बुरहानिया लाइब्रेरी

■ अनिरुद्ध दुबे

राजधानी रायपुर के सदर बाज़ार की पहचान व्यापारिक केन्द्र के रूप में रही है। सदर बाज़ार में लाइनवार सोने-चांदी की दुकानें होने के कारण यह सराफा बाज़ार भी कहलाता है। बहुतेरी दवा दुकानें होने के कारण भी इस क्षेत्र की अपनी अलग पहचान है। सद्दानी चौक सदर बाज़ार का केन्द्र बिन्दु माना जाता है। सद्दानी चौक से एक रास्ता बूढ़ापारा के लिए कटता है तो दूसरा नयापारा के लिए। ये दोनों पारा अपना अलग ही ऐतिहासिक महत्व रखते हैं, जिसमें बूढ़ापारा अक्सर विविध कारणों से चर्चा में बने रहता है। नई पीढ़ी की बात करें तो बहुत कम लोगों को पता होगा कि सेठों की बस्ती कहलाने वाले सदर बाज़ार के अगल-बगल तीन ऐसे केन्द्र हुआ करते थे जहां कि संस्कार और ज्ञान दोनों प्राप्त हुआ करता था। बात हो रही है 3 लाइब्रेरी की। हलवाई लेन का जैन पुस्तकालय, जैन मंदिर के बाजू गली में यति मगनलाल पुस्तकालय तथा सद्दानी चौक के पास की बुरहानिया लाइब्रेरी। इन तीनों पुस्तकालयों को बंद हुए बरसों हो गए, लेकिन पुराने पढ़ाकू किस्म के लोग आज भी उन संस्कार केन्द्रों को याद करते हैं।

वैसे तो मेरा तीनों पुस्तकालयों में जाना हुआ लेकिन बुरहानिया से कुछ खास यादें जुड़ी हुई हैं। यूं कहूं कि 10 से 12 वर्ष की बाल्यावस्था में बुरहानिया लाइब्रेरी के खूब चक्कर लगे। सद्दानी चौक के पास जिस पाटे पर आज सुखरू की कचौड़ी, मुंग बड़े और दही बड़े की दुकान लगती है, उसके सामने स्थित एक बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर में बुरहानिया लाइब्रेरी हुआ करती थी। जहां तक लाइब्रेरी से जुड़ा मेरा अपना अनुभव है तो गुलिवर के किस्से वाली किताब मैंने पहली बार बुरहानिया लाइब्रेरी में देखी थी। उसमें गुलिवर की दिलचस्प कहानी के साथ उस पर काफ़ी सुंदर रेखा चित्र भी थे। यह पढ़ना बेहद आनंदित किया था कि गुलिवर कैसे बौनों के देश में पहुंच जाता है। जब भी मैं लाइब्रेरी में घुसता बम्बई (अब मुम्बई) से आने वाले अख़बार नवभारत टाइम्स को सबसे पहले देखने की कोशिश किया करता। वजह थी उसमें प्रकाशित होने वाले सिनेमा के विज्ञापन। आज तो कोई भी फ़िल्म एक ही समय में पूरे भारतवर्ष में रिलीज़ हो जाती है। तब का ज़माना अलग था। बम्बई में कोई भी नई फ़िल्म लगती उसे रायपुर के सिनेमाघर में पहुंचते महीने-दो महीने लग जाते थे। ऐसे आगामी आकर्षण वाली फ़िल्मों का नवभारत टाइम्स में प्रकाशित विज्ञापन दिल को बेहद लुभाता। वह ज़माना अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, जितेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा, संजीव कुमार, शशि कपूर एवं ऋषि कपूर जैसे फ़िल्मी सितारों का था। कोई बड़ी स्टार कास्ट वाली नई फ़िल्म बम्बई (मुम्बई) में रिलीज़ होती तो विज्ञापन में अकेले बम्बई के 25 से 30 सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने की सूचना होती। यह देखकर मन में सवाल आता कि क्या बम्बई वाकई बहुत बड़ा शहर है?

बुरहानिया लाइब्रेरी की विशेषता यह थी कि यहां पढ़ने के लिए हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं की सामग्री उपलब्ध थी। यहां रायपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बार नवभारत, देशबन्धु, युगधर्म एवं क्रॉनिकल (अंग्रेज़ी) मंगाए जाते। बाहर के अंग्रेज़ी न्यूज़ पेपर हितवाद, द टाइम्स ऑफ इंडिया एवं इंडियन एक्प्रेस यहां आते। उर्दू न्यूज़ पेपर इंक़लाब बम्बई से मंगवाया जाता। उर्दू साप्ताहिक पेपर नशेमन की बौद्धिक महक यहां बिखरी होती। बम्बई से आने वाला हिन्दी न्यूज़ पेपर नवभारत टाइम्स एक दिन विलंब से यहां पहुंचता। उस दौर की धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, रविवार, माया, दिनमान एवं अल रिसाला (उर्दू) जैसी उत्कृष्ठ पत्रिकाओं से बुरहानिया लाइब्रेरी की टेबल सजी रहती। उस समय की प्रतिष्ठित फ़िल्म पत्रिका माधुरी व मायापुरी के तलबगार शाम को लाइब्रेरी की टेबल पर नज़र आते। मुंशी प्रेमचंद से लेकर सआदत हसन मंटो, फैज़ अहमद फैज़, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुग़ताई, हरिवंश राय बच्चन, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती और ना जाने कितने ही साहित्यकारों का साहित्यिक ख़ज़ाना वहां मौजूद था। इब्ने सफी की जासूसी दुनिया की पूरी श्रृंखला मौजूद थी। आचार्य चतुरसेन शास्त्री से लेकर गुरुदत्त, गुलशन नंदा, रानू, राजहंस, राजवंश के अलावा और भी जाने-माने लेखकों के उपन्यास वहां मौजूद थे। वहीं कर्नल रंजीत और सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी उपन्यास लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाते। बच्चों और किशोरों के पढ़ने के लिए बहुत कुछ लाइब्रेरी में मौजूद था। नंदन, पराग, चम्पक एवं चंदामामा जैसी बाल पत्रिकाओं को न सिर्फ बच्चे बल्कि बड़े लोग भी बड़ी तन्मयता से पढ़ते नज़र आते। वेताल (फैंटम), मैंड्रेक और बहादुर से जुड़ी इंद्रजाल कॉमिक्स नियमित रूप से वहां आती। राजन इक़बाल एवं राम रहीम की जासूसी सीरीज़ को भी लाइब्रेरी से ले जाकर बच्चों एवं बड़ों ने खूब पढ़ा।

बुरहानिया लाइब्रेरी का इतिहास कोई कम दिलचस्प नहीं। कभी सदर बाज़ार व बूढ़ापारा में बड़ी संख्या में बोहरा समाज के परिवार रहा करते थे। वह साठ का दशक था। बोहरा समाज के कुछ युवक अक्सर सद्दानी चौक या बूढ़ापारा में चाय-पान के सेवन के लिए इकट्ठे हुआ करते। उन युवकों में थे- इक़बाल हुसैन ज़ियाई, शौकत अली यूसुफ़ी, अली असग़र अजीज़, शमीम अहमद, डॉ. आई.ए. सलीम, सैयद भाई बारूद वाले, मोइज़ हुसैन, ज़ियाउल हसन, बदरूद्दीन कपासी, गुलाम अब्बास कपासी, इक़बाल शाह एवं फखरूद्दीन शाह। युवकों की वह टोली अक्सर बौद्धिक किस्म की चर्चाओं में मग्न रहती। उनके दिमाग में उपजा कि क्यों ना एक लाइब्रेरी की बुनियाद रखी जाए। इस मित्र मंडली में प्रमुख भूमिका निभाने वाले इक़बाल हुसैन ज़ियाई बताते हैं- 1962 के आसपास की बात होगी। हम दोस्तों के बीच तय हुआ कि जिसके घर में जो भी पुस्तक रखी हो वह लाइब्रेरी के लिए लाकर देगा। अब सवाल यह कि लाइब्रेरी कहां पर शुरु की जाए? हम उत्साही युवक बोहरा समाज के तत्कालीन प्रमुख से मिले और अपनी ज़रूरत बताई। समाज प्रमुख ने इस काम के लिए हमारे सर्वोच्च धर्म गुरु सैयदना बुरहानुद्दीन को पत्र लिखकर उन्हें हम उत्साही युवकों की भावनाओं से अवगत कराया। धर्म गुरु ने इसे नेक काम मानते हुए अपनी अनुमति दे दी। धर्म गुरु ने ही लाइब्रेरी को नाम दिया बुरहानिया लाइब्रेरी। सद्दानी चौक से चंद कदमों की दूरी पर बोहरा मस्जिद है। समाज प्रमुख ने मस्जिद के एक छोटे से हिस्से में लाइब्रेरी शुरु करने जगह प्रदान कर दी। कुछ दोस्तों ने मिलकर चंद किताबें इकट्ठी की और लाइब्रेरी की शुरुआत हो गई। उस ज़माने में टेलीविज़न नहीं आया था। रेडियो-ट्रांज़िस्टर के साथ किताबों व अख़बारों का बड़ा क्रेज़ था। धीरे-धीरे पठन सामग्री की संख्या बढ़ने लगी और लाइब्रेरी का आकार बड़ा होते चले गया। न सिर्फ बोहरा बल्कि बड़ी संख्या में अन्य समाज के लोग भी इस लाइब्रेरी का हिस्सा बने। 73 वर्षीय इक़बाल हुसैन आगे बताते हैं-1978 के आसपास की बात है। मस्जिद में जहां पर लाइब्रेरी थी उस जगह की ज़रूरत किसी और महत्वपूर्ण काम के लिए महसूस होने लगी। हमें आदेश हुआ कि लाइब्रेरी कहीं और शिफ्ट कर लें। थोड़े से प्रयासों के बाद हमें सद्दानी चौक के पास जगह मिल गई। यह जगह आशिक़ अली बंदूक वाले की थी, जिन्होंने हमें नाम-मात्र के किराये पर दे दी। लाइब्रेरी सुबह-शाम दोनों समय खुलती थी। वक़्त का पहिया तेज़ी से आगे बढ़ते चला गया। जिन लोगों ने लाइब्रेरी की बुनियाद रखी थी उनकी पारिवारिक ज़िम्मेदारियां बढ़ चुकी थीं। कोई व्यवसाय में व्यस्त हो चुका था तो कोई नौकरी में। हमारे बाद बोहरा समाज की दूसरी पीढ़ी ने लाइब्रेरी की परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन तब रायपुर तेज़ गति से भागने वाले शहर के रूप में धीरे-धीरे तब्दील हो रहा था। जिन युवकों ने लाइब्रेरी का काम अपने हाथों में लिया उनके ऊपर भी घर-परिवार के अलावा और भी दूसरी तरह के दायित्व थे। सद्दानी चौक में शिफ्ट होने के बाद लाइब्रेरी का सात-आठ साल का समय तो काफ़ी अच्छा रहा, फिर वहां की रौनक धीरे-धीरे गुम होती चली गई और 1991 में सदर बाज़ार का गौरव कहलाने वाली बुरहानिया लाइब्रेरी हमेशा के लिए बंद हो गई। सन् 2020 में बुरहानिया लाइब्रेरी की सारी किताबें जीई रोड स्थित सेंट्रल लाइब्रेरी में डोनेट कर दी गई।

(संलग्न तस्वीरें सद्दानी चौक के पास कभी रही बुरहानिया लाइब्रेरी के प्रवेश व्दार की 3 अलग-अलग एंगल से)

Leave a Reply

Your email address will not be published.