■ अनिरुद्ध दुबे
हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों के पास रात में अचानक सीएम हाउस पहुंचने की सूचना क्या पहुंची तरह-तरह की अटकलों का दौर शुरु हो गया। विशेषकर सोशल मीडिया में अटकलों की बाढ़ ही आ गई। सबसे ज़्यादा यह ख़बर दौड़ी कि सारे मंत्रियों से इस्तीफ़े लेकर नये सिरे से मंत्री मंडल का गठन किया जाएगा। कहीं पर तो ये तक लिख मारा गया 5 लोगों की मंत्री मंडल से छुट्टी होने जा रही है। ख़ैर ये अटकलें थीं, अटकलों का क्या! 13 जुलाई से विधानसभा का 5 दिवसीय मानसून सत्र शुरु होने जा रहा है। ऐसे में लगता तो नहीं कि मानसून सत्र तक मंत्री मंडल में किसी तरह का फेरबदल होगा। वहीं संगठन से सतत् संपर्क में रहने वाले कुछ लोगों का यह ज़रूर मानना है कि मंत्री मंडल में 101 प्रतिशत फेरबदल होगा, लेकिन इसके लिए अभी वक़्त है। संगठन में पैठ रखने वाले यह भी बताते हैं कि वर्तमान में बस्तर से एक ही मंत्री केदार कश्यप हैं। आने वाले समय में बस्तर से एक नहीं दो मंत्री होंगे। आख़िर बस्तर से नक्सलवाद का सफ़ाया हो गया है। वहां अनेकानेक संभावनाओं के व्दार जो खुल चुके हैं। इसलिए बस्तर से तरफ से अब एक मंत्री से काम नहीं चलने वाला, दो मंत्री बनाना पड़ेगा। आगे जो मंत्री मंडल में फेरबदल होना है उसमें किसी काफ़ी मुखर रहने वाली महिला विधायक की भी लाटरी खुल सकती है। दो क़ाबिल महिला विधायक इस समय मंत्री पद की दौड़ में हैं। जहां एक का लंबा राजनीतिक अनुभव है, वहीं दूसरी ने कम समय में ही काफ़ी राजनीतिक ज्ञान अर्जित किया है। देखना होगा आगे चलकर किसकी किस्मत चमकती है।
क्या विधानसभा में महंगी
बिजली व ध्वनि
प्रदूषण पर होगी बात…
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज कह चुके हैं कि बिजली दर में बढ़ोत्तरी व स्मार्ट मीटर में गड़बड़ी जैसा बड़ा मुद्दा छत्तीसगढ़ विधानसभा के 13 जुलाई से शुरु होने जा रहे मानसून सत्र में उठेगा। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत अन्य कांग्रेसी विधायक इस मुद्दे को किसी न किसी रुप में सदन के भीतर उठाएंगे।
दूसरी तरफ प्रदेश भर में व्याप्त ध्वनि प्रदूषण को लेकर हाईकोर्ट चीफ जस्टिस ने इस पर विधानसभा के मानसून सत्र में कानून बनाने के निर्देश दिए हैं। चीफ जस्टिस ने कहा है कि मानसून सत्र आ रहा है। इसमें नया कानून बनवा लें, ताकि वह समय पर लागू हो सके। कोर्ट के इस आदेश के बाद देखना यह होगा कि विधानसभा में यह बेहद गंभीर विषय किस स्वरुप में लाया जा सकता है।
ध्वनि प्रदूषण को लेकर राजधानी रायपुर की नागरिक समिति ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी। पूर्व में इस पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से ध्वनि प्रदूषण को अल्ट्रावायरेस घोषित करने की मांग की गई थी। सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि ऐसी शिकायतों पर लगातार कार्रवाई हो रही है। इस पर याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि कोलाहल अधिनियम कड़े हैं ही नहीं। 500-1000 रुपए पेनाल्टी लगाकर दोषी लोगों को छोड़ दिया जाता है। सामान की ज़ब्ती तक नहीं होती। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी डीजे के साथ लेजर और बीम लाइट से होने वाले शारीरिक नुकसान पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने कहा कि डीजे से हार्ट और लेज़र लाइट से आंखों को खतरा है। इसे रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से पहल ज़रूरी है।
नदियों को बचाने
धरातल पर कब
होगा ठोंस काम
छत्तीसगढ़ शासन के मुख्य सचिव विकासशील ने राज्य की प्रमुख नदियों के पुनरुद्धार एवं पुनर्जीवन संबंधी विषय पर राज्य स्तरीय समिति की बैठक ली। उन्होंने सभी जिलों के कलेक्टरों से कहा कि “हाईकोर्ट की गाइड लाइन के अनुरूप नदियों के पुनर्जीवन कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। कैचमेंट एरिया में ऐसे कार्य किए जाएं जो लंबे समय तक टिकाऊ साबित हो सकें। नदी संरक्षण के कार्यों में सरपंचों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों को सक्रिय रूप से जोड़ा जाए, ताकि नदियों के पुनर्जीवन का असर ज़मीनी स्तर पर स्पष्ट दिखाई दे।“
छत्तीसगढ़ में नदियों पर चिंता बरसों से होती आ रही है। नदियों को बचाए रखने कई-कई स्तर पर सोचा जाता रहा है, लेकिन नतीजे जैसे सामने आने चाहिए वैसे कभी आते नहीं दिखे। डॉ. रमन सिंह का जब दूसरा मुख्यमंत्रित्वकाल था उन्होंने पानी वाले बाबा कहलाने वाले राजेन्द्र सिंह को छत्तीसगढ़ बुलवाया था। राजेन्द्र सिंह भारतीय जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद् हैं। उन्हें भारत का जलपुरुष भी कहा जाता है। उन्होंने 2001 में मैग्सेसे पुरस्कार तथा 2015 में स्टॉकहोम जल पुरस्कार जीता था। राजेन्द्र सिंह ने राजधानी रायपुर की लाइफ लाइन कहलाने वाली खारुन नदी का भ्रमण किया था। भ्रमण के बाद पानी वाले बाबा ने विभिन्न मीडिया संस्थानों के संपादकों से चाय पर चर्चा के दौरान बहुत ही तीखे अंदाज़ में कहा था कि “प्रकृति ने आप लोगों को क्या कुछ नहीं दिया है, लेकिन आप लोग बिगड़ गए हैं।“ राजेन्द्र सिंह की बातों से स्पष्ट था कि खारुन नदी किस क़दर दुर्दशा की शिकार है। डॉ. रमन सिंह के ही मुख्यमंत्रित्वकाल में ही अध्यात्मिक सद्गुरु वासुदेव जग्गी नया रायपुर आए थे। सद्गुरु छत्तीसगढ़ में संभावनाएं तलाशने में लगे थे कि यहां की नदियों के किनारे कैसे वृक्ष लगाने का महाअभियान चलाकर उन्हें संरक्षित किया जा सकता है। यह चर्चा भी केवल टेबल तक सीमित होकर रह गई थी।
बाकी छत्तीसगढ़ में नदियों के किनारे हिस्सों को खोखला करते हुए रेत निकालने के धंधे में इन दिनों जो मार-काट मची हुई है, इन ख़बरों से देश क्या सारी दुनिया हकीक़त से रूबरू हो ही रही है।
पारसी क़ब्रिस्तान को
कब्ज़ाने की तैयारी
किसी कवि ह्दय वाले व्यक्ति ने क्या ख़ूब लिखा है-
“सुनो सुनो ऐ इंसानों
बयान-ए-क़ब्रिस्तान के
मेरे सन्नाटे, इस बीराने में
एक ख़ामोश आवाज़ है”
राजधानी रायपुर के पचपेड़ीनाका के पास स्थित पारसी समुदाय के एकमात्र क़ब्रिस्तान को घेरकर उसे कब्ज़ियाने की तैयारी में कुछ लोग लगे हैं। भला हो पार्षद स्वप्निल मिश्रा का जो क़ब्रिस्तान की ज़मीन हथियाने के काम में आगे बढ़ चुके किसी बिल्डर के सामने दीवार बनकर खड़ी हो गईं। मुम्बई में इस समय है कोई फैमिली जो इस क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर चिंता जताती रहती है। मुम्बई में जा बसी वह फैमिली कभी रायपुर रहा करती थी। उससे इतना कभी नहीं हुआ कि रायपुर आकर क़ब्रिस्तान का हाल देख लेती। केवल मुम्बई बैठे-बैठे बातों का ज़मा ख़र्च जारी है। वास्तव में क़ब्रिस्तान में होने जा रहे अतिक्रमण को रोकने ताकत तो स्वप्निल मिश्रा लगाई हुई हैं। नब्बे के दशक में अलग-अलग समय में 3 दिवंगत पारसियों के शव यहां दफन हुए थे। सन् 2000 के बाद रायपुर में जो गिने-चुने पारसी परिवार थे उन सभी ने दूसरे राज्यों में राह तलाश ली। इस तरह वर्तमान में संभवतः राजधानी रायपुर ही नहीं पूरे छत्तीसगढ़ में एक भी पारसी परिवार स्थायी रुप से निवासरत नहीं है। इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए रायपुर का यह पारसी क़ब्रिस्तान दिलचस्प विषय हो सकता है। इसका इतिहास 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है।
रायपुर नगर निगम में
नारी शक्ति का बोलबाला
पूरे छत्तीसगढ़ में रायपुर नगर निगम एक ऐसा नगर निगम है जहां इस समय नारी शक्ति का ज़बरदस्त बोलबाला है। ऐसा पहली बार देखने में आया है कि महापौर से लेकर मेयर इन कौंसिल व अधिकांश बड़े अधिकारी पदों पर बड़ी संख्या में नारी शक्ति विराजमान हैं। एक नज़र दौड़ा लें- श्रीमती मीनल चौबे महापौर, सरिता दुबे एमआईसी सदस्य, डॉ. अनामिका सिंह एमआईसी सदस्य, गायत्री चंद्राकर एमआईसी सदस्य, संजना हियाल एमआईसी सदस्य, श्वेता विश्वकर्मा जोन अध्यक्ष, साधना साहू जोन अध्यक्ष, कृष्णा खटिक प्रभारी अपर कमिश्नर, डॉ. अंजलि शर्मा डिप्टी कमिश्नर, जागृति साहू डिप्टी कमिश्नर, डॉ. दिव्या चंद्रवंशी जोन कमिश्नर, राजेश्वरी पटेल जोन कमिश्नर, डॉ. तृप्ति पाणीग्राही जोन कमिश्नर, संगीता साहू सचिव।
सफ़ाई कर्मचारियों की
संख्या कागज़ों पर
कुछ, सड़क पर कुछ
जैसा कि बारिश का मौसम सामने है, स्वाभाविक है घनी आबादी वाले रायपुर शहर में आगे कई तरह की परेशानियां खड़ी होनी हैं। कहीं पर नाले का पानी ओवर फ्लो होकर बहने का ख़तरा रहेगा तो किन्हीं बस्तियों में पानी घर के भीतर घुसने की तस्वीरें भी चैनलों तथा अख़बार के पन्नों पर दिखाई देंगी। बरसों से रायपुर शहर ऐसी समस्याओं से दो चार होते रहा है। शायद इसीलिए महापौर श्रीमती मीनल चौबे को चिंताओं ने घेर रखा है। महापौर पिछले दिनों सफ़ाई व्यवस्था देखने निकलीं। कहीं पर सफाई कर्मियों की जितनी निर्धारित संख्या है उससे कम संख्या में काम करते लोग मिले। ऐसे में महापौर का गुस्सा भड़कना ही था। ज़िम्मेदार कहलाने वाले लोगों पर महापौर जमकर बरसीं।
उदाहरण के तौर मान लिया जाए कि हर वार्ड में 25 सफ़ाई कर्मियों के गैंग को काम करना है। हाज़री रजिस्टर में उपस्थित भले ही 25 की दिखा दी जाए पर सड़कों पर काम करने वाले उससे कम ही नज़र आएंगे। रायपुर नगर निगम में यह ढर्रा कोई साल-दो साल से नहीं, बरसों से चले आ रहा है। नगर निगम मुख्यालय का चक्कर लगाते रहने वाले कुछ ठेकेदार कहते हैं कि सफ़ाई कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति, मस्टर रोल और भुगतान की जांच कोई करा ले, दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।
एक बार बड़ा दिलचस्प वाक़या देखने मिला था। छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त एवं आवास पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी तब रायपुर नगर निगम कमिश्नर हुआ करते थे। तब जोरों से यह बात उठी थी सफाई कर्मचारियों की संख्या कागज़ों में कुछ और होती है, सड़कों में कुछ और। एक समय ऐसा भी आया जब चौधरी ने भड़कते हुए कहा कि सारे सफ़ाई कर्मचारियों को शहीद स्मारक परिसर में खड़े करवाकर गिनती करवाओ। तब सफ़ाई का काम जिन लोगों के पास था उनकी हालत पतली हो गई थी। बताते हैं इधर-उधर से जुगाड़ कर कुछ और लोगों को शहीद स्मारक लाया गया था और साबित करने की कोशिश की गई थी कि देखिये संख्या जितनी कागज़ों पर है उतनी ही सड़कों पर।

