■ अनिरुद्ध दुबे
सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर और सट्टा सिंडिकेट का मास्टर माइंड बाबू खेमानी जेल भेजा जा चुका है। पुलिस का कहना है कि बाबू खेमानी महादेव व अन्य सट्टा एप से जुड़ा था। गोवा से इसके गिरोह का काम चल रहा था। इस गिरोह के तार मुम्बई-दुबई तक फैले हुए थे। राजधानी रायपुर के रवि भवन में गुलशन उर्फ बाबू खेमानी की मोबाइल की बड़ी दुकान है। बीच में नशे के क़ाराबोर से जुड़े लोगों की एक से बढ़कर एक ख़बरें लगातार आ रही थीं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से सट्टा तंत्र मीडिया में छाया हुआ है। कहने वाले कहते रहते हैं कि राजधानी बनने के बाद रायपुर प्रगति के पथ की तरफ अग्रसर तो हुआ ही लेकिन इस शहर पर अपराध के अनेकानेक रंग भी चढ़ते चले गए। रायपुर शहर पहले भी कौन से रंग में कब और कहां फीका रहा था! बात सट्टेबाजी से शुरु हुई तो इसी पर आगे बढ़ें। बाबू खेमानी तो बहुत बाद का है, पहले भी रायपुर शहर से कितने ही सट्टा किंग निकल चुके हैं। बात 70 और 80 के दशक की है। तब के कस्बाईनुमा रायपुर शहर के दो इलाके सद्दानी चौक (सदर बाज़ार) व स्टेशन चौक देर रात में भी आबाद रहा करते थे। सद्दानी चौक सत्तर व अस्सी के दशक में सट्टेबाजी के लिए मशहूर रहा। सद्दानी चौक में किस स्तर तक का सट्टा होता था उसकी मिसाल कुछ यूं है कि धूप खिली हुई है और अचानक बारिश शुरु हो गई। देखते ही देखते इस बात पर सट्टा लग जाता था कि बारिश का पानी टिन (शेड) से नीचे गिरेगा या वहीं ठहरा रह जाएगा। आप चिट-पट (हेड-टेल) देखते रहे हैं, सद्दानी चौक के उस समय के कुछ सट्टेबाज जूता उछालकर हेड टेल कर लेते थे। सत्तर से अस्सी के बीच सद्दानी चौक में दो बड़े सट्टा किंग सदननाथ एवं रोमप्रकाश (परिवर्तित नाम) की तूती बोला करती थी। सदर बाज़ार के ही पास नगर निगम की महाराणा प्रताप स्कूल वाली गली में ये सट्टा किंग गमछा बिछाकर सट्टा पट्टी खोलते। इनका सट्टे का क़ारोबार कितना बढ़ गया था इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सदर बाज़ार के पास ही स्थित चुड़ी लाइन में एक बड़े से मकान के बड़े से हिस्से से ये फ़िल्मी स्टाइल में सट्टे का क़ारोबार संचालन करने लगे थे। जैसा बाबू खेमानी सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर है उसी तरह सट्टा किंग सदननाथ उस दौर का बड़ा मिमिक्री आर्टिस्ट था। बाद में सदन ने जब सट्टे की दुनिया से नाता तोड़ा तो खुद को एक चिकित्सा पद्धति से जोड़ लिया। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद एक बड़े नेता जब चुनाव प्रचार के दौरान भयंकर दुर्घटना का शिकार हो गए थे, उनका उपचार कई दिनों तक सदननाथ ने अपनी चिकित्सा पद्धति से किया था। रोमप्रकाश की बात करें तो सट्टा खिलाते-खिलाते वह शहर के एक ख़ास दादा गिरोह से जा जुड़ा। रोमप्रकाश ने बीच सड़क पर कभी मारपीट, गाली-गलौच व ख़ून खराबे जैसा काम नहीं किया, लेकिन वो कहते हैं न संगत आप को कहां से कहां ले जा पटकती है। रायपुर शहर में एक भयंकर बम कांड हो गया। बम कांड में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया उनमें रोमप्रकाश भी था। रोम ने जेल में लंबी सजा काटी और रिहा होने के बाद उसी सद्दानी चौक में एक बड़ी सी पान दुकान लगाई। पान दुकान के पीछे तरफ सामान रखने एक कमरा बना हुआ था। कमरा सड़क से स्पष्ट नज़र आया करता था। कमरे की दीवाल पर रोमप्रकाश ने कुछ सेक्सी तस्वीरें लगा रखी थीं। ऐसे भी लोग थे जो रोम की दुकान पर पान, बीड़ी, सिगरेट लेने नहीं आते थे लेकिन जब वहां सामने से गुज़र रहे होते उन अर्धनग्न तस्वीरों को देखने कुछ सेकेंड के लिए ठहर जाया करते थे। अविभाजित मध्यप्रदेश के उस दौर में सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्रित्वकाल में लाटरी का धंधा क़रीब साल भर तक ख़ूब फला-फूला रहा। फले-फूले रहने के पीछे कारण यह था कि लॉटरी के इस क़ारोबार को तत्कालीन पटवा सरकार की अनुमति मिली हुई थी। तब के विपक्षी कांग्रेस नेतागण सरकारी लाटरी पर कटाक्ष करते हुए उसे ‘पटवा मटका’ कहते थे। रोमप्रकाश उस दौर में लाटरी का भी ख़ूब धंधा किया। सदननाथ व रोमप्रकाश दोनों इस दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं। सद्दानी चौक में रोज़ाना अपनी शाम बिताने वाले कुछ पुराने लोग कभी-कभार सदन व रोम को याद कर लेते हैं।
सट्टे की इस कहानी को ख़त्म करने से पहले सदननाथ के एक ख़ूबसूरत बेटे का भी ज़िक्र हो जाए, जो अपने पिता की ही तरह तेज-तर्रार था। बताने वाले बताते हैं कि सदन के बेटे के तार मुम्बई होते हुए दूबई तक जा जुड़े थे। रिकॉर्ड तोड़ कमाई करने वाली फ़िल्म ‘धूरंधर’ में ‘भाई साहब’ का करैक्टर देखा जा चुका है। बताते हैं सदननाथ के बेटे की पहुंच कभी ‘भाई साहब’ के क़रीबी लोगों तक हो गई थी।
छत्तीसगढ़ में ‘आप’ के और
कमज़ोर होने का ख़तरा
राघव चड्डा के नेतृत्व में 7 राज्यसभा सांसदों ने जिस तरह आम आदमी पार्टी से नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया उससे छत्तीसगढ़ में पहले से कमज़ोर हो चुकी ‘आप’ के आगे और कमज़ोर हो जाने के आसार नज़र आ रहे हैं। आप से भाजपा में जा चुके राज्यसभा सांसद संदीप पाठक छत्तीसगढ़ के लोरमी क्षेत्र के हैं। थोड़े समय के लिए वे छत्तीसगढ़ के आप प्रभारी भी रहे। हो सकता है आने वाले समय में भाजपा संदीप पाठक का छत्तीसगढ़ में अपने तरीके से इस्तेमाल करे लेकिन अभी तो यहां आप के सामने जीरो बटे सन्नाटा है। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बाद थोड़े समय के लिए ही सही कोई पार्टी तीसरी शक्ति के रूप में सामने आ पाई तो वह अजीत जोगी की छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस पार्टी रही। 2018 के विधानसभा चुनाव में जनता कांग्रेस के 5 उम्मीदवार जीते थे। एक समय में छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी को लेकर भी तीसरी शक्ति के रूप में संभवानाएं तलाशी गई थी। छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक फसल बोना 2013 में शुरु कर दिया था। ये क्या कम बड़ी बात थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की टिकट पर महासमुन्द से जाने-माने कवि-गीतकार लक्ष्मण मस्तूरिया, बस्तर से सुर्खियों में बनी रहने वाली आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी तथा बिलासपुर से समाजवादी नेता आनंद मिश्रा चुनाव लड़े थे। भले ही ये चेहरे चुनाव नहीं जीते पर आम आदमी पार्टी चर्चा में तो आ ही गई थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में आप ने छत्तीसगढ़ की 90 में से 85 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें जाने-माने कृषि वैज्ञानिक संकेत ठाकुर रायपुर ग्रामीण से चुनाव लड़े थे। वहीं 2023 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ प्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के लंबे समय तक महासचिव रहे नेता विजय कुमार झा नौकरी से रिटायर होने के बाद आप की टिकट पर रायपुर दक्षिण से विधानसभा चुनाव लड़े थे। चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, आप छत्तीसगढ़ में कहीं भी जीत दर्ज तो नहीं कर पाई लेकिन जैसा कि उससे जुड़े कुछ चर्चित चेहरे चुनावी मैदान में उतर जाया करते थे वह चर्चा में बनी रहती थी। आप को छत्तीसगढ़ में बड़ा झटका तब लगा था जब उसके छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष कोमल हुपेंडी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में भानुप्रतापपुर सीट से हार के बाद 2024 में पार्टी ही छोड़ दी। जैसा कि शुक्रवार को ख़बर आई कि आप के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया वह छत्तीसगढ़ में आप से जुड़े लोगों का मनोबल और तोड़ देने वाली ख़बर रही है।
बदलता बस्तर
केन्द्रीय ग़ृह मंत्रालय की ओर से पिछले दिनों देश भर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की व्यापक समीक्षा की गई। इसके बाद देश को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव राजीव कुमार की तरफ से सभी नक्सल प्रभावित रहे राज्यों के गृह सचिवों व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को पत्र प्रेषित कर इस आशय की अधिकारिक सूचना दे दी गई है। छत्तीसगढ़ की बात करें। वास्तव में यहां आज की तारीख़ में कोई भी बड़ा नक्सली लीडर नहीं बचा है। छत्तीसगढ़ की कमान जो नक्सली लीडर सम्हालते रहे थे उनमें से कुछ मुठभेड़ में मारे गए, कुछ समर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए। बस्तर में जो कुछ बचे-खुचे नक्सली लड़ाके जंगलों में रह भी गए हैं तो उनकी संख्या काफ़ी कम है। इसमें कोई दो मत नहीं कि केन्द्र सरकार ने बस्तर में अब बड़ी संभावनाएं तलाशना शुरु कर दिया है। क्रिकेट के भगवान कहलाने वाले सचिन तेंदुलकर का बेटी सारा और बहू सानिया के साथ पिछले दिनों बस्तर दौरा होना कोई छुट्टियों वाला पर्यटन दौरा नहीं था। उस दौरे के पीछे बड़ा संदेश था। तेंदुलकर परिवार बस्तर के मैदान में खिलाड़ी बच्चों से मिला। सचिन तेंदुलकर फाउंडेशन आगे बस्तर में बहुत कुछ करना चाहता है। तेंदुलकर परिवार का यह बस्तर दौरा दूसरे राज्यों में रहने वाले उन लोगों के लिए नया संदेश है- छत्तीसगढ़ राज्य का नाम सामने आते ही जिनके मनोमस्तिष्क में नक्सलवाद की तस्वीर खींच जाया करती थी। देश में इस समय ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान चल रहा है। छत्तीसगढ़ की बात करें तो सबसे ज़्यादा पांडुलिपियां महासमुन्द जिले से आई हैं, दूसरे नंबर पर रायपुर व तीसरे नंबर पर बस्तर है। बस्तर से 1300 से ज़्यादा पांडुलिपियों के पोर्टल पर अपलोड होने की ख़बर है। कभी पूरे देश में नक्सलवाद से सबसे ज़्यादा पीड़ित रहा बस्तर अब वाकई व्यापक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार व उससे जुड़ा सूरक्षा तंत्र अति उत्साह नहीं दिखाते हुए सोच-समझकर आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि नक्सली गतिविधियों में सहयोग करने के लिए पहचानी जाती रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) व उससे जुड़े छह अन्य संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंध को आगे एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है।
वेदांता को काफ़ी पहले
से मिलते रहा है महत्व
छत्तीसगढ़ में वेदांता पावर लिमिटेड में हुए हादसे में 24 लोगों की मौत पर वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल को भी आरोपी बनाया गया है। उद्योगपति नवीन जिंदल, अनिल अग्रवाल के बचाव में आ गए हैं। नवीन जिंदल ने सोशल मीडिया में पोस्ट करते हुए लिखा कि “हादसा बेहद दर्दनाक है। प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, आजीविका सहायता और निष्पक्ष जांच मिलनी ही चाहिए। इस तरह की घटनाओं में ज़िम्मेदारी तय करना ज़रूरी है, लेकिन बिना जांच के किसी बड़े उद्योगपति का नाम एफआईआर में शामिल करना गंभीर सवाल खड़े करता है।“ दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रतिक्रिया दी कि “जिंदल ने जो भी कहा उस पर चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है।“
राजनीति से परे हटकर देखें तो अनिल अग्रवाल के खिलाफ़ एफआईआर तो हुई है। छत्तीसगढ़ में पूर्व में लगातार 3 बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो रही थी अनिल अग्रवाल से उसका गहरा जुड़ाव दिखा करता था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल की बात करें, राजधानी रायपुर के सड्ढू क्षेत्र में 72 एकड़ ज़मीन पर रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) एस्सल वर्ल्ड की तर्ज पर मनोरंजन केन्द्र लाने की तैयारी में था। तब सरकार ने वह 72 एकड़ ज़मीन आरडीए के बजाय अनिल अग्रवाल के वेदांता समूह की ओर से बनाए जाने वाले कैंसर अस्पताल के लिए अलाट कर दी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सड्ढू में कैंसर अस्पताल निर्माण कार्य का भूमि पूजन भी किया था। बाद में फिर पता नहीं क्या हुआ, वेदांता समूह को सड्ढू वाली वह जगह जमी नहीं और उसके व्दारा नया रायपुर में ज़मीन मांगी गई। तत्कालीन सरकार ने नया रायपुर में कैंसर अस्पताल के लिए ज़मीन उपलब्ध करा दी। 2008 से 2013 के बीच भाजपा सरकार का जब दूसरा कार्यकाल था तत्कालीन कांग्रेस विधायक अजीत जोगी विधानसभा में चूटकी लेते हुए यह कहने से नहीं चूकते थे कि “सेठ अनिल अग्रवाल से सरकार से क्या संबंध हैं…”
जिस रायपुर नगर निगम
में बड़े बनकर रहे
वहीं लौटना नहीं चाहते…
राज्य शासन व्दारा कुम्हारी सीएमओ (मुख्य नगर पालिका अधिकारी) नेतराम चंद्राकर का तबादला रायपुर नगर निगम जोन कमिश्नर पद पर किया गया था। चंद्राकर ने इस आदेश के विरुद्ध जाते हुए हाईकोर्ट की शरण ली। नेताम के वकील ने हाईकोर्ट में मजबूत तर्क रखे। जस्टिस पी.सी. साहू ने सुनवाई के पश्चात् पाया कि म्यूनिसिपल कर्मचारी का स्थानांतरण किसी दूसरे नगर निगम में करने का अधिकार राज्य शासन को कानूनन प्राप्त नहीं है। स्थानांतरण आदेश अधिकारविहीन होने से निरस्त कर दिया गया।
गौर करने वाली बात यह कि नेतराम चंद्राकर इसी रायपुर नगर निगम में कभी जोन क्रमांक 1 व जोन क्रमांक 8 के कमिश्नर रहे थे। सवाल यह कि जो अफ़सर कभी राजधानी के नगर निगम में लंबे समय तक जोन कमिश्नर रहा वह वहां वापस क्यों नहीं जाना चाहता! रायपुर नगर निगम के कुछ अनुभवी अफ़सरों के इसके पीछे अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि कुम्हारी नगर पालिका सीएमओ होना यानी वहां का सबसे बड़ा बॉस होना। रायपुर नगर निगम में तो सबसे ऊपर कमिश्नर, उनके पीछे अपर कमिश्नर, फिर उनके पीछे जोन कमिश्नर होते हैं। भला राजधानी रायपुर से ही लगी किसी नगर पालिका के सबसे बड़े पद पर बने रहने का सौभाग्य कौन खोना चाहेगा।
रायपुर नगर निगम के कुछ ऐसे भी अफ़सर हैं जिनकी राय ज़रा हटकर है। इनका कहना है कि रायपुर नगर निगम में अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा। पिछली बार जब प्रदेश व नगर निगम दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार थी, किसी एक बड़े नेता के बेटे को रायपुर नगर निगम पोस्टेड किया गया। रायपुर नगर निगम में आने के बाद उस अधिकारी बेटे ने जाना कि राह कितनी कठिन है। लंबे क़द के उस बेटे को आज भी किसी बड़ी मंज़िल की तलाश है।

