■ अनिरुद्ध दुबे
2023 में छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुत से नये चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा और वह प्रयोग सफल भी रहा। 2028 के विधानसभा चुनाव में ऐसी ही कुछ तस्वीर कांग्रेस की तरफ देखने मिले तो अचरज वाली बात नहीं होगी। सिनेमा में परंपरा रही है कि जब उम्र हावी होने लगे तो हीरो बने रहने के बजाय करैक्टर रोल की तरफ चले जाओ और लंबी पारी खेलो। कांग्रेस के कुछ दिग्गजों के अंतर्मन में इस समय कुछ ऐसा ही चल रहा है। कांग्रेस में 3 ऐसे दिग्गज नेता हैं जो 2028 के चुनाव में बेटे को चुनावी मैदान में उतारना चाहते हैं। देखा जाए तो एक दिग्गज का बेटा राजनीतिक रुप से थोड़ा निपुण हो चुका है। पिता व दादा फाइटर रहे तो बेटे में उनका थोड़ा न थोड़ा असर तो रहेगा ही।
दूसरे दिग्गज की बात करें जो न सिर्फ़ ओजस्वी वक्ता माने जाते हैं, बल्कि समय के साथ किस करवट बैठना है इसका ज्ञान उन्हें भलीभांति है। जब भी कांग्रेस की सरकार रही शतरंजी चाल का उन्हें फ़ायदा भी मिला। ये दिग्गज तो 2023 के चुनाव में अपने सुयोग्य पुत्र को लॉच करना चाह रहे थे, लेकिन पार्टी के ही दूसरे आक्रामक नेता ने उनसे कह दिया- “भैया, बेटे वाला स्टेप अभी नहीं उठाना है। उसके लिए बाद में भी अवसर होंगे। दोबारा सरकार बनाने अभी ख़ुद आपको मैदान में उतरना होगा।“ भैया बात मानकर 23 के चुनाव में मैदान में उतर तो गए लेकिन परिस्थितियां एकदम उलट-पलट हो गईं। चुनावी मैदान में वह सब कुछ घट गया जिसकी कल्पना भी नहीं रही थी। वह चुनाव हाथ से निकल गया। 23 की पराजय के बाद अब नेता जी की इच्छा है कि बेटे के लिए रास्ता खुले।
बड़ी ही ख़ामोश चाल चलते हुए प्रतिस्पर्धियों को मात देने में माहिर तीसरे दिग्गज की बात करें। उनकी आज नहीं लंबे समय से इच्छा है कि बेटा सूरज की तरह राजनीति में चमके। बेटा सहज, सरल और थोड़ा शर्मीला है। हो सकता है 28 के चुनाव तक ख़ुद का मन पक्का कर ले।
अब थोड़ा अलग हटकर चौथे दिग्गज की ओर रुख़ करें। यहां मसला बेटे वाला नहीं है। टू द प्वाइंट बात करने वाले इन नेता जी की राजनीतिक शैली सदा से भिन्न रही है। पहनावे से लेकर सोच तक। ये अपने भाषण में या मीडिया के सामने अपने कथन में अलंकारिक या घूमावदार भाषा का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि तार्किक बात करने में यक़ीन रखते हैं। ये बेटे को लॉच करने जैसे मूड में तो नहीं, लेकिन 28 में आख़री बार चुनाव लड़ लेना चाह रहे हैं। सबसे बड़ा मसला सीट का है। जहां से ये लड़ा करते थे वह सीट इस समय बुरी तरह फंसी हुई है। अब सवाल यह कि अगली बार उसी सीट से ट्राई करें या फिर नया चुनावी मैदान तलाशें।
क्या है ‘जे.एच.’ का राज़
छत्तीसगढ़ राज्य इस नवंबर महीने में अपनी 26 वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। राज्य गठन से लेकर अब तक के इस सफ़र को काफ़ी नज़दीक से देखे एक राजनीतिक शख़्सियत से यह पूछे जाने पर कि एक लंबा दौर गुज़र चुका। आपका दीर्घ अनुभव क्या बोलता है। उस शख़्सियत ने कहा- “जो सरकार लगातार 3 बार रही थी उस दौर में अलग-अलग सर्किट हाउस में एम.पी. व एम.एच. वाली पासिंग गाड़ियां खड़ी नज़र आया करती थीं। 2018 से 2023 के दौर में सी.जी. गाड़ियां सर्किट हाउस के बाहर ख़ूब दिखा करती थीं। यह अलग बात है कि उस कालखंड में कभी-कभी यू.पी. वाली गाड़ियां भी पार्क होते नज़र आ जाया करती थीं। अभी के दौर की बात करें तो अक्सर जे.एच. लिखी गाड़ियां काम वाली जगहों पर खड़ी देखी जा सकती हैं। समझने की कोशिश करें रिश्ता क्या कहलाता है।“
टिकट का इशारा
और तैयारी…
किसी-किसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ऐसा जोर मारती है कि उनके प्रचार प्रसार का वेग तूफानी नज़र आता है। राजधानी रायपुर की किसी डॉक्टर साहिबा को कहीं से ऐसा इशारा मिला है कि पिछले महीने-दो महीने में प्रचार प्रसार में उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है। राजनीति में महत्वपूर्ण यह होता है आपके भीतर आत्मविश्वास जगाने और भरोसा दिलाने के पीछे भूमिका किसकी है। साहिबा के भीतर गहरा आत्मविश्वास पैदा करने वाली शख़्सियत कोई छोटी-मोटी नहीं बहुत बड़ी है। बड़ा कदम उठाने से पहले साहिबा ने ख़ुद को जांच व परख लेने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। किसी महाराज को अपनी जन्म कुंडली दिखाई तो वहां से जानने मिला कि आपके ग्रहों की चाल बिलकुल सही दिशा में है। राज योग दिख रहा है। फिर आत्मविश्वास जगाने वाले दिग्गज नेता ने भी उन्हें समझा दिया है कि पार्टी महिला आरक्षण के मुद्दे पर लगातार अमल करते जा रही है। यदि समय रहते परिसीमन हो गया तो रायपुर की सीटें 4 से बढ़कर 6 हो जाएंगी। आगे टिकट के समय में हम देखेंगे क्या हो सकता है। तूम अपनी तैयारी तो शुरु करो। नेत्री ने साहब के आदेश का पालन करने में देर नहीं लगाई। दिग्गज के साथ नेत्री की तस्वीर वाले बोर्ड राजधानी में जगह-जगह टंगे देखे जा सकते हैं।
पार्टी को जीतना आता है
राजधानी रायपुर में एक विधायक जी के साथ पार्टी के लोगों की विचार मंत्रणा चल रही थी। बात निकली तो यहां तक पहुंच गई कि नीचे के दोनों इंजन तूफान मेल नहीं बल्कि पैसेंजर की तरह बेहद सुस्त रफ़्तार से चल रहे हैं। बार-बार तीसरा इंजन आउटर में खड़ा हो जा रहा है। डिब्बे में सवार यात्रीगणों का धैर्य ज़वाब देने लगा है। कहीं पर कोई सुनवाई नहीं हो रही। एक मंडल अध्यक्ष का धैर्य ज़वाब दे गया और वह विधायक जी के सामने कह गया- “भैया सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। दो साल बचा है। मानकर चलिए, आगे जाकर बहुत मुश्किल होगी।“ विधायक जी, मुंहफट जो ठहरे। उन्होंने कहा- “तूझसे नहीं जम रहा तो पद छोड़ दे। जा आराम कर। पार्टी को चुनाव जीतना आता है।“
साल भर में ही
इनोवा का सुख
छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले और उसके बाद की स्थिति का किसी के पास गहरा राजनीतिक अध्ययन है। पिछले 35-40 सालों में राजनीति में क्या बदलते दिखा पूछे जाने पर उस अध्ययनशील व्यक्ति ने गहरी बात कही कि “पहले किसी विधायक को जनहित से जुड़े कार्य के लिए दौरे पर जाना होता तो वह कलेक्ट्रेट में लिखकर देता था। अधिकतम सात दिन के लिए कलेक्ट्रेट व्दारा विधायक जी के दौरे के लिए गाड़ी की व्यवस्था कर दी जाती थी। अस्सी व नब्बे के दशक तक हमने देखा था कि कोई पहली बार विधायक चुनकर आए तो उसे चार पहिया खरीदने में साल-दो साल का वक़्त लग जाता था। अभी के इस ज़ल्दबाजी वाले दौर में सांसद-विधायक तो दूर नगर निगम, पालिका या पंचायत में कोई होशियार किस्म का चुनकर आ जाए तो वह साल भर के भीतर इनोवा ले लेता है।“

