■ अनिरुद्ध दुबे/ मिसाल न्यूज़
बॉलीवुड में सिनेमा एवं सीरियलों के लम्बे अनुभवों से गुजर चुके राइटर एवं डायरेक्टर नीरज विक्रम की छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ 12 जून को पूरे छत्तीसगढ़ में सिंगल स्क्रीन एवं मल्टीप्लेक्स में रिलीज़ होने जा रही है। नीरज कहते हैं- “मैं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का रहने वाला हूं। दूर रहते हुए कोई कितना भी नाम और दाम क्यों न कमा ले माटी की महक वापस अपनी जगह खींच ही लाती है। पूर्व में ‘महूं कुंवारा तहूं कुंवारी’ का लेखन कर चुकने के बाद अब मैंने ‘महूं दिलावाला तहूं दिलवाली’ को लिखने के साथ निर्देशित भी किया है। इसे रॉकी दासवानी एवं मैंने मिलकर प्रोड्यूस किया है।“
हाल ही में नीरज विक्रम से ‘मिसाल न्यूज़’ की लंबी बातचीत हुई। ख़ास अंश यहां प्रस्तुत हैं-
नीरज विक्रम से ‘मिसाल न्यूज़’ के एडिटर अनिरुद्ध दुबे का संवाद
0 अपनी सीरियल सिनेमा यात्रा डॉट कॉम से कहना शुरु करें…
0 मेरे पिता एयरफोर्स में थे और भाई थल सेना में। पढ़ाई रायपुर में ही हुई। रायपुर से ही कॉलेज़ किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि सेना वाली होने के कारण देश भक्ति का जज़्बा तो मेरे भीतर भी रहा, लेकिन इसके साथ मनोरंजन की दुनिया से गहरा लगाव होते चले गया। स्कूल-कॉलेज़ वाले दिनों में फ़िल्मों व सीरियलों से जुड़े आर्टिकल ख़ूब पढ़े। कॉलेज़ की पढ़ाई पूरी करने के बाद लगा मुम्बई जाकर किस्मत आज़माई जाए। मुम्बई में फ़िल्मी बेकग्राउंड से जुड़ा कोई भी परिचित नहीं था। जो भी शुरुआत करनी थी, ज़ीरो से करनी थी। हिम्मत जुटाकर मुम्बई पहुंच गया। साथ ही यह भी सोच रखा था फ़िल्म या सीरियल में काम मिलने में लंबा समय लगा तो ख़ुद को संभालने के लिए कोई और जॉब भी कर लूंगा। किस्मत अच्छी थी। आर्मी में ही शॉर्ट सर्विस मिल गई। वह नौकरी 5 साल के लिए थी। 5 साल की नौकरी के बाद वापस मुम्बई आया और बांद्रा के मरीना गेस्ट हाउस में रुम लेकर रहने लगा। मरीना गेस्ट हाइस एक महिला चलाती थीं, जिनके प्रति मेरे मन में गहरा सम्मान है। मैडम ने परंपरा बना रखी थी कि गेस्ट हाउस में फ़िल्म के लिए स्ट्रगल कर रहे लोगों को ही रुम दिया जाएगा। राजेन्द्र कुमार जी, धर्मेंद्र जी व मिथुन चक्रवर्ती जी जैसे बड़े अभिनेता स्ट्रगल के दिनों में मरीना गेस्ट हाउस में ही रहे थे। मैडम अब इस संसार में रही नहीं। काफ़ी पुराना उनका गेस्ट हाउस भी बंद हो चुका है।
ऐसा भी समय आया जब संघर्ष रंग लाया। फ़िल्म ‘इंसाफ़ की मंज़िल’ में पहली बार अभिनय का मौका मिला। इसमें मेरा रोल अभिनेता शेखर सुमन जी के बेटे का है। भीतर ही भीतर राइटर वाला पक्ष जोर मारते रहा था। कुछ सब्जेक्ट लिख रखे थे, जब भी मौका मिलता वहां सुनाता जहां कि कुछ काम बन सके। हमारे मित्र हैं हरीश शेट्टी। उन्होंने जब एक सब्जेक्ट सुना उन्हें काफ़ी अच्छा लगा। वे मुझे जाने-माने अभिनेता किरण कुमार जी के पास ले गए। किरण कुमार जी को भी वह सब्जेक्ट पसंद आया और इस तरह सीरियल ‘दुनियादारी’ से मेरे राइटिंग वाले काम की शुरुआत हो गई। धीरे-धीरे राइटर के रूप में काफ़ी लोग मुझे जानने लगे। सीरियल निर्माण के लिए मशहूर अधिकारी ब्रदर्स ने मुझे सीरियल ‘ऑल द बेस्ट’ लिखने का मौका दिया। सतीश शाह व स्वरूप संपत जैसे कलाकारों वाला यह सीरियल काफ़ी पॉपुलर रहा। फिर लिखने की गाड़ी जो चल पड़ी तो आज तक रुकी नहीं। ‘शाका लाका बूम बूम’, ‘सोन परी’, ‘मोटू पतलू’, ‘रुद्रा’, ‘गट्टू बट्टू’, ‘चाचा भतीजा’, ‘इना मीना डीका’- ऐसे न जाने कितने सीरियल रहे जिन्हें लिखा। सलमान ख़ान की सुपर डूपर हिट फ़िल्म ‘दबंग’ का एनीमेशन वर्ज़न मैंने लिखा। यह सीरियल 52 एपिसोड में था। मेरा लिखा सीरियल ‘केयान एंड किकि’ इन दिनों रोज़ाना 2 बजे कार्टून नेटवर्क में प्रसारित होता है। यह मैजिक व मस्ती वाला शो है। सच कहूं तो राइटिंग के लिए मुझे कभी स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। जो कुछ स्ट्रगल रहा एक्टिंग व डायरेक्शन की तरफ रहा।
0 स्ट्रगल पर थोड़ा प्रकाश डालें…
00 शिद्दत से लगे रहें तो सफलता ज़रूर मिलती है। वक़्त लगा, एक्टिंग व डायरेक्शन दोनों तरफ रास्ता खुला। आमिर ख़ान एवं रजनीकांत जैसे बड़े कलाकारों वाली फ़िल्म ‘आतंक ही आतंक’ में अभिनय किया। सुनील शेट्टी की ‘अंत’ व ‘शस्त्र’ में मेरा किरदार रहा। रोनित राय की फ़िल्म ‘बॉम्ब ब्लास्ट’ में भी एक अहम् रोल रहा। फ़िल्में हो या सीरियल, मुझे ज़्यादातर पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार करने को मिलते रहे। एक जैसे रोल मिलते रहने के कारण मेरी सोच डायरेक्शन की तरफ ज़्यादा दौड़ लगाने लगी। कितना सुखद संयोग है कि डायरेक्शन की शुरुआत मेरे अपने छत्तीसगढ़ की फ़िल्म ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ से हुई।
0 तो क्यों न बातचीत को ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ पर ले आएं…
00 ‘महूं कुंवारा तहूं कुंवारी’ की मेकिंग में रॉकी दासवानी, मनोज वर्मा और मैं तीनों पार्टनर थे। ‘महूं कुंवारा तहूं कुंवारी’ को डायरेक्ट मनोज भाई ने किया था। इस बार ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ के डायरेक्शन की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर रही। कोविड के वो दो साल नहीं आए होते तो शायद यह फ़िल्म और पहले बन जाती।
0 सीधे शब्दों में पूछें तो ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ क्या है…
00 अब तक यहां मैंने जो देखा-समझा, महसूस हुआ छत्तीसगढ़ी सिनेमा के दर्शकों को भरपूर मनोरंजन चाहिए। ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ में भर-भर के इंटरटेनमेंट है। इमोशंस है, एक्शन है, ड्रामा है। मन को गदगद कर देने वाला म्यूज़िक है।
0 ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ के सभी आर्टिस्ट छत्तीसगढ़ के हैं, हीरोइन को छोड़कर…
00 दरअसल ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाला’ के दो हीरो बदले। किसी ने हीरो के लिए आयुष राजवैद्य का नाम सजेस्ट किया। आयुष के चेहरे पर जो मासूमियत है उस एज़ ग्रुप की एक्ट्रेस ढूंढ पाना यहां मुश्किल हो रहा था। मुम्बई में मेरी परिचित कॉस्टिंग डायरेक्टर हैं डिम्पी सिन्हा। उनसे बात की। डिम्पी ने कुछ लड़कियों की पिक्स भेजी। प्राची की पिक के नीचे उन्होंने बेस्ट लिखकर भेजा। उस तस्वीर को मैंने व रॉकी भाई ने गौर से देखा और वह चेहरा हमें भी बेस्ट लगा। फिर डिसीज़न में देर नहीं लगी। दो-तीन रील शूट करने के बाद हमने यह समझने की भी कोशिश की कि प्राची चाइल्ड आर्टिस्ट जैसी न लगे। जब आयुष व उसके साथ वाले सीन देखे सब कुछ परफेक्ट लगा।
0 आयुष के बारे में क्या राय है…,
00 आयुष हमारी राइट च्वाइस है। चेहरे से वह कितना ही मासूम लगे पर हीरो वाला रूतबा भी उसके भीतर है। वह उम्मीदों पर ख़रा उतरने वाला हीरो साबित होगा।
0 फ़िल्म के और पक्षों पर क्या कहेंगे…
00 प्रकाश अवस्थी व करण खान से बात शुरु करूंगा। प्रकाश अवस्थी ने जो रोल किया, वैसा उनका गज़ब परफार्मेंस पहले कभी नहीं देखने में आया। प्राची के पिता के रोल में करण खान ख़ूब जमे हैं। संजय महानंद का डबल रोल है। मैंने तो उनका तीन रोल लिखा था। फ़िल्म की लंबाई को ध्यान में रखते हुए डबल रोल करना पड़ा। पुष्पेंद्र सिंह व अंजलि सिंह की भी बेहतरीन अदायगी देखने मिलेगी। बाकी फ़िल्म के साथ बहुत कुछ पहली बार हुआ है। पहला तो मैं ख़ुद नीरज विक्रम डायरेक्शन में पहली बार आया हूं। अलबम की दुनिया में रिकॉर्ड बना चुकी शालिनी विश्वकर्मा पहली बार नेगेटिव किरदार में नज़र आएंगी। सागर बोस ने पहली बार बेक ग्राउंड म्यूज़िक किया है। एमएस म्यूज़िक चैनल पहली बार जिस फ़िल्म को प्रमोट कर रहा वह ‘महूं दिलवाला तहूं दिलवाली’ है।
0 रॉकी दासवानी के साथ आपने यह दूसरी फ़िल्म की है। उनसे ख़ास ट्यूनिंग के पीछे वज़ह…
00 हम दोनों की सोच काफ़ी मिलती-जुलती है। काम नहीं भी रहे तो मित्रवत हम लगातार मिलते रहते हैं। रॉकी का प्रोडक्शन मैंनेजमेंट तगड़ा है। इस तरह मेरा आधा काम यूं ही हल्का हो जाता है। उम्मीद है हम आगे भी फ़िल्म बनाते रहेंगे।
छत्तीसगढ़ी की तरह नेपाली
में भी ‘मया’ का मतलब प्यार
नीरज विक्रम यह भी बताते हैं- “मैंने जकार्ता व इंडोनेशिया जैसे देशों के लिए भी सीरियल लिखे। एक नेपाली फ़िल्म भी लिखी ‘के यो मया हो।‘ नेपाल में यह फ़िल्म ख़ूब चली। एक दिलचस्प बात जानने को मिली। छत्तीसगढ़ी की तरह नेपाली भाषा में भी ‘मया’ शब्द का मतलब प्यार होता है।

