों ने अपने इस साथी की बात का लोहा मान लिया था। फिर कुछ नाइट ड्यूटी वालों ने कमेन्ट्स भी किया कि “तभी ये चूहे रात को नशे में हमारी टेबल कुर्सी के पास आकर बिना डरे उछल-कूद मचाया करते थे।“ यानी दो घूंट भीतर जाते ही ये चूहे पुलिस वालों के सामने शेर हो जाते थे।

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