● कारवां (3 जुलाई 2022)- फूट पड़ा सीएम का गुस्सा

■ अनिरुद्ध दुबे

हाल ही में हुई प्रदेश कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जमकर भड़के। संगठन चुनाव को लेकर बीआरओ तय हो जाने के बावजूद अब तक सूची घोषित नहीं होने की बात पर उन्होंने जमकर गुस्सा उतारा। मुख्यमंत्री ने बैठक में सवाल उठाया कि यह कौन सा तरीका है कि बंद कमरे में ब्लॉक अध्यक्ष तय हो जाएं? बंद कमरे में बुला-बुलाकर साइन लिया जाना आख़िर क्या दर्शाता है? मुख्यमंत्री ने बंद कमरे में साइन लिए जाने की जो बात कही उसका सीधा संबंध राजीव भवन के एक कक्ष से जोड़कर देखा जा रहा है। यह कक्ष एक बड़े खिलाड़ी के हवाले हो चुका है। अंदर की ख़बर रखने वाले यही बताते हैं खिलाड़ी नेता ने पहले चुन-चुनकर कुछ को फोन पर बधाई दी फिर उन्हें अपने कक्ष में बुलाया। बात ही बात में लगाए रखते हुए एक-एक करके उनसे कागज़ पर दस्तख़त करवाए। करने वालों ने भी सामान्य कागज़ मानते हुए उस पर दस्तख़त कर दिए। वह तो बाद में पता चला कि बड़ा खेल हो चुका है। किस ब्लॉक में किसे बैठाना है यह पहले ही तय हो चुका है। किसी रास्ते यह बात मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंच गई। बस फिर क्या था बैठक में उनका गुस्सा फूट पड़ा। इससे पहले भी एक बार प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यमंत्री जमकर भड़के थे। तब उनकी नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि उन तक प्रदेश स्तरीय बैठक के आयोजन की सूचना नहीं पहुंचाई जाती।

मुख्यमंत्री का छत्तीसगढ़ी

के बाद अब अंग्रेजी प्रेम

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का जिलेवार भ्रमण जारी है। एक वीडियो सामने आया है, जिसमें मुख्यमंत्री स्वामी आत्मानंद स्कूल के बच्चों के बीच नज़र आ रहे हैं। वे एक छात्रा से कहते नज़र आ रहे हैं मेरे सवाल छत्तीसगढ़ी में होंगे, ज़वाब अंग्रेजी में दीजिए। मुख्यमंत्री के हर सवालों का ज़वाब छात्रा पूरी कुशलता के साथ अंग्रेजी में देती नज़र आ रही है। इसके अलावा मनेन्द्रगढ़ में समीक्षा बैठक के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अंग्रेजी पर जोर दिया। मुख्यमंत्री वहां भेंट मुलाक़ात कार्यक्रम में पहुंचे हुए थे। वहां उन्होंने कहा कि स्कूल में शिक्षक आपस में और बच्चों से अंग्रेजी में बात करें। इससे साफ हो जाता है कि मुख्यमंत्री का छत्तीसगढ़ी के बाद अब अंग्रेजी पर भी जोर है। मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ को छत्तीसगढ़ी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में समृध्द करने पर ताकत लगा दी है।

चर्चा में आईएएस

की तबादला लिस्ट

पांच दिन पहले छत्तीसगढ़ शासन की ओर से 37 आईएएस अफ़सरों का तबादला आदेश निकला। इनमें 19 जिलों के कलेक्टर प्रभावित हुए। तबादला आदेश जब सामने आया तो सबसे ज्यादा चर्चा सौरभ कुमार, भूरे सर्वेश्वर नरेन्द्र, रजत बंसल एवं प्रियंका शुक्ला जैसे नामों को लेकर रही। पूर्व में चर्चा यही रही थी कि रायपुर कलेक्टर सौरभ कुमार जाएंगे तो उनकी जगह बस्तर कलेक्टर रजत बंसल लेंगे। जब तबादला लिस्ट आई तो वह चौंकाने वाली ही रही। सौरभ कुमार को जहां उनकी गरिमा के अनुरुप न्यायाधानी बिलासपुर कलेक्टर बनाकर भेजा गया, वहीं दुर्ग कलेक्टर भूरे सर्वेश्वर को रायपुर लाया गया। चर्चा तो यही है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का पाटन विधानसभा क्षेत्र दुर्ग जिले का हिस्सा है। मुख्यमंत्री भूरे सर्वेश्वर की कार्य शैली से भली भांति अवगत रहे हैं। इसके अलावा कोरोना काल में सौरभ कुमार ने पहले रायपुर नगर निगम कमिश्नर एवं बाद में कलेक्टर के रूप में जिस तरह डटकर चुनौतियों का मुक़ाबला किया था वैसे ही भूरे सर्वेश्वर ने दुर्ग में इस महामारी से निपटने में अपना बेहतरीन रोल अदा किया। भूरे के बारे में यह भी माना जाता है कि वह काफी धैर्य व संयम के साथ निर्णय लेते हैं। यही वज़ह है कि जन प्रतिनिधियों के साथ उनका बेहतर तालमेल बैठ पाता है। जहां तक रजत बंसल की बात है तो उन्होंने सन् 2017-18 में रायपुर नगर निगम कमिश्नर पद पर रहते हुए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को तीव्र गति प्रदान की थी। नगर निगम के कामकाज में वे जमकर कसावट लाए थे। तब से वे कांग्रेस एवं भाजपा दोनों ही पार्टियों के बड़े लीडरों की निगाहों में चढ़े हुए थे। राजनीति से जुड़े कुछ अहम् लोग चाह रहे थे कि  कलेक्टर के रूप में राजधानी रायपुर को रजत बंसल की कार्यकुशलता का फायदा मिले, पर उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल भाटापारा-बलौदाबाजार जिले में होना तय कर दिया गया। राजनीतिक व प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़े तथाकथित कुछ ऐसे विद्वान लोग हैं जो कि जब भी कोई बड़ी तबादला लिस्ट सामने आए मजे लेने से पीछे नहीं रहते। एक दो जिलों में जो पोस्टिंग हुई उसकी व्याख्या इन विद्वानों ने कलेक्शन से जोड़कर की। इनका कहना है कि अंग्रेजी हुकूमत के समय से बड़े पदों पर बैठने वालों को रेवेन्यू जनरेट करने की ज़िम्मेदारी देने की परंपरा चली आ रही है। ब्रिटिश राज ही क्यों और पीछे जाएं तो यह सब काम टोडरमल के ज़माने से होता चला आ रहा है। टोडरमल शहंशाह अक़बर के दरबार के नौ रत्नों में से एक रत्न थे। इसीलिए कुछ ख़ास जिलों में सोच समझकर क़ाबिल लोग बिठाए गए हैं।

आखिर क्यों कोई टिक नहीं पा

रहा आर.डी.ए. सीईओ पद पर

रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) में पिछले 2 साल में जो हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ। किसी सरकारी इकाई में 2 साल में 4 मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) बदल जाएं तो इसे क्या कहियेगा! भूपेश सरकार के आने के बाद 2020 में आरडीए अध्यक्ष पद की कुर्सी पर सुभाष धुप्पड़ बिठाए गए। इनके बाद उपाध्यक्ष पद पर सूर्यमणि मिश्रा एवं शिव सिंह ठाकुर की नियुक्तियां हुईं। इन पदाधिकारियों की नियुक्ति के समय सीईओ अय्याज़ तंबोली थे। जानकार लोग बताते हैं बेहद आर्थिक संकट से गुजर रहे आरडीए को तंबोली ने काफ़ी हद तक संभाल लिया था। तंबोली आरडीए की बारीक़ नब्ज़ को समझ गए थे। थोड़े और समय तक वे वहां टिके रहे होते तो बिगड़े हालात और काफ़ी हद तक संभल सकते थे। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि तंबोली की जगह पर ऋतुराज रघुवंशी बिठा दिए गए। आरडीए का चार्ज लेने के कुछ ही दिनों बाद रघुवंशी लंबी छुट्टी पर चले गए थे। छुट्टी से लौटे भी तो नियमित रूप से उनका दफ़्तर आना नहीं हो पाता था। फिर रघुवंशी को नारायणपुर का कलेक्टर बनाकर भेजा गया और उनकी जगह पर अभिजीत सिंह को लाया गया। अभिजीत सिंह आरडीए में बेहतर व्यवस्था बना ही रहे थे कि उनकी जगह पर चंद्रकांत वर्मा आ गए। चंद्रकांत वर्मा अभी आरडीए को ठीक से समझ पाने की कोशिश कर ही रहे थे कि उन्हें अपर कलेक्टर बनाकर कांकेर भेज दिया गया और अब छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के आयुक्त धर्मेश कुमार साहू को आरडीए सीईओ का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। रघुवंशी, सिंह एवं वर्मा इन तीनों में कोई भी आरडीए में चार-पांच महीने से ज़्यादा नहीं रह पाया। राज्य शासन व्दारा आरडीए में एक के बाद एक क्यों सीईओ बदले जा रहे हैं, इसका जवाब वहां के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं संचालक मंडल के सदस्यों किसी के भी पास नहीं है। स्थिति यह है कि किसी सीईओ के साथ पदाधिकारियों की ठीक-ठाक पटरी बैठना शुरु होती नहीं है कि अचानक से कोई नया नाम सामने आ जाता है। लोग मजे लेकर यह भी कहने लगे हैं कि नई सरकार आने के बाद आरडीए आईएएस अफ़सरों के लिए विशेष तरह का प्रशिक्षण केन्द्र बनकर रह गया है।

आरडीए का नारायणपुर

से क्या है रिश्ता

अप्रत्यक्ष रूप से मानो रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) व नारायणपुर जिले के बीच कोई गहरा रिश्ता सा बन गया है। आरडीए में अभी-अभी मुख्य कार्यपालान अधिकारी पद पर धर्मेश कुमार साहू जो पदस्थ किए गए हैं वे कभी नारायणपुर में कलेक्टर रह चुके हैं। वहीं हाल में ऋतुराज रघुवंशी जो नारायणपुर कलेक्टर हैं वे पूर्व में आरडीए सीईओ रह चुके हैं। इसी तरह आरडीए में दो बार सीईओ रह चुके अभिजीत सिंह पूर्व में नारायणपुर कलेक्टर रह चुके हैं।

बैली डॉस पर हंगामा

राजधानी रायपुर की एक सितारा होटल में बैली डॉस को लेकर बजरंग दल वालों ने जमकर हंगामा किया। बताते हैं बैली डॉस दस दिनों तक चलने वाला था। इसके लिए विदेश से दो डॉसर बुलवाई गई थीं। पहले दिन हुए डॉस का वीडियो जमकर वायरल हो गया, जिसके विरोध में बजरंगी उठ खड़े हुए और झंडे लहराते हुए होटल परिसर पहुंच गए। पुलिस बुलानी पड़ी। होटल प्रबंधन ने जब लिखित में आश्वासन दिया कि अब यहां इस तरह कोई डॉस नहीं होगा तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ। डॉस या फिर किसी और रूप में रायपुर शहर में मौज मस्ती का सिलसिला बरसों से चले आ रहा है। कुछ वर्षों पहले नये साल का जश्न मनाने मुंबई से कुछ खूबसूरत युवतियां रायपुर बुलाई गई थीं। रायपुर एयरपोर्ट पर उतरते ही इनकी धरपकड़ हो गई थी। रायपुर में मरीन ड्राइव के पास नशे में धुत्त उजबेकिस्तान की लड़की पाए जाने की घटना भी बहुत से लोगों को याद है। ज़मानत लेने कोई सामने नहीं आया तो उस विदेशी लड़की को जेल जाना पड़ा था। उस लड़की को न हिन्दी आती थी न इंग्लिश। उसे केवल अपने देश की भाषा आती थी। उसका बोला हुआ न यहां के लोग समझ पाते थे और यहां का कहा हुआ न उसके पल्ले पड़ता था।

जनसंपर्क विभाग

को कोरोना का डर

कोरोना की चौथी लहर की जिस तरह आहट मिल रही है उससे छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग के कुछ अफ़सर बेहद चिंतित हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। कोरोना का जो पहले का तीन दौर आया उसमें जनसंपर्क विभाग के अधिकतर लोग ख़बरों के प्रचार प्रसार के लिए योद्धा की तरह मैदान में डटे रहे थे। रायपुर के जनसंपर्क विभाग के दो-तीन अफ़सर तो ऐसे हैं जो कि तीनों दौर में अर्थात् तीन बार कोरोना संक्रमित हुए। अब विभाग के लोग यही कामना कर रहे हैं कि चौथी बार वैसा खतरनाक दौर देखने में न आए।

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