कारवां (30 जनवरी 2022)- राहुल गांधी और नया रायपुर के आंदोलनकारी किसान

■ अनिरुद्ध दुबे

नया रायपुर में आंदोलनरत किसानों को सरकार ने चर्चा के लिए बुलाया। माना जा रहा है कि कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे के बंगले में हुई यह चर्चा सार्थक रही। चर्चा के दौरान मंत्री व्दय मोहम्मद अक़बर एवं डॉ. शिव कुमार डहरिया, विधायक धनेन्द्र साहू, अपर मुख्य सचिव सुब्रत साहू, एनआरडीए के सीईओ डॉ. अय्याज तंबोली एवं रायपुर कलेक्टर सौरभ कुमार मौजूद थे। चर्चा के दौरान आंदोलनकारी किसानों को मांगों को पूरा करने का सरकार की तरफ से ठोस आश्वासन मिला है। यह ठीक ही हुआ। 3 फरवरी को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सांसद राहुल गांधी नया रायपुर में गांधी सेवाग्राम आश्रम का शिलान्यास करने के लिए जाने वाले हैं। उनके नया रायपुर जाने से पहले यदि किसानों के आंदोलन की गूंज थम जाती है तो अच्छा ही होगा। स्वयं आंदोलनकारी किसानों के नेता रूपम चंद्राकर मानते हैं कि जब भी राहुल गांधी के कदम रायपुर में पड़ते हैं हमारे लिए कुछ अच्छा ही होता है। रूपम चंद्राकर कहते हैं “अपनी मांगों को लेकर आवाज़ हम कोई आज नहीं बरसों से उठाते आ रहे हैं। इसके पहले हमारे दर्द को नंद कुमार पटेल जैसे नेता ने सुना था, जब वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। राज कुमार कॉलेज में पटेल जी ने हम आंदोलकारी किसानों को राहुल जी से मिलवाया था। धनेन्द्र साहू जी जैसे वरिष्ठ नेता इस बात के गवाह हैं। अब राहुल जी का फिर से रायपुर आगमन हो रहा है। सरकार ने न सिर्फ हमारी बातों को गंभीरतापूर्वक सुना है, बल्कि ठोस आश्वासन भी दिया है, जिसके पूरा होने बेसब्री का इंतज़ार है।“

गंगा जल लेकर सौगंध खाने वाले आरपीएन बने भाजपाई

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री आर.पी.एन. सिंह ने जिस तरह कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया वह छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं के लिए चौंकाने वाली ख़बर रही। ये वही आर.पी.एन. सिंह हैं जो छत्तीसगढ़ में 2018 में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रेस कान्फ्रेंस लेने रायपुर आए थे। प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान आरपीएन सिंह के साथ राष्ट्रीय प्रवक्ता राजबीर शेरगिल, प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता व्दय शैलेश नितिन त्रिवेदी एवं सुशील आनंद शुक्ला ने गंगा जल हाथ में लेकर कसम खाई थी कि यदि कांग्रेस की सरकार बनी तो किसानों का कर्ज़ा माफ होगा। सरकार बनी और कर्ज़ा भी माफ हुआ लेकिन सौंगध दिलवाने वाले आरपीएन का इस तरह भाजपा में चले जाना कांग्रेस के लिए ज़रूर बड़ा झटका माना जा रहा है। भाजपा उन्हें उत्तरप्रदेश के पडरौना सीट से विधानसभा चुनाव लड़वा सकती है। आरपीएन सिंह मनमोहन सिंह की सरकार के समय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहे थे। 25 मई 2013 को जब झीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ था उस वक़्त आरपीएन बिना देर लगाए दिल्ली से रायपुर पहुंचे थे। उनके पिता श्रीमती इंदिरा गांधी के काफ़ी क़रीबी माने जाते थे। आरपीएन की राहुल गांधी से काफ़ी निकटता रही थी। राजनीति में निकटता कब दूरियों में बदल जाए कहा नहीं जा सकता।

आईएएस को अचानक केन्द्र बुलवा लें तो नुकसान किसका

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग यानी डीओटी ने हाल ही में आईएएस (कैडर) नियम 1954 में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। यदि यह लागू हो जाता है तो केंद्र सरकार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर किसी आईएएस अफ़सर को बुलाना चाहेगी तो संबंधित प्रदेश की सरकार को उसे मानना पड़ेगा। इस  प्रस्ताव के आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तत्काल विरोध दर्ज कराया है। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि “राज भवन के दुरुपयोग के बाद अब भाजपा के सत्ताधीश आईएएस अफ़सरों पर कंट्रोल चाह रहे हैं। कोई अधिकारी राज्य में अच्छा काम कर रहा हो और उसे अचानक केन्द्र में बुलवा लिया जाए इससे राज्य का नुकसान होगा।“ पूर्व अपर मुख्य सचिव बीकेएस रे के अलावा सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके कुछ अन्य आईएएस अफ़सरों ने भी इस प्रस्ताव पर प्रश्न चिन्ह लगाया है। इससे थोड़ा अलग हटकर बात करें तो छत्तीसगढ़ पूर्व में दूसरे कटू अनुभवों से गुजर चुका है। नवंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना। तब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार थी। चूंकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विधायकों की अधिकता थी अतः यहां भी अजीत जोगी की कांग्रेस सरकार बनी। दिग्विजय सिंह एवं अजीत जोगी एक ही गुरु अर्जुन सिंह के चेले थे। दिग्विजय सिंह एवं अजीत जोगी के बीच किस स्तर की राजनीतिक प्रतिव्दंदिता थी यह बात किसी से छिपी नहीं है। बंटवारे में छत्तीसगढ़ को क्या मिला था इस बात से अधिकांश लोग वाकिफ़ हैं। छत्तीसगढ़ के जाने-माने कवि सुरेंद्र दुबे तो बंटवारे में मिली चल-अचल संपत्ति पर व्यंग्य कसते हुए एक कविता ही लिख डाले थे। बंटवारे के समय प्रशासनिक क्षेत्र में कैसा असंतुलन था यह किसी से छिपा नहीं रहा है। प्रशासनिक चीजों को ठीक होने में लंबा वक़्त लगा। न जाने ऐसा क्यों लगता है कि अभी भी बहुत कुछ ठीक होना बाकी ही है। अधिकारी एवं कर्मचारी महकमे में अभी भी कितने ही ऐसे लोग देखने में मिल जाएंगे जो सुपीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स नाम की बीमारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं।

इस बार छत्तीसगढ़ से किसी को भी पद्म सम्मान नहीं

प्रदेश में इस समय चर्चा यही हो रही है कि गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिल्ली से पद्म पुरस्कारों की जो घोषणा हुई उसमें छत्तीसगढ़ से एक भी नाम नहीं है। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ ही क्यों और भी दूसरे स्टेट हैं जहां से एक भी नाम सामने नहीं आया। वैसे इस बात से इंकार नहीं कि छत्तीसगढ़ में ऐसी कितनी ही हस्तियां हैं जो पद्मश्री की पात्रता रखती हैं। जानकार लोग बताते हैं कि इस बार पद्मश्री के लिए 30 से ऊपर आवेदन गए थे। आवेदन करने वालों में पहली छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘कहि देबे संदेस’ के निर्माता निर्देशक मनु नायक एवं पंथी नृत्य में बड़ी पहचान रखने वाले मिलाप दास बंजारे समेत 30 से अधिक विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां शामिल थीं। प्रश्न यह भी है कि पद्मश्री के लिए चाहे तो छत्तीसगढ़ की सरकार भी किसी नाम के लिए अनुशंसा कर सकती है, तो क्या अनुशंसा की गई थी? वैसे पद्म सम्मान नहीं मिला तो निराशा वाली कोई बात नहीं। पूर्व में भी ऐसा हो चुका है कि छत्तीसगढ़ से किसी को भी पद्म सम्मान नहीं मिला था। इस साल नहीं मिला तो नहीं मिला, आने वाले समय में मिल जाएगा।

जनसम्पर्क में तबादले

गणतंत्र दिवस की शाम को आई छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग की तबादला लिस्ट ने प्रशासनिक एवं मीडिया क्षेत्र से जुड़े लोगों को चौंका दिया। प्रशासनिक क्षेत्र से ही जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि यह लिस्ट गणतंत्र दिवस के एक दिन बाद भी तो जारी की जा सकती थी। जानकार लोगों का मानना है तबादला लिस्ट तो और बड़ी होने वाली थी कोविड लहर तथा अन्य कारणों से इसे थोड़ा छोटा किया गया। एक बात किसी के गले नहीं उतर पा रही है कि रायपुर जिला जनसंपर्क कार्यालय में पदस्थ संयुक्त संचालक पंकज गुप्ता को कोरबा क्यों भेजा गया? गुप्ता न सिर्फ काफ़ी सीनियर हैं अपितु पूर्व में वे मुख्यमंत्री कार्यालय-निवास तथा राज भवन में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। गुप्ता किसके कोपभाजन का शिकार हुए यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है। वहीं संयुक्त संचालक भगवती सिंह, उप संचालक जितेंद्र नागेश एवं सहायक संचालक विवेक कुमार सरकार ने रायपुर आने के लिए अपने उच्चाधिकारी को लिखकर दिया था। इन तीनों को रायपुर आने का मौका मिल भी गया। भगवती सिंह स्वास्थगत कारणों से यहां लाए गए हैं। नागेश की पत्नी रायपुर में पदस्थ हैं, अतः इस तरह उनके यहां आने की राह खुली।

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