■ अनिरुद्ध दुबे
इसी दिसम्बर महीने में साय सरकार के कार्यकाल के 3 साल पूरे हो जाएंगे। दिवाली का त्यौहार मनते ही भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव की हल्की-फुल्की तैयारियां शुरु हो जाएंगी। अभी से राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के मन में प्रश्न उभरा हुआ है कि यदि भाजपा को फिर से सरकार बनाना है तो अन्य मददगार पार्टी कौन होगी? अभी की स्थिति में उत्तर है शायद कोई नहीं! छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से इतिहास उठाकर देख लें। 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से अलग होने के बाद विद्याचरण शुक्ल ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का छत्तीसगढ़ प्रमुख बनते हुए अपने राकांपा उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था। 2003 के चुनाव में राकांपा के एक ही प्रत्याशी नोबेल वर्मा चंद्रपुर से चुनाव जीत पाए थे लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राकांपा को 7 प्रतिशत वोट मिला था। जो वोट कांग्रेस व राकांपा के बंट गए, उससे भाजपा की सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ था। फिर 2008 एवं 2013 में भी भाजपा की सरकार बनी। इन दोनों ही चुनाव में भाजपा के लिए कोई अदृश्य़ शक्ति मददगार साबित हुई थी। इसके अलावा बस्तर क्षेत्र में जहां कुछ सीटों पर कांग्रेस व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बीच वोट बंट जाने का भाजपा को फ़ायदा मिलते रहा था, वहीं मध्य छत्तीसगढ़ में बहुजन समाज पार्टी व बिलासपुर तथा सरगुजा संभाग में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का अपना असर था। ये तो बात रही 2008 व 2013 के चुनाव की, वहीं 2023 के चुनाव में जहां छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस यानी जोगी कांग्रेस ने कई सीटों पर कांग्रेस को डेमेज किया था वहीं बिलासपुर व सरगुजा तरफ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की मौजूदगी कहीं न कहीं कांग्रेस के लिए नुकसानदेह ही रही थी, जिसका सीधा फ़ायदा भाजपा को मिला था। अभी की बात करें तो जोगी कांग्रेस में सन्नाटा है, बसपा की तरफ भी कोई हलचल नहीं है। बस्तर की बात करें तो वहां अब पहले जैसा कम्युनिस्ट पार्टी का असर रहा नहीं और जिन लोगों पर वामपंथी विचारधारा का असर रहा है तो उनका वोट भाजपा को मिलने से रहा। जहां तक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की बात है तो उसका थोड़ा बहुत वज़न अभी बना हुआ है।
कहां बचा कोई
दमदार नेता…
राजधानी रायपुर के किसी कॉफी हाउस के कोने में आए दिन बैठक करने वाले कुछ गुज़रे ज़माने के नेता अपने पुराने दिनों को याद कर लेते हैं। एक दिन विषय कुछ ऐसा निकल आया कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ में ऐसा कौन नेता है जिसके फोन करने पर देश के किसी भी कोने में किसी का कोई बड़ा काम हो जाए! काफ़ी देर बातचीत चलती रही। बातचीत का नतीजा निकला अभी की स्थिति में कोई नहीं! फिर जो कुछ बातें होती रहीं वो सिर्फ़ इतिहास था। पहले छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ल, दिलीप सिंह जूदेव, मोतीलाल वोरा, सत्यनारायण शर्मा एवं बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेता रहे, जिनके देश भर में तगड़े लिंक हुआ करते थे। किसी व्यक्ति विशेष का किसी दूसरे स्टेट में काम रुका हुआ हो तो इन नेताओं के फोन से काम हो जाने की संभावना बनी रहती थी। विद्याचरण शुक्ल, दिलीप सिंह जूदेव एवं मोतीलाल वोरा तो रहे नहीं, लेकिन बृजमोहन अग्रवाल एवं सत्यनारायण शर्मा अब भी राजनीति में सक्रिय हैं। काफ़ी हाउस के कोने में जब गुज़रे हुए कल के नेताओं की बैठक समाप्ति पर थी तो चलते-चलते एक नेता का कमेंट्स रहा कि “देश भर में पकड़ रखने वाले हमारे छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को तो वक़्त ने अपने पास बुला लिया और इक्का-दुक्का दमदार नेता जो बचे भी रहे उन्हें उन्हीं की पार्टी ने ख़त्म कर दिया। समझे लें कि इशारा किनकी तरफ़ है।“
अर्बन चैलेंज फंड
पर पोल खोल
नया रायपुर में हाल ही में अर्बन चैलेंज फंड एवं अर्बन इन्वेस्ट विंडो पर हुई कार्यशाला प्रदेश की तस्वीर बदलने में कितनी सहायक होगी इसका पता तो आने वाले समय में चलेगा, लेकिन वर्तमान में स्थिति क्या है इसकी मानो आयोजन के मंच पर ही पोल खुलती चली गई! और पोल भी कोई ऐसे-वैसे नहीं, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय व उप मुख्यमंत्री अरुण साव खोलते नज़र आए! इस सरकार के कार्यकाल का 3 साल पूरा होने आ रहा है, कार्यशाला के मंच से किसी की पीठ थपथपाकर उसकी शान में कुछ बोला जा सके ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि “सीवरेज सिस्टम कैसे ठीक हो पर सोचना ज़रूरी है। बरसात में शहरी क्षेत्रों में आलम यह रहता है कि घरों में पानी घुस जाता है। गाड़ी के बजाय नाव चलाने की नौबत आ जाती है। बिजली के तारों का भी बुरा हाल है। कोई रैली निकलती है तो एक आदमी तारों को ऊपर चढ़ाए रखने के ही काम में लगे रहता है।“
मुख्यमंत्री के बाद उप मुख्यमंत्री अरुण साव जो नगरीय प्रशासन विभाग के भारसाधक मंत्री हैं ने जो कुछ कहा मानो वह सोए हुए लोगों को जगाने जैसा था। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि “कल तक कार्यालयों में टाइपराइटर व कॉर्बन पेपर का उपयोग हुआ करता था। आज ऐसा कौन सा कार्यालय है जहां इनका उपयोग होते दिखता है। अब कम्प्यूटर व एआई का युग है। सोच को बदलना पड़ेगा। विज़न बदलना पड़ेगा। बने बनाए रास्ते पर चलने से काम नहीं चलेगा। नगर निगम कमिश्नर व नगर पालिका के सीईओ ज़रा सोचें जिस शहर में आप बैठे हैं उसे क्या दे सकते हैं। दुनिया में क्या चल रहा है उसका अनुसरण करते हुए काम करें। हम इंदौर की स्व्च्छता की बात करते हैं, तेलंगाना कितने आगे चले गया कि बात करते रहते हैं, क्यों अपने शहर की बात नहीं कर सकते। क्यों अपने शहर को आदर्श नहीं बना सकते! बड़ी-बड़ी अधोसंरचना की योजना तो बना लेते हैं, बनने के बाद वह कैसे संचालित होगी, कैसे मैंटेन होगी क्या इस पर सोचा भी जाता है! मैंने ऐसे शहर देखे हैं जहां झाड़ू भी नहीं लगता। ज़रा सोचकर काम करें कि बस स्टैंड बने तो उसका स्वरुप कैसा हो, शापिंग कॉम्पलेक्स बनें तो वहां पार्किंग की व्यवस्था कैसी रहे।“
जबलपुर व हैदराबाद
से भी अब सीख लें…
छत्तीसगढ़ की नगर निगमों के सामने उदाहरण पेश करते हुए कहा जाता रहा था कि चंडीगढ़, इंदौर एवं नागपुर नगर निगम से कुछ सीखें। अब इसमें दो और हैदराबाद व जबलपुर नगर निगम जुड़ गए हैं। हैदराबाद व जबलपुर नगर निगम की मिसाल किसी छोटे-मोटे जन प्रतिनिधि या अफ़सर की तरफ से नहीं दी गई, बल्कि केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू की ओर से अर्बन चैलेंज फंड एवं अर्बन इन्वेस्ट विंडो पर हुई कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में दी गई। तोखन साहू ने यह कहते हुए आइना दिखाने की कोशिश की कि “हैदराबाद नगर निगम से सीखें कि कैसे वहां 32 करोड़ लीटर दूषित पानी को स्वच्छ पानी में तब्दील किया जाता है। इसी तरह जबलपुर नगर निगम व्दारा कैसे कुड़ा-करकट के पहाड़ से बिजली पैदा की जा रही है।“
धारणा तो 14 नगर
निगमों को देखकर
ही बनेगी…
अर्बन चैलेंज फंड एवं अर्बन इन्वेस्ट विंडो पर हुई कार्यशाला में उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने मंच पर अपनी बात समाप्त करते समय प्रदेश की 14 नगर निगमों को टारगेट करते हुए जो कुछ कहा वह मानो अपने आप में बड़ा कटाक्ष था। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि “14 नगर निगमों को देखकर ही धारणा बनेगी की राज्य कैसा है। तय करें कि कल से नये विज़न के साथ काम करेंगे। बाहर का कोई आदमी आपके शहर में आए तो देखकर कह पड़े कि छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया।“
पार्टी कार्यालय
जिस पर निर्भर
राजधानी रायपुर में एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के जिला संगठन में एक ऐसा शख़्स लंबे समय से चर्चा में बना हुआ है जिसके बिना जिले की शीर्ष पद बैठे हुए लोगों का काम नहीं चलता। बताते हैं यह आर्थिक प्रबंधन का मास्टर पीस है। कभी इसने लाल बत्ती के लिए अपना नाम चलाया था। किसी ‘राजीव नयन’ ने इस हीरे को तलाशा था। उनके बाद आए ‘श्री श्री’ के समय में भी इस शख़्स की हैसियत बरक़रार रही। उसके बाद दो और बड़े चेहरे आए वो भी इस शख़्स के बिना आगे बढ़ते नहीं दिखे। जिला कार्यालय में इस शख़्स की आवाज़ ने तो मानो ‘भंवरे की गूंजन’ को भी पीछे छोड़ दिया है।

