कारवां (12 जुलाई 2026) ● कोनोकार्पस पर तो प्रतिबंध लग गया, ‘छातिम’ पर कब लगेगा… ● निपटाने में माहिर खजांची जी… ● 55 पार होने के साथ फ़ितरत बदली… ● जूस का धंधा ऐसा फला कि सट्टा किंग बन गए… ● नक्सली हिंसा मामले में जो पहले से जेल में हैं उनका क्या… ● भाई साहब की अदालत में जाएंगे भाजपा पार्षद…

■ अनिरुद्ध दुबे

ऊपर से हरे-भरे नज़र आने वाले लेकिन बेहद ख़तरनाक कोनोकार्पस पौधे अब छत्तीसगढ़ में नहीं लगाए जा सकेंगे। राज्य सरकार ने इस विदेशी प्रजाति को पर्यावरण, भूजल और जैव विविधता के लिए बड़ा ख़तरा मानते हुए इसके पौधारोपण पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश सभी सरकारी विभागों, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी संस्थाओं के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए जारी किया गया है। सरकार ने यह डिसीजन केंद्रीय सशक्त समिति की 21 अगस्त 2025 की रिपोर्ट के आधार पर लिया। तेलंगाना और गुजरात में यह वर्ष 2023 से प्रतिबंधित है। कोनोकार्पस का पौधा बेहद तेजी से बढ़ता है। तीन-चार साल में इसकी लंबाई 20 फीट तक जा पहुंचती है। यह आसपास दूसरे पौधों को पनपते नहीं देता। कोनोकार्पस न फूल देता है, न फल। इसकी गंध ऐसी होती कि पक्षी भी इस पर घोंसला नहीं बनाते। इससे फैलने वाली हवा सांस रोग, सर्दी-खांसी, त्वचा में एलर्जी जैसी बीमारियों को जन्म दे सकती है। दमा के मरीजों के लिए तो यह बेहद ख़तरनाक है। यह पौधा ज़मीन के भीतर बहुत अधिक पानी सोखता है। इसकी जड़ें ऐसे ख़तरनाक तरीके से फैलती हैं कि पाइप लाइनों व सीवरेज सिस्टम तक को नुकसान पहुंचा देती हैं। बड़ा सवाल यह कि कोनोकार्पस पर तो प्रतिबंध लग गया, एक अन्य ख़तरनाक  ‘छातिम’ पर कब लगेगा।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के इसी साल के बजट सत्र में प्रश्नकाल में भाजपा विधायक सुनील सोनी ने छातिम (सप्तपर्णी) वृक्ष को सेहत के लिए बेहद खतरनाक बताते हुए इसके पौधारोपण पर रोक लगाने के साथ जगह-जगह नीम व पीपल पेड़ लगाने की मांग उठाई थी। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एवं भाजपा विधायक धर्मजीत सिंह ने भी स्वास्थ्य के लिए घातक पेड़ों पर चिंता जताते हुए तत्काल कदम उठाने की ज़रूरत बताई थी। सुनील सोनी ने सदन में कहा था कि “जगह-जगह बड़ी संख्या में छातिम के पेड़ लगे हुए हैं, जिससे लोगों को अस्थमा व सांस की अन्य बीमारियां हो रही हैं। वैज्ञानिक रिसर्च में सामने आ चुका है कि छातिम का पेड़ हानिकारक है। मध्यप्रदेश, केरल, तेलंगाना एवं आंध्रप्रदेश में छातिम पर रोक लगा दी गई है। मध्यप्रदेश सरकार ने छातिम को हटाने 9 जनवरी 2026 को बकायदा आदेश जारी किया है।“ सोनी की इस बात पर सदन में पर्यावरण मंत्री ओ.पी.चौधरी ने कहा था कि “कोनोकार्पस का विषय जरूर आया था। कोनोकार्पस पर रिसर्च प्रकाशित हुआ है। छातिम का विषय अभी आया है। भविष्य में छातिम पर प्रतिबंध लगवा ही देंगे।“

निपटाने में माहिर

खजांची जी…

एक बड़े बिजनेसमैन एवं नेता इन दिनों एक जांच एजेन्सी की गिरफ़्त में हैं। ज़बरदस्त व्यावसायिक बुद्धि वाले ये शख़्स अविभाजित मध्यप्रदेश के समय के एक पूर्व मुख्यमंत्री के काफ़ी क़रीब हो गए थे। व्यावसायिक के साथ राजनीतिक क़ाबिलियत को देखते हुए इन्हें पार्टी का छत्तीसगढ़ प्रदेश स्तर का खजांची का पद मिल गया। ये अपनी मस्ती में जीने वाले नेता रहे हैं। खजांची पद पर रहते हुए इन्होंने एक व्यक्ति विशेष नेता को छोड़कर पार्टी के अन्य बड़े नेताओं की कभी परवाह नहीं की। खजांची जी ने हिसाब किताब में परफेक्ट रहते हुए बहुत ही कम समय में राजधानी रायपुर में पार्टी कार्यालय भवन का निर्माण पूरा करा दिया। फिर एकाएक इनके मन में विधानसभा चुनाव लड़ने की धुन सवार हो गई। 2018 के चुनाव में ये अपनी पार्टी से टिकट के प्रबल दावेदार थे। ऐन वक़्त में कुछ ऐसा समीकरण बैठा कि खजांची जी कि टिकट कोई और ले उड़ा। बस इसके बाद फिर क्या था, खजांची जी ने कसम खा ली सामने वाले को निपटाकर ही दम लेंगे। चुनावी मैदान में उतरे एक निर्दलीय उम्मीदवार को खजांची जी ने मन और धन से पूरा सपोर्ट किया। हुआ वही जो खजांची जी चाहते थे। उनकी टिकट ले उड़ने वाला उम्मीदवार हार गया। वो भी ऐसे अवसर पर जब 65 से भी ज़्यादा सीटों पर जीत के साथ पार्टी की सरकार बनी थी। वह दौर ऐसा था कि उस समय की सरकार के खिलाफ़ ज़बरदस्त एंटी इंकमबेंसी थी और जहां देखो वहां पंजे उठे हुए थे, लेकिन अपनी-अपनी किस्मत है। खजांची जी को उन अनुकूल परिस्थितियों का लाभ नहीं मिल पाया था।

55 पार होने के

साथ फ़ितरत बदली

चना जोर गरम स्टैंडर्ड की एक चलताऊ कहावत है- “उमर पचपन की दिल बचपन का।“ यहां पर जिस शख़्सियत की बात करने जा रहे हैं उनसे उस चलचाऊ कहावत को जोड़कर न देखा जाए। कभी एमएलए से लेकर सीएम स्तर तक की पसंद रहे एक आला अफ़सर 55 पार होने के बाद अब कुछ ज़्यादा ही धार्मिक एवं पारिवारिक हो गए हैं। कभी वे फ़िल्म अभिनेता अक्षय कुमार की तरह रोमांटिक छवि के लिए जाने जाते थे। मित्रगण रोमांटिक छवि को लेकर उनकी यह कहते हुए तारीफ़ किया करते थे कि जब रोमांस ही न हो तो फिर जीवन में काहे का रंग! कोई ‘सुंदरता’ परफ्यूम की ख़ुशबू बिखेरते हुए साहब के केबिन में चली जाती तो समां बंध जाता था। इस सबके बाद भी साहब के जीवन में अनुशासन था। उन्होंने दिल को सुकून पहुंचाने वाली बातों तक ही अपनी सीमा तय कर रखी थी। इससे ज़्यादा कभी आगे नहीं बढ़े। यही तो साहब की स्मार्टनेस रही है।

जूस का धंधा ऐसा फला

कि सट्टा किंग बन गए

राजधानी रायपुर के सिविल लाइन वाले काफी हाउस में चिंतन मनन में डूबे रहने वाला एक शख़्स जो राजनीति से जुड़ा हुआ है का मानना है कि ये जूस का धंधा ऐसा है जिसे फल जाए बुलंदियों पर पहुंचा देता है। वह इस बात को कुछ इस तरह समझाता है- “टी. सीरिज वाले वो गुलशन कुमार जी थे न, जो फ़िल्म प्रोड्यूसर भी थे, दिल्ली में पहले जूस दुकान चलाते थे। समय ने कुछ ऐसा पलटा मारा कि दिल्ली से मुम्बई पहुंच गए और बहुत बड़े कैसेट किंग बन गए। अंडरवर्ल्ड ने भक्ति भाव में डूबे रहने वाले इस लोकप्रिय इंसान को मरवा दिया।“ इसके बाद काफी हाउस प्रेमी छत्तीसगढ़ के दो बड़े उदाहरण देता है। पहला उदाहरण वह महादेव सट्टा एप की नींव रखने वाले सौरभ चंद्राकर का देता है जो कि कभी भिलाई में जूस दुकान चलाता था। दुबई मे बैठकर सट्टे का क़ारोबार संचालित करते रहा सौरभ चंद्राकर पिछले दिनों दूसरे देश ओमान में गिरफ़्तार हो गया। प्रत्यर्पण संधि के तहत सौरभ को ओमान से भारत लाने की तैयारी चल रही है। फिर एक और सट्टा किंग उदाहरण के रूप में सामने है जिसके नाम से ही राजधानी रायपुर में जूस बार था। सौरभ की तरह रायपुर के इस सट्टा किंग के तार भी दुबई से जुड़े रहने की बात सुनने में आती रही है। काफी हाउस प्रेमी कुछ और ऐसे नामों को याद करने की कोशिश में लगा हुआ है जो जूस का धंधा करते-करते फ़र्श से अर्श पर जा पहुंचे।

नक्सली हिंसा मामले

में जो पहले से जेल

में हैं उनका क्या…

केन्द्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सली हिंसा को मिटा देने का जो लक्ष्य रखा था वह पूरा हुआ। इसमें कोई दो मत  नहीं कि केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की यह ऐतिहासिक उपलब्धि रही। पूर्व मुख्यमंत्री एवं विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने खुले मंच से कहा भी कि 31 मार्च 2026 के लक्ष्य वाली बात जब सामने आई तो मेरे मन में सवाल उठा करता था कि ऐसा कैसे संभव हो पाएगा, लेकिन संभव हुआ। ख़ुद रमन सिंह अपने 3 बार के मुख्यमंत्रित्वकाल में नक्सलवाद के समाधान के लिए अलग-अलग रास्ते तलाशने की कोशिश में लगे रहे थे। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की नीति बनाई गई। बड़े नक्सली लीडर जब आत्मसमर्पण करने पहुंचे तो रेड कार्पेट बिछवाकर मंत्रियों एवं आला पुलिस अफ़सरों ने उनका स्वागत किया था।

बहरहाल बस्तर में अब नक्सली हिंसा का नामोनिशान नहीं रहा, लेकिन साथ ही एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि नक्सलवाद के नाम पर बरसों से जेलों में जो ग्रामीण आदिवासी बंद हैं उनका क्या होगा? अब उनकी रिहाई की मांग जोर पकड़ने लगी है। नक्सली हिंसा के आरोप में जेलों में बंद ग्रामीणों के परिजनों ने हाल ही में कभी नक्सलवाद से  प्रभावित रहे बीजापुर क्षेत्र के कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी से मुलाक़ात की और गुहार लगाई कि अब आप ही कुछ करें। परिजनों ने मुख्यमंत्री के नाम वाला ज्ञापन कलेक्टर को सौंपते हुए मामलों की निष्पक्ष समीक्षा कर बंद लोगों की शीघ्र रिहाई की मांग की है। विधायक विक्रम मंडावी कहते हैं कि “बहुत से परिवारों का आरोप है कि उनके परिजन कई सालों से नक्सली हिंसा के आरोप में जेलों में बंद हैं, जबकि वे निर्दोष हैं। अब नक्सली हिंसा का दौर थम जाने के बाद ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कर न्याय दिलाने की ज़रूरत है।“ परिजनों ने 20 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल का गठन किया है, जो शीघ्र ही मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृह मंत्री विजय शर्मा एवं विधानसभा नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत से मुलाक़ात कर अपनी बात रखेगा।

भाई साहब की अदालत

में जाएंगे भाजपा पार्षद

लगता है रायपुर नगर निगम में जो आग सुलगी हुई है उसे हवा देने की कोशिशें तेज हो गई हैं। हाल ही में क़रीब दो दर्जन पार्षदों ने निगम से दूर किसी स्थान पर गोपनीय बैठक की। बताते हैं पार्षदों ने मिलकर तय किया है कि संगठन तक जाएंगे और भाई साहब के सामने अपनी बातों को रखेंगे। पार्षद किन बातों को रखने जा रहे हैं ये खोज का विषय है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *