● ‘भूलन द मेज़’ में भकला का रोल बड़ा चैलेंज रहा- ओंकारदास मानिकपुरी

■ अनिरुद्ध दुबे

‘पीपली लाइव’ के नत्था की भूमिका में विश्वव्यापी लोकप्रियता हासिल कर चुके ओंकारदास मानिकपुरी का राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फ़िल्म ‘भूलन द मेज़’ में अहम् किरदार है। मनोज वर्मा निर्देशित यह फ़िल्म 27 मई को देश के सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है। ओंकार कहते हैं “भूलन कांदा उपन्यास पर फ़िल्म बनाना अपने आप में बड़ा चैलेंज था, जिसमें डायरेक्टर मनोज वर्मा शत प्रतिशत खरे उतरे हैं।“ बड़ा चैलेंज तो भकला का रोल भी था, शुक्रिया मनोज भाई का कि इस पात्र के लिए उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया।“

एक मुलाक़ात में ओंकारदास मानिकपुरी ने बताया कि “मनोज भाई जब ‘भूलन’ के भकला के किरदार का प्रस्ताव लेकर आए उससे पहले ही मैं उपन्यास ‘भूलन कांदा’ पढ़ चुका था। जब उपन्यास पढ़ा तो मन में यही विचार आया था कि इस पर बहुत अच्छी फ़िल्म बन सकती है। ऐसे विषय पर तो आमिर खान जी जैसे लोगों को काम करना चाहिए। आमिर जी इसलिए याद आए कि मैं उनके प्रोडक्शन हाउस की फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ कर चुका था। लेकिन वक़्त ने तय कर रखा था कि ‘भूलन’ का काम मनोज भाई के हाथों होना है। यह भी संयोग देखिए कि ‘भूलन कांदा’ लिखने वाले राइटर संजीव बख्शी जी छत्तीसगढ़ के और उस पर फ़िल्म बनाने वाले डायरेक्टर मनोज वर्मा भी छत्तीसगढ़ के।“ आख़िर आपको ऐसा लगा तो क्यूं लगा कि ‘भूलन’ पर अच्छी फ़िल्म बन सकती है, ओंकार कहते हैं- “मैं नाटकों में काम करते रहा हूं। नाटकों से बॉलीवुड तक का सफ़र तय किया। जब भी कोई गंभीर कृति पढ़ता हूं तो उसमें सिनेमाई संभावनाएं तलाशने लग जाता हूं। ‘भूलन कांदा’ को जब पढ़ना शुरु किया तो कुछ ही पन्नों से गुजरने का बाद महसूस होने लगा था कि इस पर अच्छी फ़िल्म बन सकती है। पूरा उपन्यास पढ़ लेने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि इस पर इसे बनाना कोई आसान काम नहीं होगा। फ़िल्म के लिए बजट बड़ा रखना पड़ेगा। स्क्रीन प्ले व डायलॉग लिखने से लेकर डायरेक्शन करने तक में बड़े रिसर्च की ज़रूरत होगी और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि मनोज भाई इन सारे कामों में खरे उतरे हैं।“ भूलन द मेज़ में अणिमा पगारे आपकी पत्नी की भूमिका में नज़र आई हैं, उनके साथ अनुभव कैसा रहा, ओंकार बताते हैं- “काफ़ी समय से मैं और अणिमा मुम्बई रह रहे हैं, पर वहां हमारी मुलाक़ात कभी नहीं हुई। यहां जब ‘भूलन’ के शूट पर आया तो उन्हें देखकर यही लगा था कि वे छत्तीसगढ़ से हैं। बाद में मालूम हुआ कि वे काफ़ी पहले से मुम्बई में थियेटर व सीरियल करती रही हैं। बॉलीवुड की राजेन्द्र गुप्ता जी, मुकेश तिवारी जी एवं अशोक मिश्रा जी जैसी हस्तियां भी ‘भूलन’ से जुड़ीं। यह फ़िल्म के लिए काफ़ी अच्छा रहा।“ चूंकि आप छत्तीसगढ़ से हैं, अतः छत्तीसगढ़ी सिनेमा का भविष्य कैसा देखते हैं, ओंकार कहते हैं- “यह अपने आप में बड़ी बात है कि यहां सतीश जैन एवं मनोज वर्मा जैसे बड़े डायरेक्टर हैं। छत्तीसगढ़ी सिनेमा को इनके जैसे और गुणी डायरेक्टरों की ज़रूरत है।“ क्या आपके पास आगे किसी छत्तीसगढ़ी फ़िल्म का प्रस्ताव आया तो करेंगे, ओंकार कहते हैं- “क्यों नहीं। एक छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘किस्मत के खेल’ कर चुका हूं और ‘भूलन द मेज़’ में भी तो हमने छत्तीसगढ़ी बोली है। अच्छी स्टोरी हो और अच्छा किरदार करने को मिले तो बिलकुल छत्तीसगढ़ी फ़िल्में करूंगा। वैसे भी मैं राजस्थानी, पंजाबी, मराठी एवं गुजराती रीज़नल फ़िल्में कर ही रहा हूं।“ आप ख्यातिप्राप्त नाट्य निर्देशक स्व. हबीब तनवीर से जुड़े रहे। उनके साथ कैसा अनुभव रहा, ओंकार बताते हैं- “1988 में हबीब साहब के साथ जुड़ना हुआ था। बतौर लोक गायक। आगे उनके नाटकों में अभिनय करने का भी मौका मिला। उनके साथ मुद्रा राक्षस, हिरमा की अमर कहानी, गांव के नांव ससुराल मोर नांव दामाद, कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना, वेणि संघार, सड़क, पोंगा पंडित एवं राज रक्त जैसे नाटकों में काम किया।“ ‘पीपली लाइव’ के बाद ओंकार नत्था के नाम से पुकारे जाने लगे, आमिर खान जैसे सितारे की उस होम प्रोडक्शन की फ़िल्म में काम करने का कैसा अनुभव रहा, इस सवाल पर ओंकार कहते हैं- “आमिर जी बहुत अच्छे इंसान हैं। बॉलीवुड के ज़्यादातर लोगों से उनकी सोच अलग है। स्टार होते हुए भी वे ज़मीन से जुड़े हैं। मैंने अपने जीवन में हबीब साहब के बाद आमिर जी को ही सबसे ज़्यादा माना। आमिर जी नत्था का रोल ख़ुद करना चाहते थे। कास्टिंग डायरेक्टर अनुष्का रिज़वी जो कि ‘पीपली लाइव’ की डायरेक्टर भी हैं ने आमिर जी से कहा था कि एक बार ओंकार को आज़मा कर देख लो। मेरा ऑडिशन लिया गया, फिर आमिर जी ने यह कहते हुए नत्था का रोल छोड़ दिया कि इस काम के लिए ओंकार ही ठीक रहेंगे।“

 

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