नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निकटतम सहयोगी कर्नल ढिल्लो से वह यादगार मुलाक़ात

■ अनिरुद्ध दुबे

देश भर में आज आजादी की लड़ाई के महान योद्धा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई जा रही है। भारत की आजादी में नेताजी व्दारा गठित आजाद हिन्द फौज का जो योगदान रहा था उसकी गाथाएं हम अक्सर सुनते या पढ़ते रहते हैं। आजाद हिन्द फौज में नेताजी के चार बेहद विश्वसनीय एवं करीबी हबीबुर्रहमान, शाहनवाज़, कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लो एवं कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं। 25 एवं 26 सितंबर 1985 को रायपुर के रंग मंदिर में छत्तीसगढ़ स्तरीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मेलन का आयोजन हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन का सदस्य होने के नाते मैं भी उस आयोजन का छोटा सा हिस्सा था। 26 को समापन समारोह के मुख्य अतिथि नेताजी के प्रमुख सहयोगी कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लो थे। ढिल्लो साहब की उम्र उस समय 75 से ऊपर रही होगी। उस उम्र में भी उनका जोश देखते बनता था। वे जिससे भी हाथ मिलाते, मजबूती से मिलाते थे। आवाज़ काफी बुलंद थी। सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने आजाद हिंद फौज से जुड़े जो संस्मरण सुनाए वह आत्मा को हिला देने वाले थे। सम्मेलन के दौरान सवाल-जवाब वाले सत्र में  किसी ने उनसे प्रश्न किया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना में शहीद हो गए थे या फिर वहां से बच निकले थे? कर्नल ढिल्लो का अति संक्षिप्त में यह जवाब सामने आया था- “मेरा मानना है नेताजी अब इस संसार में नहीं हैं।” सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के अनिल गुप्ता जी एवं अन्य वरिष्ठ साथियों के साथ मैं कर्नल ढिल्लो को बिदाई देने रेल्वे स्टेशन भी गया था। मुझ जैसे छोटी उम्र और कम समझ वाले लड़के को जब ढिल्लो साहब ने गले लगाया मेरी आंखें भर आई थीं।

कर्नल ढिल्लो के निधन को कई बरस हो चुके। 2020 में रायपुर में हुए इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में तिग्मांशु धुलिया व्दारा निर्देशित फ़िल्म ‘राग देश’ जो दिखाई गई उससे कर्नल ढिल्लो से जुड़ी यादें फिर ताजा हो गईं। ‘राग देश’ पूरी तरह आजाद हिंद फौज की संघर्ष गाथा पर केन्द्रित थी। ‘राग देश’ में कर्नल ढिल्लो वाला किरदार अमित साध ने निभाया था। अमित साध कर्नल ढिल्लो से गजब का मैच हो रहे थे। ऑडिटोरियम में फ़िल्म देखते हुए मैं महसूस कर पा रहा था कि कर्नल ढिल्लो अपनी जवानी में साध की तरह ही दिखते रहे होंगे।

फ़िल्म समाप्ति के बाद संस्कृति विभाग के ऑडिटोरियम में उपस्थित लोगों से सीधे संवाद करते हुए तिग्मांशु धुलिया ने कहा था कि “मेरी ज़िन्दगी का ध्येय रहा पैसा-शोहरत कभी ना कभी आ ही जाएगा, काम सही करना है। काफी रिसर्च कर लेने के बाद मेरा मानना है कि सन् 1947 में हिन्दुस्तान आजाद इसलिए हो पाया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद सेना ने जंग लड़ी थी। विंस्टन चर्चिल ने तो पहले ही कह रखा था कि हिन्दुस्तान नहीं छोड़ेंगे। आजाद हिन्द फौज की भूमिका सामने आने के बाद अंग्रेजों को समझ में आने लगा था कि भारत के भीतर सेना कभी भी विद्रोह कर सकती है। इस तरह अंग्रेजी साम्राज्य का खेल खत्म हुआ। मुझे लगता है नेताजी सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच विवाद को बेवजह तूल दिया जाता रहा है। नेताजी ने शेष जीवन रशिया में बिताया होगा।”

ऑडिटोरियम के बाहर तिग्मांशु धुलिया से अलग से मिलकर मैंने उनसे सवाल किया था कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि नेताजी विमान दुर्घटना में शहीद नहीं हुए थे और उन्होंने अपना शेष जीवन रशिया में बिताया होगा? यदि वे जीवित थे तो भारत क्यों नहीं लौटे?? तिग्मांशु ने कहा कि “फांसी का खतरा था।” फिर मैंने पूछा ऐसा क्यों? तिग्मांशु ने कहा- “देश की आजादी के लिए नेताजी ने हिटलर से हाथ जो मिलाया था।”

(फोटो 1- कैप लगाए कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लो उनके ठीक पीछे अनिरुद्ध दुबे, फोटो 2- रंग मंदिर के मंच पर कर्नल ढिल्लो के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गण एवं उनके परिवार के लोग)

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