● कारवां (9 अक्टूबर 2022)- युवा, नारी शक्ति एवं आदिवासी वर्ग को साधने की कोशिश

■ अनिरुद्ध दुबे

गंगरेल में हुई भाजपा की गोपनीय बैठक में 2023 के विधानसभा चुनाव का रोडमैप तैयार होने की ख़बर है। बैठक में 31 भाजपा नेता शामिल हुए। बताते हैं बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश ने कुछ लोगों को निशाने में रख साफ शब्दों में कहा कि “इस बार केवल चुनाव नहीं लड़ना है, लड़ाना भी है।“ अंदर की खबर तो यह भी है कि संगठन की कमान संभालने वाले लोग 3 नेताओं के साथ काफी कड़ाई से पेश आए। क्षेत्रिय संगठन महामंत्री अजय जामवाल ने मार्गदर्शन दिया कि सत्ता में वापसी के लिए कौन कौन से कदम उठाए जाने की ज़रूरत है। बहरहाल भाजपा यह जान रही है कि सिंहासन पर वापसी के लिए इस समय तीन को साधना बेहद ज़रूरी है- युवा, नारी शक्ति एवं आदिवासी। पहले क्रम में युवा वर्ग का ध्यान खींचने बेरोजगारी को लेकर राजधानी रायपुर में प्रदेशव्यापी आंदोलन हो चुका। फिर आदिवासी आरक्षण 32 प्रतिशत यथावत रखने की मांग को लेकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में चक्का जाम अगला कदम रहा। अब अगले क्रम में 11 नवंबर को बिलासपुर में महतारी हुंकार रैली रखी गई है, जिसमें भाजपा नेत्रियों की अहम् भूमिका रहेगी। गंगरेल वाली बैठक कितनी गोपनीय थी इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उसमें शामिल किसी भी नेता ने फेस बुक, वाट्स अप एवं ट्विटर पर कोई तस्वीर शेयर नहीं की।

डेलीगेट्स में क्यों

नहीं हैं सुशील

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का समय क़रीब है। कांग्रेस ने जो डेलीगेट्स तय किये हैं वे अध्यक्ष पद के लिये वोट डाल सकेंगे। आम तौर पर मंत्री, सांसदों व विधायकों का नाम डेलीगेट्स में रहता आया है। छत्तीसगढ़ में कुछ मंत्री व विधायकों के नाम डेलीगेट्स में नहीं होना चर्चा में है। इससे भी ज़्यादा चर्चा तो इस बात को लेकर हो रही है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महत्वपूर्ण संचार विभाग में से किसी को डेलीगेट्स में क्यों नहीं रखा गया! लंबे राजनीतिक अनुभव के हिसाब से देखें तो बलौदाबाजार के नेता सुरेन्द्र शर्मा का नाम डेलीगेट्स में रहना था, पर नहीं रहा। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के चेयरमैन सुशील आनंद शुक्ला का तो रहना ही रहना था, लेकिन नहीं रहा। अंदर की ख़बर रखने वाले बताते हैं कि सुशील आनंद के नाम पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम दोनों सहमत थे, लेकिन किसी तीसरे आदमी ने खेल खेल दिया। इसी तरह प्रदेश कांग्रेस चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता का नाम डेलीगेट्स में नहीं आना भी पार्टी के बहुत से लोगों को चकित कर गया। वहीं एक चिकने चुपड़े छोटे क़द के युवा नेता का नाम आश्चर्यजनक तरीके से डेलीगेट्स की सूची में शामिल हो गया। इसके अलावा एक और लंबे क़द के युवा नेता का नाम भी डेलीगेट्स में आना चौंका गया। कभी जोगी जी के काफ़ी क़रीब रहा यह युवा नेता संगठन में गहरी पकड़ बनाने के साथ दिल्ली में अपने कनेक्शन तगड़े करते जा रहा है। बिलकुल रायपुर पश्चिम विधायक विकास उपाध्याय के पैटर्न पर।

अब जाकर खुमान साव व

लक्ष्मण मस्तुरिया की कद्र

छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में बड़ा निर्णय लेते हुए लक्ष्मण मस्तुरिया एवं खुमान साव के नाम पर पुरस्कार की घोषणा की है। ये पुरस्कार राज्योत्सव के दौरान दिये जाएंगे। लक्ष्मण मस्तुरिया पुरस्कार लोक गीत के क्षेत्र में दिया जाएगा। वहीं खुमान साव पुरस्कार लोक संगीत के क्षेत्र में योगदान देने वाले कला साधकों को दिया जाएगा। सरकार के इस निर्णय का कला एवं साहित्य जगत में ख़ूब स्वागत हो रहा है। होना भी चाहिए। साव जी व मस्तुरिया जी के योगदान को कैसे भुलाया जा सकता है। पिछले साढ़े तीन साल में छत्तीसगढ़ ने इन दोनों महान विभूतियों को खोया है। मस्तुरिया जी का लिखा गीत “मोर संग चलव रे…” कालजयी रचना है। वहीं साव जी ने छत्तीसगढ़ी लोक गीत व संगीत की खुशबू को दूर-दूर तक फैलाने का काम किया था। इसे विडंबना ही कहें कि इन दोनों हस्तियों को अपने विशिष्ट योगदान के लिए जीते जी बड़े स्तर का जो सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। इन दोनों ने कला साधना में अपनी ज़िन्दगी खपा दी। पुरस्कारों की दौड़ में कुछ वे लोग आगे निकल गए जिनका सरकार में बैठे लोगों से गहरा याराना था। साव जी व मस्तुरिया जी जैसे स्वाभिमानी लोग सरकारी पुरस्कारों की दौड़ में पीछे रह गए। पूर्व में सत्ता में बैठे लोगों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम करने की इस क़दर धुन सवार थी कि उन्हें यह सोचना गंवारा नहीं हुआ कि सड़कों व बिल्डिंगों का जाल बिछा देने तथा चावल व नमक के अलावा और भी  बहुत कुछ करने को है। अच्छा है कि अभी कुर्सी संभाले हुए लोग साहित्य, कला एवं संस्कृति के मर्म को समझ तो पा रहे हैं।

नगर निगम के वाट्स

अप ग्रुप में कलेक्टर

रायपुर कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भुरे एवं रायपुर नगर निगम कमिश्नर मयंक चतुर्वेदी के बीच जैसा तालमेल देखने को मिल रहा वैसा शायद ही पहले किसी कलेक्टर-कमिश्नर के बीच देखने को मिला हो। कलेक्टर सर्वेश्वर भुरे नगर निगम के सभी दस जोनों के अधिकारियों की बैठक ले चुके हैं। किसी ने यह भी बताया कि कलेक्टर अब तक नगर निगम की 11 बैठक ले चुके हैं। रायपुर नगर निगम के इतिहास में ऐसा पहली बार देखने में आया है कि वहां कोई कलेक्टर आकर सभी जोनों के अधिकारियों की बैठक ले। निगम के बारे में गहरी जानकारी रखने वाले यह भी बताते हैं नगर निगम के एचओडी लोगों का जो वाट्स अप ग्रुप है उसमें कलेक्टर साहब का नंबर भी एड है। यानी निगम का हर बड़ा अपडेट कलेक्टर साहब की निगाहों के सामने से होकर गुजर रहा है।

किसानों के हक़ में

खड़े होने वाले पप्पू

रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के पदाधिकारी राजेन्द्र पप्पू बंजारे उन किसानों के पक्ष में खुलकर सामने आ गए हैं जिनकी कमल विहार योजना में जमीन गई। भूपेश बघेल सरकार किसान हितैषी सरकार मानी जाती है। ऐसे में भला पप्पू बंजारे किसानों के हक़ को लेकर बात करने में कहां पीछे रहने वाले थे। ये पप्पू का साहस है कि उन्होंने अपनी ही संस्था आरडीए पर सवालिया निशान लगा दिया है! उनका कहना है कि किसानों के हक़ को लेकर अधिकारियों के साथ कई बार चर्चा हो चुकी, लेकिन कहीं कोई समाधान निकलता नज़र नहीं आ रहा। उनकी बातों से तो यही संकेत मिल रहा है कि अब वह शांत नहीं बैठने वाले। उनका नाम राजेन्द्र पप्पू बंजारे थोड़ा लंबा है लेकिन उन्हें अपना पदनाम छोटा लिखना या बताना ही पसंद है। यूं तो उनकी पोस्ट आरडीए संचालक मंडल सदस्य की है लेकिन उन्हें अपने नाम के आगे डायरेक्टर आरडीए लिखना पसंद है।

मुर्दा शहर ने दिया सदमा

ये नया रायपुर है कि वहां से मनहूसियत दूर होने का नाम ही नहीं ले रही। साल दर साल बीतते चले गए लेकिन वहां आज तक ठीक से बसाहट नहीं दिखती। आवागमन के नाम पर बिलकुल जीरो है नया रायपुर। पुराने व नये रायपुर के बीच ढंग की कोई कनेक्टिविटी नहीं। टाइम पास के लिए नया रायपुर में तफरीह करते रहने वाले क्रेजी किस्म के लोग कहते रहे हैं इस जगह पर भले ही कुछ हो या न हो लेकिन कम से कम शांति तो है। अब तो मानो शांति पर भी नज़र लग गई है। हाल ही में इंग्लैंड से रायपुर घुमने आए पति पत्नी नया रायपुर में लूट का शिकार हो गए। बाइक में सवार तीन नकाबपोश उनका बेग लूटकर भाग निकले, जिनमें क़रीब 3 लाख के जेवर, कपड़े व जूते थे। पति भारतीय मूल का है और पत्नी जापानी। दोनों ने सुन रखा था कि नया रायपुर काफी प्लानिंग करके बनाया गया खूबसूरत शहर है। यह तथाकथित खूबसूरत शहर पति-पत्नि को ऐसा जख्म दे गया, जिसे वे शायद सारी ज़िन्दगी न भूल पाएं। नया रायपुर की सड़कों पर जगह-जगह आवारा पशु विचरण करते तो दिख ही जाते हैं, अब अपराधी लोगों की भी कर्म भूमि बनते जा रहा है यह मुर्दा शहर।

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