कारवां (7 जून 2026) ● ‘द जंगल सागा’ से ‘कृष्णावतारम’ तक… ● ये कैसा रेत उत्खनन कि लाशें बाहर निकल आईं… ● छत्तीसगढ़ में ज़ल्द कोई लेगा नितीन नवीन की जगह… ● उपाध्यक्ष, सदस्य व एल्डरमैन बनने की चाह में गुजर रहे दिन… ● फिर वही एयरोसिटी का आलाप… ● पानी तक के लिए तरसा दिया आरडीए ने… ● प्रयोगधर्मी रायपुर- रास्ते कभी खुलते हैं, कभी बंद होते हैं…

■ अनिरुद्ध दुबे

जब तक बस्तर में नक्सलवाद की जड़ें मज़बूत रहीं वहां के कितने ही गांव ऐसे रहे थे जहां के बच्चों का बाहर की दुनिया से कोई सरोकार नहीं था। मानो वह छोटा सा गांव ही उनका पूरा संसार था। अब नक्सलवाद पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद बस्तर के दूरस्थ गावों के बच्चों का बाहरी दुनिया से साक्षात्कार होने लगा है। पिछले दिनों शासन एवं प्रशासन व्दारा कोयलीबेड़ा विकासखंड के अंदरूनी गांवों से 100 स्कूली बच्चों को बस से कांकेर लाया गया। इनमें से 90 प्रतिशत बच्चे जीवन में पहली बार कांकेर शहर देखे। बच्चों के लिए वह पल यादगार हो गया जब उन्हें कांकेर के सिटी सेंटर मॉल में ‘कृष्णावतारम’ फ़िल्म दिखाई गई। इससे पहले ये बच्चे सिर्फ़ टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर चलचित्र देखे थे। मॉल के विशाल पर्दे पर फ़िल्म देखते हुए बच्चों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

क़रीब 40 वर्षों तक नक्सलवाद के कारण बस्तर की दुर्दशा होती रही। यह वही बस्तर था जहां के बालक चेंदरू को कभी किसी फ़िल्म के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी। शेर और चेंदरू की दोस्ती के किस्से आज भी सुनने को मिलते हैं। इसी पर हॉलीवुड के एक फ़िल्म डायरेक्टर ने बस्तर आकर चेंदरू पर एक फ़िल्म बनाई थी।

कहानी कुछ यूं है कि चेंदरू मंडावी नारायणपुर जिले के गढ़बेंगाल गांव का रहने वाला था। उसके पिता और दादा शिकारी थे। एक दिन जंगल से शिकार के बाद लौटते समय पिता व दादा बांस की एक टोकरी में शेर के बच्चे को ले आए। टोकरी जब खोली गई तो चेंदरू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। चेंदरू व शेर का बच्चा दोस्त हो गए। चेंदरू ने अपने इस दोस्त का नाम टेम्बू रखा था। चेंदरू व टेम्बू जंगलों में घूमते। नदी में मछलियां पकड़ते। चेंदरू और शेर की दोस्ती की यह कथा गांव-गांव फैलने लगी, जो कि विदेश तक पहुंच गई। स्वीडन के जाने-माने फ़िल्म डायरेक्टर आर्ने सुक्सडोर्फ़  को जब इस अनोख़ी कहानी का पता चला तो वे सीधे बस्तर आ पहुंचे। चेंदरू व टेम्बू की दोस्ती को देखकर हैरान रह गए। डायरेक्टर ने इसे कैमरे में क़ैद करने का फ़ैसला किया। 1957 में आर्ने सुक्सडोर्फ़ ने चेंदरू और टेम्बू पर डाक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘द जंगल सागा’ बनाई। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह फ़िल्म ख़ूब सराही गई थी। क़रीब 75 मिनट की मूवी ‘द जंगल सागा’ पूरे यूरोपीय देशों में चर्चा में रही थी और चेंदरू का हॉलीवुड तक में नाम हो गया। ‘द जंगल सागा’ आगे ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी। इस फ़िल्म का संगीत विश्व प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर ने तैयार किया था।

चेंदरू मंडावी ने सन् 2013 में 78 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। राजधानी रायपुर के जंगल सफारी में चेंदरू और टेम्बू की मूर्ति स्थापित की गई है। नारायणपुर में चेंदरू के नाम पर एक पार्क भी है।

ये कैसा रेत उत्खनन

कि लाशें बाहर

निकल आईं…

छत्तीसगढ़ विधानसभा का शायद ही कोई ऐसा सत्र होता हो जब अवैध रेत उत्खनन की चर्चा नहीं होती हो। जुलाई महीने में विधानसभा का मानसून सत्र होगा। स्वाभाविक है उसमें भी कुछ विधायक अवैध रेत उत्खनन की बात ज़ोरों से उठाएंगे। सवाल यह कि सदन में बात तो उठती है लेकिन धरातल पर उसका कितना असर हो पाता है! रेत के धंधेबाज महानदी को खोखला करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे। हद तो तब हो गई जब धमतरी जिले के खरेंगा ग्राम में महानदी में हो रहे अवैध रेत उत्खनन के दौरान 10 इंसानों की लाशें बाहर निकल आईं। यानी रेत कै सौदागरों ने उस जगह पर भी खुदाई कर दी जो लाश दफनाने के लिए सूरक्षित थी। सोशल मीडिया में उन लाशों की तस्वीरें वायरल हुई हैं। रेत के धंधेबाजों का आतंक किस कदर है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रामीण जब इनके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो ये कहते हैं कि ज़्यादा जुबान मत चलाओ नहीं तो तूम्हीं पर गाड़ी चढ़ा देंगे। बात-बात पर गालियां उनके मुंह से झरती हैं। ऊपर से भले सब ठीक-ठाक नज़र आए पर भीतर तो ढोल में पोल है।

छत्तीसगढ़ में ज़ल्द

कोई लेगा

नितीन नवीन की जगह

भाजपा ने पिछले दिनों संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और त्रिपुरा में नए प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी। इसके साथ ही चर्चा का दौर शुरु हो गया है कि छत्तीसगढ़ को ज़ल्द नया भाजपा प्रदेश प्रभारी मिल जाएगा। वैसे तो कहने को वर्तमान में छत्तीसगढ़ का प्रभार भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन नवीन के पास ही है। 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले नितीन नवीन छत्तीसगढ़ के सह प्रभारी थे। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पूर्ण प्रभारी बने। अब जैसा कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं तो किसी न किसी दिग्गज को तो छत्तीसगढ़ का प्रभार देना ही पड़ेगा। सवाल यह कि राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील छत्तीसगढ़ राज्य के लिए प्रभारी चुनने में ऊपर बैठे लोगों को इतना वक़्त क्यों लग रहा है!

उपाध्यक्ष, सदस्य व

एल्डरमैन बनने की

चाह में गुजर रहे दिन

छत्तीसगढ़ सरकार का दिन, महीना साल गुज़रते चला जा रहा है। बचे हुए निगम-मंडलों में पदाधिकारी तथा नगर निगमों व पालिकाओं में एल्डरमैन बनने की आस लिए न जाने कितने भाजपाई बैठे हुए हैं। कितने तो ऐसे भी हैं जिनके मन में नाराज़गी घर कर चुकी है। यह अलग बात है कि अनुशासन के दायरे में रहने के कारण खुलकर कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। साय सरकार के ये ढाई साल कैसे सांय-सांय निकले पता ही नहीं चला। निगम मंडलों की बात करें तो 200 से अधिक राजनीतिक पद अब भी खाली पड़े हैं। अध्यक्ष पद तो कुछ ही खाली हैं लेकिन उपाध्यक्ष व सदस्यों की काफ़ी जगह रिक्त पड़ी हुई है। ज़्यादा दूर क्यों जाएं, रायपुर विकास प्राधिकरण को ही ले लें, जहां दो उपाध्यक्ष एवं पांच संचालक मंडल सदस्य के पद खाली पड़े हैं। वहां सारा बोझ अध्यक्ष नंद कुमार साहू के कंधों पर है। इस भीषण गर्मी में किसी आरडीए कॉलोनी में पानी का संकट हो तो ज़वाब अकेले नंदे साहू को देना पड़ रहा है। नगरीय निकायों की बात करें तो हाल ही में उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने संकेत दिया है कि निकायों में एल्डरमैनों की नियुक्ति ज़ल्द होगी।

फिर वही एयरोसिटी

का आलाप…

फिर यह सुनने में आ रहा है कि राजधानी रायपुर के माना एयरपोर्ट के आसपास एयरोसिटी बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। नवा रायपुर विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) ने बरौंदा और रमचंडी की क़रीब 217 एकड़ जमीन पर निर्माण कार्य का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। सुनने यही आ रहा है कि सितारा होटल, कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स, क्लब हाउस के अलावा और बहुत कुछ भी एयरोसिटी का हिस्सा होंगे। एयरोसिटी की प्लानिंग पिछली भूपेश बघेल सरकार के समय में ही तैयार हो गई थी। यही नहीं मुर्दा शहर नया रायपुर एवं पुराना रायपुर के बीच की खाई को पाटने पिछली सरकार ने सेरीखेड़ी से नये निर्माण कार्य शुरु करने का भी फ़ैसला किया था। सरकार बदली तो पुरानी बहुत सी चीजें पीछे होती चली गईं। जैसा कि सरकार का एयरोसिटी बनाने की तरफ फिर कदम बढ़ा है, हो सकता है आने वाले 5-7 सालों में नया रायपुर से लगकर कई नई तस्वीरें देखने को मिले।

पानी तक के लिए तरसा

दिया आरडीए ने…

जून का महीना लग गया, पर राजधानी रायपुर के कुछ स्थानों पर पानी को लेकर अब भी हाहाकार मचा हुआ है। नगर निगम ने जगह-जगह टैंकर चलवाकर अपनी इज़्ज़त बचा ली, लेकिन पिछले दिनों कमल विहार सेक्टर 4 के लोगों ने रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) का धुर्रा उड़ाकर रख दिया। सेक्टर- 4 के लोगों को लगातार चार दिनों तक पानी नहीं मिल पाया। वहां आरडीए ने जो 4 मोटर पंप लगा रखे थे वो सब ख़राब पड़े थे। त्रस्त लोगों ने आरडीए दफ़्तर को घेर दिया। जब आरडीए के एडिशनल सीईओ व इंजीनियर समस्या को देखने मौके पर पहुंचे तो उन्हें क्या पता था बड़ी मुसीबत आने वाली है। गुस्साए लोगों ने उनकी कार को घेर लिया। मामला इस कदर बिगड़ा कि पुलिस बुलानी पड़ी। बाद में आरडीए अध्यक्ष नंदकुमार साहू भी वहां पहुंचे। आक्रोशित लोगों ने उनका भी घेराव कर दिया। ले देकर वहां पानी की समस्या दूर हुई।

हज़ार एकड़ से ऊपर ज़मीन पर जब आरडीए कमल विहार का प्रोजेक्ट लाया था तो आम जनता को नई टाउनशिप के नाम पर बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे। शुरुआती दौर में आरडीए यह तक प्रचारित करने से पीछे नहीं रहा था कि विदेशों में रह रहे लोग तक कमल विहार में मकान-प्लॉट पर इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं। आरडीए का तो पुराने रायपुर से नये रायपुर तक क्रमवार कमल विहार बनाते चले जाने का सपना था जो कि अधूरा रह गया। अभी जो एक कमल विहार है वही सम्हल जाए बहुत है।

प्रयोगधर्मी रायपुर-

रास्ते कभी खुलते

हैं, कभी बंद होते हैं

राजधानी रायपुर में पंडरी सिटी सेंटर मॉल के सामने से एक्सप्रेस-वे का रास्ता जो खोल दिया गया था उसे अंततः बंद किया गया। बताते हैं रायपुर के ही एक विधायक के पत्र पर उस जोखिम वाले रास्ते को खोल दिया गया था। रास्ता खोलने से पहले ट्रैफिक सर्वे तक नहीं कराया गया। अफ़सरों ने यह कहते हुए अपना बचाव किया कि देवेन्द्र नगर से पंडरी के बीच अक्सर जाम की स्थिति रहती है, इसलिए आम जनता की सुविधा के लिए रास्ते को खोलना ज़रूरी लगा। डॉ. रमन सिंह की सरकार के समय जब 12 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस वे बना तो प्रावधान यही रखा गया था कि मुख्य चौराहों या तिराहों को छोड़कर रायपुर रेल्वे स्टेशन से केन्द्री तक किसी को अलग से रास्ता नहीं दिया जाएगा। यहां भला किसको किसकी परवाह। 12 किलोमीटर की इस सड़क पर भ्रमण कर लें, पता लग जाएगा कहां-किस जगह पर शार्ट कट रास्ता बना लिया गया है।

रायपुर शहर वैसे भी प्रयोगधर्मी शहर रहा है। दूर क्यों जाएं, बूढ़ातालाब के किनारे के परिक्रमा पथ को ही देख लें, जिसे पिछले मेयर ने अपने कार्यकाल में यह कहते हुए बंद करवा दिया था कि इस रास्ते की कोई ज़रूरत नहीं। जबकि ज़रूरत हमेशा रही थी। जब सत्ता परिवर्तन हुआ तब कहीं जाकर बूढ़ातालाब के किनारे की तस्वीर बदली। पूर्व में मेयर साहब ने परिक्रमा पथ को बंद करवाने का प्रयोग किया था, इस बार विधायक जी ने एक्सप्रेस वे वाले रास्ते में नया कट देने का प्रयोग करवा डाला। विरोध तो परिक्रमा पथ को बंद करवाने का भी हुआ था, लेकिन उस समय विरोध करने वालों की आवाज़ दबा दी गई थी। एक्सप्रेस वे वाले मामले में फिलहाल आवाज़ नहीं दबाई जा सकी और रास्ता बंद हो गया। वैसे रायपुर शहर में एक और ऐतिहासिक प्रयोग जारी है, स्काई वॉक के निर्माण का। स्काई वॉक ज़रूरी है या गैर ज़रूरी यह आने वाला समय तय करेगा।

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